व्यवसायी ट्रंप
अब डोनाल्ड ट्रंप की मूल मान्यताओं पर नजर डालते हैं। हम जानते हैं कि वह एक व्यापारिक सोच रखने वाले व्यक्ति हैं और उनका मानना है कि उच्च टैरिफ या दर ही अमेरिकी हितों की रक्षा कर सकती है। उन्होंने खासकर चीन से आयातित सामानों पर उच्च शुल्क लगाने की बात की है। बाइडन के शासनकाल में चीन के साथ अमेरिका का व्यापारिक घाटा 2021 में 352 बिलियन अमेरिकी डॉलर, 382 बिलियन अमेरिकी डॉलर (2022), 279 बिलियन अमेरिकी डॉलर (2023) और 217 बिलियन अमेरिकी डॉलर (सितंबर 2024 तक) रहा है। अमेरिका की अधिकांश आबादी को बड़ी मात्रा में चीन के माल, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी की आवश्यकता है। अगर उन सामानों पर टैरिफ बढ़ा दिया जाता है तो अमेरिका के लोगों और उद्योगों की लागत बढ़ेगी, मुद्रास्फीति बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में यूएस फेड नीतिगत ब्याज दर में वृद्धि करेगा, जिसमें उसने इस साल दो बार कटौती की थी।
दूसरी तरफ, चीन को अपने यहां रोजगार बनाए रखने के लिए वस्तुओं का उत्पादन जारी रखना होगा। अगर अमेरिका, चीन के सामानों पर टैरिफ बढ़ाता है तो वह दूसरे देशों में अपना माल ‘डंप’ करेगा। भारत में पहले से ही चीनी सामानों पर सबसे ज्यादा एंटी-डंपिंग शुल्क है। ऐसे में उच्च अमेरिकी टैरिफ बदले की भावना को पैदा कर सकते हैं, जिसका परिणाम विश्व व्यापार को भुगतना पड़ सकता है।
अमेरिका में कुछ लोग राजकोषीय घाटे के बारे में उसी तरह बातें करते हैं, जिस तरह भारत और अन्य देश राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के बारे में चिंतित हैं। इसका कारण यह है कि अमेरिका अपने घाटे को आसानी से पूरा कर लेता है, क्योंकि चीन समेत दूसरे देश अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड खरीदते हैं। अमेरिका के कुल राष्ट्रीय ऋण 21,000 बिलियन अमेरिकी डॉलर में से चीन का हिस्सा लगभग 1170 बिलियन अमेरिकी डॉलर है। लेकिन अगर अमेरिका का राजकोषीय घाटा बढ़ता है तो जाहिर है कि महंगाई बढ़ेगी। नतीजे के तौर पर उच्च ब्याज दरें पूंजी के प्रवाह को बिल्कुल उलट देंगी, जिसकी वजह से भारत जैसे विकासशील देशों से धन लगातार बाहर जाएगा। मजबूत डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का मूल्य घट जाएगा।
परफेक्शनिस्ट ट्रंप
ट्रंप ने अमेरिका में कारखानों को वापस लाने का वादा किया है। वह अमेरिकी उद्योगों को अपने कारखाने स्थापित करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन दे सकते हैं। इससे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में कमी आएगी। अगर अमेरिकी व्यवसायी तब भी विदेश में अपने कारखाने स्थापित करना चाहें तो ट्रंप प्रौद्योगिकी के निर्यात पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। ट्रंप ने पहले भी भारत पर अमेरिकी वस्तुओं पर उच्च टैरिफ लगाने और ‘मुद्रा में हेरफेर करने वाला’ होने का आरोप लगाया है। क्या ट्रंप और मोदी के बीच की ‘दोस्ती’ भारत के प्रति ट्रंप के रवैये को नरम करेगी और यह भारत के लिए एक अपवाद बन पाएगी, यह एक विवादास्पद प्रश्न है। दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा कथित ‘अवैध’ आप्रवासन है। ट्रंप इसके लिए बेरोजगारी से लेकर अपराध और नशीली दवाओं तक सभी को दोषी मानते हैं। ट्रंप ने पहले 100 दिनों में दस लाख अवैध अप्रवासियों को बाहर करने का वादा किया है।
इस प्रक्रिया में कितने भारतीयों को निर्वासित किया जाएगा, यह तो अभी मालूम नहीं है, लेकिन कुछ तो निर्वासित किए ही जाएंगे। इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ेगा। ट्रंप एच1बी1 वीजा हासिल करने के नियमों को और सख्त कर सकते हैं। हालांकि अमेरिकी उद्योग, विश्वविद्यालय और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली अधिक योग्य भारतवासियों को अपने यहां फिर से बसाकर उन्हें अमेरिकी नागरिक बनाना चाहेगी। यदि ट्रंप और अमेरिकी नियोक्ता अपनी-अपनी बातों पर अडिग रहते हैं तो यह एक अपरिवर्तनीय शक्ति द्वारा अचल अवरोध को पूरा करने का मामला होगा।
जलवायु परिवर्तन पर ट्रंप की सोच
डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद तेल और दवा उद्योगों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। गौर करने वाली बात है कि ट्रंप ने उस क्रिस राइट को ऊर्जा सचिव के रूप में नामित किया है, जो फ्रैकिंग और ड्रिलिंग के प्रबल समर्थक हैं। वह इस बात से ही इनकार करते हैं कि दुनिया में जलवायु संकट है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन पर होने वाली सीओपी (कॉप) वार्ता विफल तो नहीं होगी, लेकिन इसे गंभीर झटका जरूर लग सकता है। भारत वर्तमान में सीओपी के प्रयास का समर्थन तो करता है, लेकिन वह चाहता है कि इसकी गति धीमी हो और ऐसा हो सकता है। फार्मास्युटिकल मोर्चे पर, कम विनियमन और ऊंची कीमतों की उम्मीद में अमेरिका में फार्मा शेयरों में तेजी आई है। दुनियाभर में दवाओं की कीमतें बढ़ेंगी और स्वास्थ्य सेवा को सार्वभौमिक बनाने के हमारे प्रयास पर असर पड़ेगा।
अंत में यह देखना होगा कि उन दो युद्धों के प्रति ट्रंप का रवैया क्या होगा, जिसमें हर दिन दर्जनों निर्दोष लोगों की जानें जा रही हैं। स्कूलों और अस्पतालों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नष्ट कर रहे हैं? ट्रंप ने ‘युद्ध रोकने’ का वादा तो किया है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया है कि वह क्या करेंगे। उनके पिछले रिकॉर्ड और घोषणाओं से संकेत मिलता है कि वह इस्राइल का समर्थन करेंगे। वह यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की पर रूस के साथ समझौता करने के लिए दबाव डाल सकते हैं। हालांकि जल्दबाजी में उठाए गए कदम के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। वहीं, इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि युद्ध समाप्त हो जाएगा और स्थायी शांति स्थापित हो जाएगी। इसके विपरीत यह भी हो सकता है कि यदि युद्ध तेज हो गए तो आपूर्ति शृंखलाएं और बाधित हो जाएंगी, जिसका विकासशील देशों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
डोनाल्ड ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ से पूरी दुनिया को बेहतर, सुरक्षित या अधिक समृद्ध स्थान बनाने की संभावना नहीं है। ट्रंप के अनुसार, यह अमेरिका के लिए फायदेमंद है। अमेरिकी चुनाव के नतीजों ने भी इस बात को साबित कर दिया, जो कि ट्रंप के हित में भी है।