विभाजन के समय बलूचिस्तान पाकिस्तान में शामिल नहीं होना चाहता था, लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के दबाव में उसे शामिल होना पड़ा। उस समय बलूच नेता कलात खान के संरक्षण में आजादी हासिल करने के लिए आंदोलन जारी था, जो बाद में और तेज हो गया। इसलिए बलूच राष्ट्रवादियों को पाकिस्तानी सरकार व सेना विद्रोही कहती है। उनकी नाराजगी पाकिस्तानी हुकूमत और सेना द्वारा ढाए जा रहे जुल्मों के कारण लगातार बढ़ती जा रही है। माना जा रहा है कि जब तक सेना और आईएसआई बलूचिस्तान पर अत्याचार बंद नहीं करती, उनमें पाकिस्तान से अलग होने की भावना खत्म नहीं होगी। अब तो उनकी आजादी की मांग अमेरिका और अन्य देशों तक पहुंच गई है। सरकार के अत्याचार से तंग आकर सैकड़ों बलूची पलायन करके विदेशों में बस गए हैं। वे रोज प्रदर्शन करके विश्व समुदाय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर हस्तक्षेप करने की उम्मीद कर रहे हैं।
इमरान खान की सरकार के समय से बलूचिस्तान के हालात और ज्यादा खराब हुए हैं। अब फौज के समर्थन से बनी गठबंधन सरकार इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही है। वह बलूचियों पर अत्याचार कर रही है।
बलूचियों के लापता होने के पीछे खुफिया एजेंसी का हाथ बताया जा रहा है। जो लोग लापता बलूचियों की तलाश करने की मांग करते हैं, उनकी हत्या कर दी जाती है। लगभग 25,000 से अधिक बलूचियों का अपहरण हुआ है और उनमें से ढाई हजार से अधिक लोगों के गोलियों से छलनी व अत्याचारों के प्रमाण देने वाले शव बरामद हुए हैं। अब बाकियों की तलाश की मांग जारी है। ईद के अवसर पर हुए प्रदर्शन में सैकड़ों महिलाएं और बच्चे अपने लापता परिजनों की तस्वीरें लेकर शामिल हुए थे। मगर मौजूदा पाक सरकार व सेना उनकी कोई मदद नहीं कर रही है, बल्कि अब भी बलूचियों को जबरन गायब करने का सिलसिला जारी है। क्षेत्रफल के हिसाब से बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। यहां करीब एक करोड़ लोगों की आबादी है। प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से यह बाकी पाकिस्तान से ज्यादा समृद्ध है। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार, बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर केंद्र और दूसरे प्रांतों का अधिकार कायम है, जबकि संसाधनों पर केवल बलूचियों को अधिकार मिलना चाहिए था। इस प्रांत में जो गैस पैदा की जाती है, उसकी आपूर्ति सारे पाकिस्तान में होती है और बलूचिस्तान को बहुत कम रॉयल्टी मिलती है। बलूची लोग चाहते हैं कि वहां से फ्रंटियर कोर की वापसी हो और उन पर लगाए गए मुकदमे वापस लिए जाएं।
बलूचियों को इस बात का भी मलाल है कि ग्वादर बंदरगाह पर उन्हें काम देने के बजाय चीनियों को काम दे दिया गया है। जबकि बंदरगाह के निर्माण के समय उनसे वादा किया गया था कि बलूचियों को काम दिया जाएगा। चीन आर्थिक गलियारों को ग्वादर बंदरगाह से जोड़कर इस क्षेत्र को अपनी कॉलोनी बनाना चाहता है। हाल ही में पांच चीनी इंजीनियरों की हत्या हुई और उसके लिए बलूचियों को जिम्मेदार ठहराया गया है। इन इंजीनियरों की हत्या के संदर्भ में पाकिस्तान चीन के आगे बेबस है।
पाकिस्तान भारत पर अक्सर आरोप लगाता रहता है कि भारत बलूचियों को भड़काता है। लेकिन यह पाकिस्तान का बहुत बड़ा झूठा है। भारत इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहता। ऐसे कई मौके आए हैं, जब विदेश में रह रहे बलूचियों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मदद मांगी, ताकि पाकिस्तान से उन्हें छुटकारा मिल सके। जिस तरह पाकिस्तान कश्मीर का मसला अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहता है, भारत को भी बलूचियों पर ढाए जा रहे जुल्मों के मसले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना चाहिए। इससे कश्मीर के बारे में दुष्प्रचार करने वाले पाकिस्तान का असली चेहरा बेनकाब हो जाएगा।