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विश्लेषण: भारत ग्लोबल साउथ को कर सकता है एकजुट लेकिन वैश्विक अव्यवस्था के बीच लेने होंगे संकल्प

शंकर अय्यर
Updated Tue, 02 Jan 2024 09:19 AM IST

सार

भारत का उदय स्वाभाविक रूप से निगरानी और खतरों को जन्म देता है, क्योंकि घरेलू राजनीति भू-राजनीति को प्रभावित करती है। कामकाज की शैली और प्रतिक्रियाओं के मापांकन पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। भावनात्मक विश्लेषण के इस युग में लाठियां और पत्थर तो हड्डियों को चोट पहुंचाएंगे, लेकिन शब्द कलंकित कर सकते हैं।
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भारत का झंडा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay


यहां कुछ प्रस्ताव सुझाए गए हैं, जिनकी शुरुआत उन बहुपक्षीय एजेंसियों में सुधारों से होती है, जिन्हें नियम-आधारित विश्व व्यवस्था को मजबूत करने का काम सौंपा गया है और जिस पर भारत ने काफी समय और श्रम खर्च किया है। संयुक्त राष्ट्र एक ऐसी अपवाद संस्था है, जो उत्तरोत्तर अपनी प्रासंगिकता घटाती जा रही है। इसी कारण आज दुनिया भर में 30 से अधिक संघर्ष के क्षेत्र बन चुके हैं। यूक्रेन युद्ध में किसी के विजेता होने की उम्मीद नहीं है और लगभग हर कोई चाहता है कि गाजा में युद्ध खत्म हो। शांति बाध्यकारी और गैर-बाध्यकारी संकल्पों में उलझी हुई है और उसे वीटो की ताकत वाले उन देशों द्वारा नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जो वैश्विक आबादी के छठे हिस्से से भी कम का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत संयुक्त राष्ट्र में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और सुधारों के लिए समझौता करने और वीटो धारक देशों से निपटने के लिए जी-20 की तरह ग्लोबल साउथ को एकजुट कर सकता है।


भारत का उदय स्वाभाविक रूप से निगरानी और खतरों को जन्म देता है, क्योंकि घरेलू राजनीति भू-राजनीति को प्रभावित करती है। कामकाज की शैली और प्रतिक्रियाओं के मापांकन पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। भावनात्मक विश्लेषण के इस युग में लाठियां और पत्थर तो हड्डियों को चोट पहुंचाएंगे, लेकिन शब्द कलंकित कर सकते हैं। भारत को दुनिया भर में अपने विदेशी सेवा कैडर का विस्तार करने की जरूरत है, ताकि वे उन परिभाषाओं पर सहयोग कर उन्हें फिर से तैयार करने में मदद कर सके, जो मायने रखती हैं। इसके लिए सक्रिय ढाल बनाने, अप्रासंगिक सिद्धांतों का मुकाबला करने और दोहरेपन को उजागर करने की आवश्यकता है। दोहा के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन की विफलता के बाद से विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का मृत्युलेख लिखा जा रहा है। मुक्त व्यापार के विचार को इसके प्रचारकों ने ही त्याग दिया है, जो अब संरक्षणवाद की वकालत कर रहे हैं। डब्ल्यूटीओ की अपीलीय संस्था 2020 से मृत है और मध्यस्थता सहयोगी व्यापारिक गुटों तक सीमित है। कैनकन में हुई मंत्रिस्तरीय बैठक की तरह भारत को डब्ल्यूटीओ की वैधता को फिर से जिलाने के लिए अर्थव्यवस्थाओं का गठबंधन बनाने की जरूरत है। बेहतर दिशा में पहला कदम उठाने से अगले मंत्रिस्तरीय बैठक की मेजबानी करने और अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा।


वर्ष 1944 में ब्रेटन बुड्स सम्मेलन में गठित दो संस्थानों, आईएमएफ और विश्व बैंक, ने उस समय के उद्देश्य पूरे कर लिए हैं। अतएव नई वास्तविकताओं के अनुरूप इनकी भूमिकाओं को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है। भारत डिजिटल बुनियादी ढांचे में अग्रणी और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में भारत के पास सहयोग करने और एक नया ढांचा पेश करने का अवसर है। आईएमएफ को राहत पैकेज से आगे बढ़कर आने वाले संकटों की भविष्यवाणी करने के लिए डाटा पेश करने और लचीलेपन के लिए नीतियां तैयार करने की जरूरत है। जबकि विश्व बैंक को अर्थव्यवस्थाओं में बदलाव को वित्तपोषित करने के लिए नए ढंग से स्थापित किया जाना चाहिए।


चूंकि भारत वैश्विक बदलाव का भागीदार है, उसे अपने विकास को बनाए रखने के लिए घरेलू स्तर पर क्षमता तैयार करने और लचीलेपन की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान से पता चलता है कि अगले चार दशकों तक भारत की कामकाजी आबादी घटने वाली नहीं है। लेकिन जनसांख्यिकी नियति नहीं है। भारत को व्यवसाय मॉडल में विघटनकारी बदलाव के खातिर तैयार रहने के लिए मानव पूंजी में निवेश करना चाहिए। स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर अधिक खर्च करने का वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है। गारंटी के इस दौर में क्या राजनीतिक दल स्वास्थ्य, शिक्षा व कौशल विकास के लिए धन खर्च करने पर प्रतिबद्धता जताएंगे?


जनमत सर्वेक्षणों में बेरोजगारी शीर्ष चिंता का विषय है। नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण से पता चलता है कि 45 प्रतिशत से अधिक श्रमिक कृषि से प्राप्त राष्ट्रीय आय के छठे हिस्से पर निर्भर हैं और मात्र 11 फीसदी लोग विनिर्माण नौकरियों पर निर्भर हैं। संरचनात्मक रूप से केवल 20.8 फीसदी श्रमिक ही नियमित वेतन पर काम करते हैं, 22 फीसदी आकस्मिक मजदूर हैं। जनसांख्यिकीय उभार का उल्टा होना राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानूनों व विनियमों में सुधार और निवेश शिखर सम्मेलन के साथ पीएलआई योजनाओं जैसी नीतियों के तालमेल पर निर्भर करता है। और हां, रोजगार सृजन की बेहतर मैपिंग इसमें मदद करेगा, जो नीति आयोग के लिए उपयुक्त कार्य है।


भारत वादे और प्रदर्शन के चौराहे पर खड़ा है। सफलता राष्ट्रीय हित पर विभिन्न पार्टियों के बीच सहमति पर निर्भर करती है। इसके लिए घरेलू राजनीति में संवाद की बहाली जरूरी है। संसद में हुआ तमाशा और पार्टी हित पर जोर चिंताजनक है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि अगर चीजें गलत होती हैं, तो यह खराब संविधान के कारण नहीं, बल्कि 'बुरे लोगों' के कारण होंगी। भारतीय राजनीति में अच्छे लोगों को अवश्य सामने आना चाहिए।

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