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पड़ोस: बांग्लादेश कहीं दूसरा पाकिस्तान न बन जाए, भारत को जरूरत है सख्त होने की

शिवदान सिंह
Updated Tue, 14 Jan 2025 07:29 AM IST

सार

बांग्लादेश में बढ़ते पाकिस्तानी और चीनी दखल को देखते हुए भारत को बांग्लादेश के प्रति भी पाकिस्तान की तरह सख्ती बरतने की जरूरत है।
 
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : ANI


इस कारण भारत की बांग्लादेश से लगती सीमाएं सुरक्षित थीं। लेकिन पाकिस्तानी आईएसआई ने परोक्ष युद्ध के द्वारा भारत के लिए एक नया मोर्चा खोलकर उसकी सेना को बांग्लादेश की जमीनी और समुद्री सीमाओं पर अपनी चौकसी बढ़ाने के लिए मजबूर कर दिया है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वीजा नियमों में ढील प्रदान कर दी है। इससे भारत के लिए युद्ध का एक तीसरा मोर्चा खड़ा हो गया है।  


पिछले काफी समय से चीन भी बांग्लादेश में सक्रिय है। इसलिए इसमें चीन का भी पूरा सहयोग पाकिस्तान को प्राप्त हो रहा है। शेख हसीना के सोलह साल के शासनकाल में बांग्लादेश एक गरीब देश की श्रेणी से निकलकर प्रगतिशील देश की श्रेणी में आ चुका था, जो पाकिस्तान को पसंद नहीं था। बांग्लादेश अब फिर कट्टरपंथ की राह पर है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान के चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष जनरल साहिर शमशाद मिर्जा ने बांग्लादेश को एक प्रस्ताव भेजा है, जिसके मुताबिक जनरल शमशाद मिर्जा खुद बांग्लादेश की सेना के ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट इन्फेंट्री और टैकटिस स्कूल, डिफेंस सर्विसेज कमांड स्कूल इत्यादि का दौरा करेंगे तथा वहां के स्टाफ कॉलेज में युवा अफसरों को संबोधित करेंगे। बांग्लादेश ने उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लिया है।


पाकिस्तान के तत्कालीन शासक पूर्वी पाकिस्तान को एक गुलाम देश की तरह रखते थे, जिससे शेख मुजीब उर रहमान ने भारत की मदद से आजादी दिलवाई थी। लेकिन पाकिस्तान ने बांग्लादेश को दोबारा अपने चंगुल में लेने के लिए मुस्लिम कट्टरपंथियों का सहारा लिया। इसके लिए पाकिस्तानी सेना ने जमाते इस्लामी की इकाई इस्लामी छात्र को भड़काकर उग्र प्रदर्शन करवाए और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत में शरण लेनी पड़ी। पाकिस्तान की इस हरकत में चीन ने उसे आर्थिक सहायता पहुंचाई, जिसके द्वारा जमाते इस्लामी अपना यह उग्र प्रदर्शन बांग्लादेश में चला रही थी। इस संगठन का उद्देश्य बांग्लादेश में भी अफगानिस्तान की तालिबान सरकार की तरह ही उग्रवादी सरकार स्थापित करना है। अब वह दिन दूर नहीं, जब पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश में भी मुस्लिम कट्टरपंथियों और उग्रवादियों के द्वारा चारों तरफ हिंसा का माहौल होगा और वह भी आर्थिक दृष्टि से पाकिस्तान की श्रेणी में पहुंच चुका होगा।  


दूसरी ओर, पिछले कुछ समय से भारत और चीन के बीच में संबंधों को सुधारने की प्रक्रिया चल रही है। परंतु भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन का धोखा देने का पुराना इतिहास रहा है। अभी पिछले काफी समय से चीन भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में अपनी गतिविधि बढ़ाने के लिए भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर कब्जा करना चाहता है और अपने इस मकसद को वह बांग्लादेश द्वारा पूरा करना चाहता है। इसलिए भारत को अब अपनी पूर्वी सीमाओं पर और भी ज्यादा चौकसी बरतने की जरूरत होगी। अब भारत को बांग्लादेश से इस प्रकार निपटना चाहिए, जिस प्रकार वह पाकिस्तान से निपट रहा है। इसको देखते हुए भारत को उसकी विकास योजनाओं से तब तक दूर रहना चाहिए, जब तक कि वह वहां पर हिंदू अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं करता और पाकिस्तान तथा चीन के प्रभाव से अपने को अलग नहीं करता।


खबरों के मुताबिक, बांग्लादेश में प्रतिदिन हिंदुओं के पूजा स्थलों को तोड़ा जा रहा है और उनकी स्त्रियों के साथ गलत किया जा रहा है। जबकि 1971 में भारत ने अपने 7,000 सैनिकों की बलि दी तथा अपनी एक पंचवर्षीय योजना का धन बांग्लादेश पर इसलिए खर्च किया था, ताकि बांग्लादेश पाकिस्तान के चंगुल से मुक्त होकर एक शांतिपूर्ण देश बन सके। लेकिन जब से वहां पर सत्ता परिवर्तन हुआ है, तब से लगातार हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं। इस कारण वहां से हिंदू पलायन करके भारत में शरण लेने के लिए मजबूर हो रहे हैं। भारत सरकार को इन सब को देखते हुए बांग्लादेश के विरुद्ध भी सख्त नीति अपनानी चाहिए, जिससे हमारी पूर्वी सीमा सुरक्षित हो तथा वहां पर हिंदुओं को पूरी सुरक्षा प्राप्त हो सके।

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