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देपसांग के रास्ते या दोकलम के?

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 19 Jul 2020 01:05 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI

गुत्थी सुलझती नहीं दिख रही है। मैंने पिछले हफ्ते लिखा था, '12 अक्तूबर, 2019 को महाबलीपुरम में ऐसा लगता है कि शी जिनपिंग ने तेजी से नीचे जाती अर्थव्यवस्था के कारण भारत की कमजोर होती स्थिति का सटीक आकलन कर लिया था। वहीं मोदी शी के इरादों को भांपने में पूरी तरह से नाकाम रहे।' ऐसा लगता है कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल महाबलीपुरम के सूर्योदय की चमक में खो गया और 2020 को भारत-चीन सांस्कृतिक तथा दोनों देशों के लोगों के परस्पर आदान-प्रदान का वर्ष बताने लगा था। रिश्ते की यह खुशमिजाजी बाद में 21 दिसंबर को दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों की बैठक में भी जारी रही।

लेकिन अब यह उजागर हो चुका है कि शी ने जनवरी, 2020 में सैन्य प्रशिक्षण से संबंधित ट्रेनिंग मोबलाइजेशन ऑर्डर (टीएमओ) ( देखें, द हिंदू, 13 जुलाई, 2020) पर हस्ताक्षर किए थे। इस आदेश के बाद पीएलए ने भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के अपने हिस्से में सैनिकों का जमावड़ा और नियोजन शुरू कर दिया। एक अन्य रिपोर्ट (इंडियन एक्सप्रेस, 15 जुलाई, 2020) में एक खुफिया अधिकारी के हवाले से बताया गया कि चीनी सैनिकों की हलचल से संबंधित पहली खुफिया रिपोर्ट अप्रैल मध्य में ही उपलब्ध हो गई थी।



सवाल जिनके जवाब की जरूरत है, अनेक सवाल उठते हैं :

  1. क्या विदेश मंत्रालय और सैन्य मुख्यालय इस नए टीएमओ से वाकिफ था?
  2. क्या सैन्य खुफिया और रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग ने एलएसी के चीन की ओर सैन्य बलों की हलचल का पता नहीं लगाया?
  3. क्या हमारे उपग्रहों ने गलवां घाटी और पैंगोंग त्सो के बीच 200 किलोमीटर लंबी पट्टी में एलएसी की ओर बढ़ते चीनी वाहनों तथा सैन्य बलों की तस्वीरें कैद नहीं की?
  4. क्या अप्रैल-मध्य की खुफिया रिपोर्ट्स उच्च स्तर पर साझा की गईं और निष्कर्ष निकाले गए? 

ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब भले आज नहीं, लेकिन नियत समय में मिलने चाहिए। दोनों देश अब सैनिकों की वापसी और तनाव घटाने जैसी कवायद में जुटे हुए हैं। यह अपने आप में अच्छी कवायद है और मैं इसका समर्थन करता हूं। युद्धों ने कभी सीमा संबंधी विवाद नहीं सुलझाया। टीवी के एंकर-जनरलों के उपदेशों के बावजूद भारत और चीन के बीच युद्ध कोई विकल्प नहीं है। यह सुखद है कि प्रधानमंत्री ने इस सच को स्वीकार किया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि क्या शी भी मानते हैं कि 'युद्ध कोई विकल्प नहीं है'। यह संभव हो सकता है कि पीएलए ने शी को राजी कर लिया हो कि भारत को सीमित युद्ध जैसे हालात की ओर धकेलना व्यावहारिक विकल्प है और पीएलए दो कदम आगे बढ़कर एक कदम पीछे खींच सकती है।

हाल के दो उदाहरण हैं, जिन पर विचार करें। देपसांग (2013) और दोकलम (2017)। चीनियों ने देपसांग से कब्जा पूरी तरह से छोड़़ दिया था। मगर दोकलम, जैसा कि पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने कहा, 'इसकी शुरुआत 2017 में दोकलम से हुई जब हमने टकराव के बिंदु से दोनों ओर से वापसी के लिए बातचीत की। इसके बाद चीनियों ने आगे बढ़कर पठार में मजबूत और स्थायी उपस्थिति दर्ज की, जिससे टकराव का बिंदु अपने आप ही मुक्त हो गया।'

मेनन ने दोकलम पर सरकार से बात की और कहा, 'चीन ने सबक सीखा है कि जब तक भारतीय सरकार प्रचार युद्ध से खुश होती रहेगी, वह वास्तव में लाभ अर्जित कर सकता है और जमीनी स्थितियों को अपने पक्ष में कर सकता है।' इस साक्षात्कार (13 जुलाई, 2020) के छह दिन बाद तक सरकार ने दोकलम की वास्तविक जमीनी स्थिति के बारे में कुछ नहीं बताया। क्या चीन ने दोकलम के पठार में मजबूत और स्थायी मौजूदगी स्थापित कर ली है? क्या चीनी मौजूदगी को लेकर भूटान मौन है, क्योंकि वह बेबस है तथा भारत भूटान के पक्ष में नहीं बोलेगा?

