फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

अमेरिका से व्यापार : पारस्परिक टैरिफ पर भारत की चिंताएं, घरेलू हितों की रक्षा के साथ संतुलन की दरकार

केएस तोमर
Updated Sat, 22 Feb 2025 06:50 AM IST

सार

ट्रंप द्वारा लगाए गए पारस्परिक टैरिफ से भारतीय निर्यातकों को सालाना करीब सात अरब डॉलर के नुकसान की आशंका है। मौजूदा वैश्विक व्यापार तनाव के परिदृश्य में भारत को अपने घरेलू हितों की रक्षा करते हुए बड़ी चतुराई से अमेरिका से पारस्परिक टैरिफ में संतुलन बनाने की जरूरत है।
विज्ञापन
विज्ञापन
भारत-अमेरिका। - फोटो : AI


अमेरिका के साथ अधिक न्यायसंगत व्यापार संबंधों को बढ़ावा देने के साथ भारत के लिए चुनौती अपने घरेलू उद्योगों की रक्षा की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना है। अमेरिकी पक्ष का ध्यान व्यापार असंतुलन को दूर करने और अपने निर्यातकों के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने पर है। सिटी रिसर्च के विश्लेषकों के अनुसार, सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में रसायन, धातु उत्पादन और आभूषण हैं, इसके बाद ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स और खाद्य पदार्थ आते हैं। भारत द्वारा आयात पर उच्च टैरिफ दरों पर जोर देने के कारण अमेरिकी निर्यातकों के लिए भारतीय बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। इन उद्योगों को न केवल बाजार पहुंच में कमी का सामना करना पड़ सकता है, बल्कि बढ़ी हुई लागतों का भी सामना करना पड़ सकता है, जो व्यापार असंतुलन को और बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, अमेरिका को भारत के व्यापारिक निर्यात, जिसका मूल्य वर्ष 2024 में अनुमानित 74 अरब डॉलर था, में कई उत्पाद शामिल हैं। इनमें 8.5 अरब डॉलर के मोती, रत्न, आभूषण, आठ अरब डॉलर की दवाएं और चार अरब डॉलर के पेट्रोकेमिकल पदार्थ शामिल हैं। अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में है। ऐसे में टैरिफ में कोई भी वृद्धि भारत के निर्यात क्षेत्रों और अमेरिका के साथ समग्र व्यापार संबंधों को प्रभावित कर सकती है। कपड़ा, चमड़ा और हस्तशिल्प जैसे श्रम-केंद्रित उद्योगों के लिए दांव विशेष रूप से ऊंचे हैं, जो लाखों श्रमिकों को रोजगार देते हैं और भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।


दोनों देशों के बीच टैरिफ दर में महत्वपूर्ण अंतर है। वर्ष 2023 में भारत ने आयात पर औसतन 11 फीसदी टैरिफ लगाया, जो भारतीय निर्यात पर अमेरिकी टैरिफ दरों से लगभग 8.2 प्रतिशत अंक अधिक था। कृषि वस्तुओं के मामले में यह असमानता और भी स्पष्ट थी। जबकि अमेरिका द्वारा कृषि उत्पादों पर लागू किया जाने वाला औसत सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र (एमएफएन) टैरिफ पांच प्रतिशत था, भारत ने 39 प्रतिशत का चौंका देने वाला शुल्क लगाया, जो टैरिफ संरचनाओं में तीव्र असंतुलन को दर्शाता है। यह असमानता अक्सर द्विपक्षीय व्यापार वार्ता में अड़चन रही है, जिसमें समानता के लिए अमेरिका जोर देता है, जबकि भारत अपने घरेलू उद्योगों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए अपने उच्च टैरिफ को जरूरी बताता है। राष्ट्रपति ट्रंप के हालिया बयानों से पता चलता है कि वह अनुचित व्यापार प्रथाओं के बारे में आक्रामक रुख अपना रहे हैं। ट्रंप का लक्ष्य भारत की व्यापार नीतियों का पुनः समायोजित करना है, भले ही इससे व्यापक व्यापार टकराव का जोखिम उठाना पड़े। सिटी रिसर्च के अनुसार, इन प्रस्तावित टैरिफ से भारत को करीब सात अरब डॉलर का वार्षिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। सरकारी अधिकारी प्रतिकूल प्रभावों का मुकाबला करने के लिए आकस्मिक योजनाओं पर काम कर रहे हैं। इनमें टैरिफ को कम करने और अमेरिका से द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक व्यापार प्रस्ताव का मसौदा तैयार करना भी शामिल है। पारस्परिक टैरिफ भारत के कृषि क्षेत्र को भारी झटका दे सकता है। चुनावों में ग्रामीण क्षेत्रों पर सरकार की निर्भरता को देखते हुए इसका राजनीतिक प्रभाव भी हो सकता है।


सरकार कथित तौर पर अधिक अनुकूल शर्तों के लिए लॉबिंग की तैयारी कर रही है, और अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए निर्यात बाजारों में विविधता लाने पर भी काम कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि श्रम-प्रधान उद्योगों को या तो कम टैरिफ अंतर या द्विपक्षीय व्यापार में सीमित हिस्सेदारी के कारण अपेक्षाकृत कम जोखिम का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, दक्षिण एशिया में काम करने वाली कई अमेरिकी कंपनियों को भारत के मुक्त व्यापार समझौतों से लाभ मिलता है, जिससे वे इस क्षेत्र में माल उत्पादन कर उन्हें कम टैरिफ दरों पर भारतीय बाजार में बेच सकते हैं। यह टैरिफ वृद्धि के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकता है। हालांकि, इस रणनीति की दीर्घकालिक स्थिरता अनिश्चित है, क्योंकि यह भू-राजनीतिक माहौल और दोनों देशों की इच्छा पर निर्भर करता है। स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, अमेरिका द्वारा भारत से आयातित सभी वस्तुओं और सेवाओं पर एक समान 10 प्रतिशत की टैरिफ वृद्धि से भारतीय निर्यात में 11-12 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। यह भारत की जीडीपी वृद्धि को 50 से 60 आधार अंकों तक प्रभावित कर सकता है, जो बढ़ते व्यापार युद्ध के संभावित आर्थिक परिणामों को रेखांकित करता है। ऐसे में बेरोजगारी, महंगाई और मुद्रा अस्थिरता जैसी समस्याएं बढ़ेंगी। भारत को अपने घरेलू हितों की रक्षा करने और वैश्विक मंच पर एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है। आने वाले महीने यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होंगे कि क्या भारत और अमेरिका आम सहमति बना सकते हैं या पारस्परिक शुल्क का भूत उनकी आर्थिक साझेदारी को प्रभावित करेगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next