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भारत को खुद अपनी राह बनानी होगी: ग्लोबल फॉर्च्यून 500 में शामिल होना आसान नहीं, घरेलू क्षमता मजबूत करनी होगी

अनंत स्वरूप, सेक्रेटरी जनरल, फिक्की Published by: न्यूज डेस्क Updated Tue, 01 Sep 2026 08:47 AM IST

सार

अगले 10 साल में ग्लोबल फॉर्च्यून 500 में भारतीय कंपनियों की संख्या नौ से बढ़ाकर 50 करने के लिए भारत को अपनी घरेलू क्षमता को मजबूत करना होगा।
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भारतीय कंपनियों की संख्या नौ से बढ़ाकर 50 करने का लक्ष्य (प्रतीकात्मक) - फोटो : एएनआई


ग्लोबल फॉर्च्यून 500 में भारत की नौ कंपनियां हैं। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भारत को इसमें 41 और कंपनियां जोड़नी होंगी, जो मौजूदा संख्या से पांच गुना से अधिक की छलांग होगी। 2026 की ग्लोबल फॉर्च्यून 500 सूची में अमेरिका की 141 और ग्रेटर चीन (हांगकांग सहित) की 122 कंपनियां हैं। अमेरिका ने मजबूत कैपिटल मार्केट्स और अग्रणी तकनीक व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिये, जबकि चीन ने सरकारी समर्थन वाली औद्योगिक नीति से कंपनियां खड़ी कर यह मुकाम हासिल किया। भारत का आंकड़ा बताता है कि अभी लंबी दूरी तय करनी है, पर संभावनाएं भी काफी हैं। भारत ने ऊंची वैल्यूएशन वाले कई यूनिकॉर्न बनाए हैं, लेकिन इन कंपनियों का रेवेन्यू अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है, जो इस सूची में जगह बनाने के लिए जरूरी है। इसलिए, ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना होगा, जो सालाना अरबों डॉलर्स का उत्पादन करने में सक्षम हों और तकनीक व बाजार तक पहुंच में प्रतिस्पर्धा कर सकें।


सबसे बढ़िया उदाहरण दक्षिण कोरिया का चेबोल मॉडल है। 1960 के दशक में सरकार ने निर्यात लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पारिवारिक व्यवसायों को चुना और उन्हें योजना व वित्तीय मदद दी, जबकि चेबोल ने इसे बड़े स्तर पर लागू किया। दोनों ने मिलकर निर्यात आधारित औद्योगीकरण को तेजी से बढ़ाया। वहीं युद्ध के बाद जापान ने रणनीतिक क्षेत्रों की पहचान की और सब्सिडी क्रेडिट प्रदान किए, जबकि कीरेत्सु कंपनियों को शोध एवं विकास को साझा करने और आपसी शेयरहोल्डिंग नेटवर्क के जरिये मिलकर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। यहां तक कि चीन की फॉर्च्यून 500 में बढ़त भी इसी तरह के राज्य-उद्योग समझौते पर टिकी हुई है। बैंकिंग, ऊर्जा और निर्माण जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पूंजी वाले सरकारी स्वामित्व वाले उद्यम पहले बड़े स्तर पर काम करने के लिए तैयार किए गए। फिर, सरकार के निर्देश पर इनका विस्तार और विलय हुआ, जिससे निर्यात बढ़ा तथा कंपनियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनीं।


भारत किसी भी एक मॉडल को नहीं अपना सकता, पर उपर्युक्त उदाहरणों में एक बात साफ है-सरकारी नीतियों ने पूंजी, बुनियादी ढांचा, सुरक्षा और निर्यात प्रोत्साहन जैसी सुविधाएं देकर अनुकूल माहौल बनाया, जबकि उद्योगों ने बेहतर प्रदर्शन, जोखिम लेने की क्षमता और वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा के साथ इसे आगे बढ़ाया। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में 2014 के बाद से किए गए मुक्त व्यापार समझौतों का जिक्र करते हुए इशारा किया कि वैश्विक बाजारों तक पहुंचने के लिए एमएसएमई और बड़ी फर्म्स, दोनों का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि भारत में कारोबारी माहौल को आसान बनाया जाए, विनिर्माण की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में लगातार निवेश किया जाए, विदेशी कर्ज पर निर्भर हुए बिना बड़े पैमाने पर धन जुटाने के लिए घरेलू पूंजी का इस्तेमाल किया जाए और भारतीय ब्रांडों को दुनियाभर में पहचान दिलाने पर भी जोर दिया जाए। भारतीय कॉरपोरेट जगत को वैश्विक स्तर हासिल करना अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। कंपनियों को मांग बढ़ने से पहले ही निवेश करना होगा। जहां बाजार का बिखराव कंपनियों के बड़े स्तर पर बढ़ने में बाधा बनता है, वहां रणनीतिक एकीकरण अपनाना होगा। साथ ही, छोटे-छोटे क्षेत्रों तक सीमित रहने के बजाय पूरी आपूर्ति शृंखला को एकसाथ विकसित करना होगा। निरंतर वैश्विक नेतृत्व के लिए शोध, डिजाइन, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, प्रोडक्ट डेवलपमेंट और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप पर अधिक निवेश करने की आवश्यकता होगी।


भारतीय कंपनियों को बड़े और पहचान वाले वैश्विक ब्रांड बनाने की जरूरत है, न कि केवल दूसरे ब्रांडों के लिए सेवा प्रदाता या कुशल निर्माता बने रहने की। चुनौती इस सोच को एक मजबूत व टिकाऊ व्यवस्था में बदलने की है, जिसमें भारतीय कंपनियां लंबे समय तक निवेश कर सकें, बड़े स्तर पर नवाचार कर सकें और वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा कर सकें। अन्यथा, भारत की मौजूदा नौ कंपनियों से 50 वैश्विक कंपनियों तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा स्वतंत्रता दिवस पर कही गई महज एक पंक्ति बनकर रह जाएगी।  

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