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पड़ताल: अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण, प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने से होगा उपभोक्ताओं का लाभ

नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Mon, 03 Jul 2023 06:57 AM IST

सार

दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया की सरकारों ने अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए मुट्ठी भर कंपनियों को प्रोत्साहित किया और फिर सब कुछ खस्ताहाल हो गया। भारत उस रास्ते पर न जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना चाहिए।
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भारतीय अर्थव्यवस्था - फोटो : pixabay


इन शीर्ष पांच कंपनियों का विनिर्माण और प्रौद्योगिकी-संचालित क्षेत्रों के अलावा बुनियादी ढांचे से संबंधित कई क्षेत्रों में भी दबदबा है। रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य द्वारा लिखे गए एक शोधपत्र के अनुसार, परियोजनाओं के आवंटन में इन्हीं शीर्ष कंपनियों को वरीयता दी गई है, जिसके कारण इन बड़े समूहों द्वारा इंजीनियरिंग, धातु, गैर-धातु खनिज, रसायन, दूरसंचार, खुदरा उत्पाद और पेट्रोलियम जैसे व्यवसायों के नियंत्रण में शक्ति का केंद्रीकरण हो गया है। 'बिग फाइव' कहे जाने वाले इन समूहों की लगभग 40 विभिन्न गैर-वित्तीय क्षेत्रों में व्यापक उपस्थिति है।


इनकी दिलचस्पी प्रमुख बुनियादी ढांचों-बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बिजली वितरण, गैस वितरण, ट्रेन टिकट और यहां तक कि नवीकरणीय ऊर्जा में भी है। हालांकि व्यावसायिक संचालन में शक्ति का केंद्रीकरण कई वर्षों में हुआ है, लेकिन पिछले पांच-सात वर्षों में उनका नियंत्रण तेजी से बढ़ा है। मसलन, वर्ष 2016 में सिविल इंजीनियरिंग के काम में उनकी हिस्सेदारी 31 फीसदी थी, जो 2021 में 41 फीसदी हो गई। दूरसंचार के क्षेत्र में यह वृद्धि 65 फीसदी से 84 फीसदी हो गई है और परिष्कृत पेट्रोलियम और कोक के निर्माण में यह पहले के 68 फीसदी से बढ़कर 90 फीसदी हो गई है।


यह वृद्धि और नियंत्रण छोटी कंपनियों के अधिग्रहण के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा के कारण हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप अनुकूल नियमों के साथ 'बिग फाइव' का निर्माण हुआ है, जिससे उन्हें एकाधिकार बनाने में मदद मिली है। दूरसंचार जैसे क्षेत्र में, उपभोक्ता बड़े सेवा प्रदाताओं और उनके द्वारा निर्धारित मूल्यों पर निर्भर हैं, जिसके चलते प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई है। हालांकि कोई इन कंपनियों के पक्ष में नीति निर्माण को लेकर सरकार और इनके बीच किसी तरह की मिलीभगत साबित नहीं कर सकता; लेकिन इससे यह पता चलता है कि कैसे सरकार के नियम 'बिग फाइव' को प्रोत्साहित कर रहे हैं।


विरल आचार्य के मुताबिक, कॉरपोरेट शक्ति के बढ़ते केंद्रीकरण से मुद्रास्फीति के लगातार बने रहने और भारत के बड़े राजकोषीय और चालू खाता घाटे को देखते हुए बाहरी क्षेत्र के मोर्चे पर कमजोरी पैदा होने का खतरा है। ये मुद्दे चिंता का विषय रहे हैं, लेकिन सरकारी चर्चा से बाहर हैं। उदाहरण के लिए, हाल के हफ्तों में विमानों का किराया नई ऊंचाइयों को छू रहा है, कुछ एअरलाइनें जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रही हैं, जबकि कुछ अन्य यात्रियों को भारी किराये के कारण यात्रा से रोक रही हैं। ऐसे ही, जब से संगठित खुदरा व्यवसाय ने स्टोरों और ऑनलाइन बिक्री के जरिये अपने नेटवर्क का विस्तार किया है, उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें ऊंची हो गई हैं। 


आज भारतीय बंदरगाहों पर कुछ चुने हुए व्यावसायिक समूहों का नियंत्रण है; 45 फीसदी सीमेंट उत्पादन, लगभग 30 फीसदी इस्पात उत्पादन और लगभग 50 फीसदी कोयला आयात शीर्ष पांच कंपनियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। दरअसल, 2014 के बाद से 25 फीसदी नए निवेश प्रस्ताव पांच बड़ी कंपनियों से आए हैं। नहीं भूलना चाहिए कि इस दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) का बड़ी मात्रा में निजीकरण हुआ है और कई पीएसयू निजी ऑपरेटरों के पास चले गए हैं। ये नए उद्यमी नहीं, बल्कि पुराने समूह हैं, जो छोटे और भावी उद्यमों का अधिग्रहण और नियंत्रण करके पूंजी बना रहे हैं।


यह चिंता का विषय है, जो सरकार को कमजोर बनाती है, क्योंकि इनमें से कई कंपनियों के काम करने के तरीके पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। उदाहरण के लिए, जिस तरह से रिलायंस ने जियो नाम के तहत दूरसंचार परिचालन की शुरुआत की, उसने छह महीने के लिए मुफ्त कॉल, टेक्स्ट और डाटा की पेशकश शुरू की। यह दूसरी कंपनियों के लिए आक्रामक तरीका था, पर सरकार ने कार्रवाई नहीं की। इस प्रक्रिया में कई टेलीकॉम ऑपरेटरों को रिलायंस या प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने खरीद लिया, क्योंकि वे बाजार में टिक नहीं सकते थे। इसी अवधि में संगठित खुदरा, एयरलाइंस, बंदरगाहों और हवाई अड्डे के संचालन में भी बदलाव आया, जो अग्रणी व्यवसायियों के हित में था। इनमें से कई क्षेत्र उभरे और कुछ जाने-माने खिलाड़ियों में से दुर्भाग्य से बहुत कम बचे हैं, क्योंकि शीर्ष पांच कंपनियों या उनके स्वामित्व वाली संस्थाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया है।
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सरकार की कई बड़ी योजनाएं बिग फाइव के भाग्य पर निर्भर करती हैं, क्योंकि वे क्षेत्रों के विकास और खर्च में शामिल हैं। यह उन्हें असुरक्षित भी बनाता है, क्योंकि वे नई परियोजनाओं पर खर्च करने के लिए भारी उधार लेते हैं। अतीत की तरफ देखें, तो कई ऐसी अर्थव्यवस्थाएं थीं, जो तेजी लाने और विकास के लिए बड़े निगमों पर निर्भर थीं। दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया की सरकारों ने अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए मुट्ठी भर कंपनियों को प्रोत्साहित किया और फिर सब कुछ खस्ताहाल हो गया। 


भारत उस रास्ते पर न जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना चाहिए और सभी खिलाड़ियों को समान अवसर प्रदान करना चाहिए, या ऐसी नीतियां लागू करनी चाहिए, जिससे इन पांच बड़ी कंपनियों का नियंत्रण और एकाधिकार खत्म हो। 


ये चिंताएं कई स्वतंत्र अनुसंधान कंपनियों एवं विदेशी निवेशकों ने भी जाहिर की हैं, जो मानते हैं कि बड़े निगमों को अनियंत्रित शक्ति देने से भारत सरकार ऐसी स्थिति में पहुंच सकती है, जहां ये समूह कभी विफल न होने की स्थिति में पहुंच जाएंगे और सरकार की नीतियों एवं कानूनों से लाभ उठाने के तरीके खोज लेंगे।  

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