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कितनी सुरक्षित है हमारी थाली?: विदेशों में खारिज हो रहे भारतीय कृषि उत्पाद, कीटनाशकों पर सख्त सुधार की जरूरत

ऋषभ मिश्रा Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 17 Jul 2026 06:06 AM IST

सार

जापान से लेकर चीन तक भारतीय कृषि उत्पादों का ठुकराया जाना एक गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आखिर हमारी अपनी थाली कितनी सुरक्षित है।
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भारतीय भोजन की थाली - फोटो : AI


दरअसल, किसान ऐसे कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन्हें विकसित देशों ने प्रतिबंधित कर रखा है, जैसे क्लोरपाइरीफॉस, प्रोफेनोफॉस, पैराक्वाट, मोनोक्रोटोफॉस। देश के कई कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विस्तार सेवाएं इन कीटनाशकों की सिफारिश करती हैं, बिना इस बात पर ध्यान दिए कि वैश्विक स्तर पर इनकी क्या स्थिति है। इसके अलावा, कम से कम 40 फीसदी कीटनाशक ऐसे हैं, जो पंजीकृत नहीं हैं या नकली हैं। इससे इन कीटनाशकों में कौन-से तत्व हैं या वे कितने घातक हैं, इसका पता ही नहीं चल पाता। वहीं दूसरी तरफ, भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए एफएसएसएआई, कीटनाशकों के पंजीकरण के लिए केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड और राज्य स्तरीय इकाइयां काम कर रही हैं। पर, इनके बीच तालमेल नहीं है। कीटनाशक अधिनियम (1968) का लचर कानून भी आड़े आ जाता है। वस्तुतः भारत में कीटनाशक उद्योग बेहद संगठित है। बीते कुछ वर्षों में उद्योग के दबाव के कारण एआईएनपीपीआर जैसे अहम राष्ट्रीय निगरानी कार्यक्रम कमजोर हो गए हैं।


हालांकि, सरकार ने मई 2020 में 27 घातक कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करने के लिए एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया था, पर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। गौरतलब है कि भोजन में रसायनिक पदार्थों का जोखिम इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम कौन-सी चीज कितनी मात्रा में और कितनी बार खाते हैं। पालक, मेथी एवं धनिया इस सूची में सबसे ऊपर हैं, क्योंकि इन पर कीटनाशकों का भारी छिड़काव होता है। इनके ऊपर छिलके जैसी सुरक्षा नहीं होती, इसलिए इन्हें खाना खतरनाक हो सकता है। भिंडी, बैंगन और टमाटर तथा अंगूर, स्ट्रॉबेरी व आलूबुखारे जैसे फल भी इसी श्रेणी में आते हैं। वहीं, मसालों में सबसे ज्यादा कीटनाशक अवशेष पाए गए हैं। मगर, घरेलू उपभोक्ताओं के पास यह जानने का कोई उपाय नहीं है कि किस मसाले में कीटनाशकों के अवशेष कितनी मात्रा में हैं।


सरकार को नीतिगत स्तर पर तीन कदमों को प्राथमिकता देनी चाहिए। पहला, सभी प्रमुख खाद्य श्रेणियों की स्वतंत्र प्रयोगशालाओं में व्यापक स्तर पर जांच हो और उसके नतीजे तुरंत सार्वजनिक किए जाएं। दूसरा, मोनोक्रोटोफॉस, पैराक्वाट और क्लोरपाइरीफॉस जैसे रसायनों को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए और किसानों को वित्तीय व तकनीकी सहायता दी जाए। नकली कीटनाशकों को बाजार से बाहर किया जाना चाहिए। तीसरा, जरूरत ऐसी मजबूत संस्था की है, जो कीटनाशक पंजीकरण से लेकर बिकने वाले खाद्य पदार्थों तक, पूरी शृंखला की निगरानी करे। पेस्टिसाइड्स मैनेजमेंट बिल-2025 इस दिशा में एक अवसर हो सकता है।
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