वैश्विक रणनीतिक वातावरण जिस तेजी से बदल रहा है, कुछ राष्ट्रों द्वारा अपनी ताकत का बेजा प्रदर्शन और शेष राष्ट्रों में इससे उपजने वाला भय जिन स्थितियों का निर्माण कर रहा है, उससे यह शंका जन्म ले रही है कि आने वाले समय में आज के आर्थिक ब्लॉक भी संभवतः क्षेत्रीय सामरिक गठबंधनों में रूपांतरित हो जाएंगे। लेकिन क्या यह स्थिति वैश्विक शांति के लिहाज से बेहतर होगी? इस प्रश्न के पीछे अहम कारण दक्षिण-पूर्व एशिया के गलियारों तक पहुंची चीनी दबंगई है, जिसके चलते आसियान के दस सदस्यों का एक समूह भारत के साथ आर्थिक साझेदारी को अब रणनीतिक साझेदारी में बदलते हुए एक सुरक्षा कवच का निर्माण करना चाहता है।
बीते वर्ष के अंतिम पखवाड़े में भारत पहली बार 10 आसियान देशों के साथ हुए शिखर सम्मेलन का मेजबान बना। इस सम्मेलन में चीन की एशियाई मुहल्ले में बढ़ती दबंगई के खिलाफ गहरे आर्थिक रिश्तों को रणनीतिक साझेदारी में बदलने की घोषणा की गई। हालांकि इस सम्मेलन में आर्थिक हितों से जुड़े औपचारिक विषयों की अनदेखी नहीं की गई, बल्कि इनसे जुड़ी आशावादी रूपरेखा भी पेश की गई। इसके अनुसार दोनों पक्षों ने अगले तीन वर्षो में 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य तय किया और सेवा व निवेश में मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की भी घोषणा की।
इसके साथ ही सेवा व निवेश के क्षेत्र में नए मुक्त व्यापार समझौते से भारत के प्रोफेशनल्स के लिए दुनिया की तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था वाले आसियान देशों में प्रवेश का रास्ता साफ किया गया। ये लक्ष्य हासिल भी किए जा सकते हैं। दरअसल आसियान देश भारत की आर्थिक जरूरतों को पहचानते हैं और वे यह भी जानते हैं कि यदि इन जरूरतों को पूरा नहीं किया गया, तो भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी फलीभूत नहीं हो सकती। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि आसियान देश पहले उन आर्थिक समझौतों को आगे सरकाएं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में नई स्फूर्ति पैदा कर सकते हैं।
आसियान देशों ने जो विजन दस्तावेज प्रस्तुत किया है, वह मुख्य रूप से दक्षिण चीन सागर में तल्ख हो रहे विवाद की पृष्ठभूमि में निर्मित हुआ लगता है। इस दस्तावेज में सभी सदस्य देशों ने द्विपक्षीय कूटनीतिक संबंधों को उच्च स्तर के रणनीतिक संबंधों में परिवर्तित करने के लिए एक खाका भी पेश किया है। वैसे इस गठबंधन की बुनियाद 1957 में ही पड़ गई थी। हालांकि इसने अब तक परंपरागत आवश्यकताओं के आधार पर ही रिश्तों को आगे बढ़ाया, लेकिन अब वह कुछ ऐसा करना चाहता है, ताकि नई दिल्ली इसमें नई जान डाल सके।
इसमें कोई संशय नहीं कि आसियान देशों के इस समूह की भारत से अपेक्षा तार्किक व प्रासंगिक है। लेकिन यहां दो प्रश्नों का निदान जरूरी लगता है। पहला यह कि क्या भारत द्वारा लिया गया इस तरह का निर्णय चीन को स्वीकार्य होगा? दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय दावों के साथ चीन कई पड़ोसी देशों को आंखें दिखा रहा है, जिसमें वियतनाम से आर्थिक साझेदारी के कारण भारत को भी शामिल किया जा सकता है, इसलिए भारत द्वारा आसियान देशों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेते ही चीन के साथ टकराव तीव्र हो जाएगा।
दूसरा यह कि आसियान के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी एशिया-प्रशांत क्षेत्र में नए सुरक्षा ढांचे का निर्माण करने के लिए क्या कदम उठाएगी? क्या अमेरिका के साथ भारत गठबंधन को विस्तार देगा या फिर केवल दक्षिण-पूर्व एशियाई शक्तियों के साथ रणनीतिक साझेदारी से ही चीनी ताकत का प्रतिरोध करने की रणनीति अपनाएगा? अगर भारत इस नए सहकार का नेतृत्व ग्रहण करता है, तो क्या यह भारत की क्षमता एवं हितों के अनुकूल होगा? अगर नई दिल्ली में भारत-आसियान शिखर सम्मेलन में शिरकत करने वाले सभी देश भारत के साथ स्थायी गठबंधन निर्मित करते हैं, तो आसियान के लिए एक बेहतर ‘टेस्ट बेड’ साबित हो सकता है और वह सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक प्रभावी भूमिका निभा सकता है। अगर भारत इसमें सफल हो जाता है, तो वह एशियाई शक्ति संतुलन के लिए भी एक ‘स्विंग स्टेट’ साबित होगा। इससे पहले हमें अपनी क्षमता तथा संभावित जोखिमों का आकलन करना जरूरी होगा।