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भारत को म्यांमार के संकट से सतर्क रहने की जरूरत

के एस तोमर Published by: केएस तोमर Updated Thu, 01 Apr 2021 02:45 AM IST
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म्यांमार में प्रदर्शन

निर्वाचित सरकार को सत्ता से बेदखल करने वाले सत्ता के भूखे म्यांमार के सैन्य शासकों का प्रदर्शनकारियों पर दमन जारी है। इसके पीछे एक बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय दबाव की कमी भी है, क्योंकि रूस और चीन म्यांमार के सैन्य शासकों के साथ हैं। म्यांमार के इस संकट ने भारत के लिए शरणार्थियों की नई चुनौती पेश कर दी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शुक्रवार को पूर्वोत्तर के चार राज्यों- मिजोरम, नगालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश से कहा है कि वे म्यांमार से शरणार्थियों के संभावित गैरकानूनी प्रवाह को रोकने के लिए कानून के तहत उचित कार्रवाई करें। अपने पत्र में गृह मंत्रालय ने लिखा है कि उसने 25 फरवरी को ही इन राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ ही भारत-म्यांमार सीमा पर तैनात बॉर्डर गॉर्डिंग फोर्स (बीजीएफ) और असम राइफल्स को भारतीय क्षेत्र में शरणार्थियों के अवैध प्रवेश को लेकर सतर्क किया था।



पिछले साल के आखिर में हुए आम चुनाव में आंग सान सू की की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) पार्टी ने भारी बहुमत हासिल किया था, लेकिन म्यांमार के सैन्य शासकों ने एक फरवरी को तख्तापलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली। इसके बाद से जारी हिंसा में करीब पांच सौ प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। अमेरिका और यूरोपीय संघ ने सैन्य शासकों के खिलाफ कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, फिर भी सेना बर्बरता से प्रदशनकारियों का दमन कर रही है। सेना ने सू की सहित अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर एक साल के लिए देश में इमरजेंसी भी लगा दी है। सेना ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया था, जिसे वहां के चुनाव आयोग

ने खारिज कर दिया था। 


म्यांमार के हालात से सीमावर्ती राज्यों को सतर्क रहने की जरूरत है। मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरामथांगा ने हाल ही में म्यांमार के निर्वासित विदेश मंत्री जिन मार आंग से वर्चुल मीटिंग की थी और यह जानकारी उन्होंने सोशल मीडिया के जरिये स्वयं दी थी। उनकी इस मीटिंग को विदेश मंत्रालय की मंजूरी नहीं थी। शरणार्थियों का मसला वाकई बहुत नाजुक है, जिसमें सारे पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। मिजोरम म्यांमार से आए शरणार्थियों को वापस भेजने का इच्छुक नहीं है और उसने केंद्र से उन्हें राजनीतिक शरण देने की अपील की है। जोरामथांगा ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर केंद्र से आग्रह किया है कि इस मानवीय संकट को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यह स्थापित तथ्य है कि मिजोरम से सटे म्यांमार के सीमावार्ती क्षेत्र में चिन समुदाय के लोग रहते हैं, जो कि नस्लीय रूप से मिजो हैं और स्थानीय मिजो समुदाय के साथ उनके तबसे संबंध हैं जब भारत स्वतंत्र नहीं हुआ था। मुख्यमंत्री का कहना है कि यही वह भावनात्मक आधार है, जिसके कारण मिजोरम तटस्थ नहीं रह सकता।


भारत में शरणार्थियों को लेकर कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है, क्योंकि उसने 1951 की संयुक्त राष्ट्र संधि और शरणार्थियों की स्थिति से संबंधित 1967 के प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत सरकार ने 2011 में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए खुद को शरणार्थी बताने वाले विदेशी लोगों से निपटने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की थी। परिभाषा के मुताबिक, वैध यात्रा दस्तावेज के साथ भारत में प्रवेश करने वाला कोई विदेशी जो वैधता की सीमा पार होने के बाद भी रह रहा हो या फिर ऐसा विदेशी जिसने बिना वैध यात्रा दस्तावेज के भारत में प्रवेश किया हो, अवैध प्रवासी है और उसे निर्वासित किया जाएगा। 


राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सुरक्षा जांच के बाद ऐसे मामले दीर्घकालिक वीजा (एलटीवी) की अनुशंसा के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज सकते हैं,जिसमें प्रथमदृष्टया पाया जाए कि उन्हें जाति, धर्म, लिंग, राष्ट्रीयता, नस्लीय पहचान, किसी खास सामाजिक समूह की सदस्यता या खास राजनीतिक विचारधारा को मानने के कारण उत्पीड़ित किया गया हो। एलटीवी धारकों को निजी क्षेत्र में रोजगार पाने या किसी अकादमिक संस्थान में पंजीबद्ध होने की इजाजत होती है। म्यांमार के शरणार्थी इस श्रेणी में नहीं आते, इसीलिए केंद्र सरकार ने स्पष्ट रुख अपनाया है कि ऐसे लोगों को प्रोत्साहित नहीं किया जाए। 


 

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