गुत्थी सुलझती नहीं दिख रही है। मैंने पिछले हफ्ते लिखा था, '12 अक्तूबर, 2019 को महाबलीपुरम में ऐसा लगता है कि शी जिनपिंग ने तेजी से नीचे जाती अर्थव्यवस्था के कारण भारत की कमजोर होती स्थिति का सटीक आकलन कर लिया था। वहीं मोदी शी के इरादों को भांपने में पूरी तरह से नाकाम रहे।' ऐसा लगता है कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल महाबलीपुरम के सूर्योदय की चमक में खो गया और 2020 को भारत-चीन सांस्कृतिक तथा दोनों देशों के लोगों के परस्पर आदान-प्रदान का वर्ष बताने लगा था। रिश्ते की यह खुशमिजाजी बाद में 21 दिसंबर को दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों की बैठक में भी जारी रही।
लेकिन अब यह उजागर हो चुका है कि शी ने जनवरी, 2020 में सैन्य प्रशिक्षण से संबंधित ट्रेनिंग मोबलाइजेशन ऑर्डर (टीएमओ) ( देखें, द हिंदू, 13 जुलाई, 2020) पर हस्ताक्षर किए थे। इस आदेश के बाद पीएलए ने भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के अपने हिस्से में सैनिकों का जमावड़ा और नियोजन शुरू कर दिया। एक अन्य रिपोर्ट (इंडियन एक्सप्रेस, 15 जुलाई, 2020) में एक खुफिया अधिकारी के हवाले से बताया गया कि चीनी सैनिकों की हलचल से संबंधित पहली खुफिया रिपोर्ट अप्रैल मध्य में ही उपलब्ध हो गई थी।
ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब भले आज नहीं, लेकिन नियत समय में मिलने चाहिए। दोनों देश अब सैनिकों की वापसी और तनाव घटाने जैसी कवायद में जुटे हुए हैं। यह अपने आप में अच्छी कवायद है और मैं इसका समर्थन करता हूं। युद्धों ने कभी सीमा संबंधी विवाद नहीं सुलझाया। टीवी के एंकर-जनरलों के उपदेशों के बावजूद भारत और चीन के बीच युद्ध कोई विकल्प नहीं है। यह सुखद है कि प्रधानमंत्री ने इस सच को स्वीकार किया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि क्या शी भी मानते हैं कि 'युद्ध कोई विकल्प नहीं है'। यह संभव हो सकता है कि पीएलए ने शी को राजी कर लिया हो कि भारत को सीमित युद्ध जैसे हालात की ओर धकेलना व्यावहारिक विकल्प है और पीएलए दो कदम आगे बढ़कर एक कदम पीछे खींच सकती है।
हाल के दो उदाहरण हैं, जिन पर विचार करें। देपसांग (2013) और दोकलम (2017)। चीनियों ने देपसांग से कब्जा पूरी तरह से छोड़़ दिया था। मगर दोकलम, जैसा कि पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने कहा, 'इसकी शुरुआत 2017 में दोकलम से हुई जब हमने टकराव के बिंदु से दोनों ओर से वापसी के लिए बातचीत की। इसके बाद चीनियों ने आगे बढ़कर पठार में मजबूत और स्थायी उपस्थिति दर्ज की, जिससे टकराव का बिंदु अपने आप ही मुक्त हो गया।'
मेनन ने दोकलम पर सरकार से बात की और कहा, 'चीन ने सबक सीखा है कि जब तक भारतीय सरकार प्रचार युद्ध से खुश होती रहेगी, वह वास्तव में लाभ अर्जित कर सकता है और जमीनी स्थितियों को अपने पक्ष में कर सकता है।' इस साक्षात्कार (13 जुलाई, 2020) के छह दिन बाद तक सरकार ने दोकलम की वास्तविक जमीनी स्थिति के बारे में कुछ नहीं बताया। क्या चीन ने दोकलम के पठार में मजबूत और स्थायी मौजूदगी स्थापित कर ली है? क्या चीनी मौजूदगी को लेकर भूटान मौन है, क्योंकि वह बेबस है तथा भारत भूटान के पक्ष में नहीं बोलेगा?
इन सवालों के कोई जवाब नहीं मिले हैं। गलत कहानी बताई जा रही है कि भारत ने दोकलम में चीनी अतिक्रमण को खत्म कर दिया है और यह मोदी के नेतृत्व की महत्वपूर्ण विजय है!