इन सवालों के कोई जवाब नहीं मिले हैं। गलत कहानी बताई जा रही है कि भारत ने दोकलम में चीनी अतिक्रमण को खत्म कर दिया है और यह मोदी के नेतृत्व की महत्वपूर्ण विजय है!

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
गुत्थी सुलझती नहीं दिख रही है। मैंने पिछले हफ्ते लिखा था, '12 अक्तूबर, 2019 को महाबलीपुरम में ऐसा लगता है कि शी जिनपिंग ने तेजी से नीचे जाती अर्थव्यवस्था के कारण भारत की कमजोर होती स्थिति का सटीक आकलन कर लिया था। वहीं मोदी शी के इरादों को भांपने में पूरी तरह से नाकाम रहे।' ऐसा लगता है कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल महाबलीपुरम के सूर्योदय की चमक में खो गया और 2020 को भारत-चीन सांस्कृतिक तथा दोनों देशों के लोगों के परस्पर आदान-प्रदान का वर्ष बताने लगा था। रिश्ते की यह खुशमिजाजी बाद में 21 दिसंबर को दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों की बैठक में भी जारी रही।

लेकिन अब यह उजागर हो चुका है कि शी ने जनवरी, 2020 में सैन्य प्रशिक्षण से संबंधित ट्रेनिंग मोबलाइजेशन ऑर्डर (टीएमओ) ( देखें, द हिंदू, 13 जुलाई, 2020) पर हस्ताक्षर किए थे। इस आदेश के बाद पीएलए ने भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के अपने हिस्से में सैनिकों का जमावड़ा और नियोजन शुरू कर दिया। एक अन्य रिपोर्ट (इंडियन एक्सप्रेस, 15 जुलाई, 2020) में एक खुफिया अधिकारी के हवाले से बताया गया कि चीनी सैनिकों की हलचल से संबंधित पहली खुफिया रिपोर्ट अप्रैल मध्य में ही उपलब्ध हो गई थी।

सवाल जिनके जवाब की जरूरत है, अनेक सवाल उठते हैं :
  1. क्या विदेश मंत्रालय और सैन्य मुख्यालय इस नए टीएमओ से वाकिफ था?
  2. क्या सैन्य खुफिया और रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग ने एलएसी के चीन की ओर सैन्य बलों की हलचल का पता नहीं लगाया?
  3. क्या हमारे उपग्रहों ने गलवां घाटी और पैंगोंग त्सो के बीच 200 किलोमीटर लंबी पट्टी में एलएसी की ओर बढ़ते चीनी वाहनों तथा सैन्य बलों की तस्वीरें कैद नहीं की?
  4. क्या अप्रैल-मध्य की खुफिया रिपोर्ट्स उच्च स्तर पर साझा की गईं और निष्कर्ष निकाले गए? 
ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब भले आज नहीं, लेकिन नियत समय में मिलने चाहिए। दोनों देश अब सैनिकों की वापसी और तनाव घटाने जैसी कवायद में जुटे हुए हैं। यह अपने आप में अच्छी कवायद है और मैं इसका समर्थन करता हूं। युद्धों ने कभी सीमा संबंधी विवाद नहीं सुलझाया। टीवी के एंकर-जनरलों के उपदेशों के बावजूद भारत और चीन के बीच युद्ध कोई विकल्प नहीं है। यह सुखद है कि प्रधानमंत्री ने इस सच को स्वीकार किया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि क्या शी भी मानते हैं कि 'युद्ध कोई विकल्प नहीं है'। यह संभव हो सकता है कि पीएलए ने शी को राजी कर लिया हो कि भारत को सीमित युद्ध जैसे हालात की ओर धकेलना व्यावहारिक विकल्प है और पीएलए दो कदम आगे बढ़कर एक कदम पीछे खींच सकती है।

हाल के दो उदाहरण हैं, जिन पर विचार करें। देपसांग (2013) और दोकलम (2017)। चीनियों ने देपसांग से कब्जा पूरी तरह से छोड़़ दिया था। मगर दोकलम, जैसा कि पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने कहा, 'इसकी शुरुआत 2017 में दोकलम से हुई जब हमने टकराव के बिंदु से दोनों ओर से वापसी के लिए बातचीत की। इसके बाद चीनियों ने आगे बढ़कर पठार में मजबूत और स्थायी उपस्थिति दर्ज की, जिससे टकराव का बिंदु अपने आप ही मुक्त हो गया।'

मेनन ने दोकलम पर सरकार से बात की और कहा, 'चीन ने सबक सीखा है कि जब तक भारतीय सरकार प्रचार युद्ध से खुश होती रहेगी, वह वास्तव में लाभ अर्जित कर सकता है और जमीनी स्थितियों को अपने पक्ष में कर सकता है।' इस साक्षात्कार (13 जुलाई, 2020) के छह दिन बाद तक सरकार ने दोकलम की वास्तविक जमीनी स्थिति के बारे में कुछ नहीं बताया। क्या चीन ने दोकलम के पठार में मजबूत और स्थायी मौजूदगी स्थापित कर ली है? क्या चीनी मौजूदगी को लेकर भूटान मौन है, क्योंकि वह बेबस है तथा भारत भूटान के पक्ष में नहीं बोलेगा?

इन सवालों के कोई जवाब नहीं मिले हैं। गलत कहानी बताई जा रही है कि भारत ने दोकलम में चीनी अतिक्रमण को खत्म कर दिया है और यह मोदी के नेतृत्व की महत्वपूर्ण विजय है!

कहां से कहां आ गए?

एलएसी से सटे कई बिंदुओं पर चल रहे ताजा तनाव का हस्र देपसांग जैसा हो सकता है या दोकलम जैसा। आगे बढ़ने से पहले आपके मन में साफ होना चाहिए कि वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दो धारणाएं ( या नजरिये हैं)। एक है चीनी अवधारणा और दूसरी है भारतीय अवधारणा। अपने मन में इस महत्वपूर्ण अंतर को ध्यान में रखकर तथ्यों का परीक्षण कीजिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों पक्ष पीछे हट रहे हैं। सवाल है कि वे कहां से कहां तक पीछे हट रहे हैं।

चलिए चीन से शुरू करते हैं। यदि चीनी बलों ने उनकी अपनी अवधारणा के मुताबिक एलएसी नहीं लांघी है, तो फिर वे अपने क्षेत्र से पीछे हटकर अपने क्षेत्र में ही जा रहे हैं। इसमें क्षेत्र का कोई नुकसान नहीं हुआ। यदि उनकी अवधारणा के मुताबिक चीनी बलों ने एलएसी को लांघा है, तो वास्तव में वे अवैध तरीके से कब्जा किए गए भारतीय क्षेत्र को खाली कर रहे हैं।

भारत की स्थिति हमारी अवधारणा के अनुसार यह है कि हमारे बलों ने कभी एलएसी को नहीं लांघा, यहां तक कि 15-16 जून को भी नहीं। भारत ने कर्नल संतोष बाबू और उनकी टीम ने भारतीय क्षेत्र में बनाए गए ढांचे पर आपत्ति जताते हुए जो कार्रवाई की थी, उसका बचाव किया। इस ढांचे को पांच जून को कमांडर स्तर की बातचीत में बनी सहमति के आधार पर हटाया जाना था। बिना चूक के निष्कर्ष तो यही निकलता है कि भारत अपने खुद के क्षेत्र से पीछे हटकर अपने खुद के क्षेत्र में जा रहा है।

यथास्थिति कब तक ?

यह व्यावहारिक समझ है कि दोनों पक्षों के बलों की नई स्थितियों के बीच नो ट्रूप्स लैंड (नो मैन्स लैंड जैसा) बनाया जाएगा। चाहे चीनी अवधारणा से देखें या भारतीय अवधारणा से, यह वह जमीन है, जहां एलएसी है। यह जगह सीमा पर शांति और स्थिरता कायम कर सकती है, लेकिन इससे सीमा संबंधी मुद्दे हल नहीं होंगे। यह स्वाभाविक है कि बफर जोन का निर्माण किया जाए। बफर जोन का निर्माण पांच, मई 2020 की यथास्थिति का भारत का घोषित लक्ष्य नहीं है। अभी यह दूर नजर आता है। आपको बारीकी से घटनाक्रम पर नजर रखनी चाहिए।
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