सोचने लगा, यही तो इस महादेश की नियति रही है। उजाले के बीच युगों तक रहा, फिर आक्रमणकारियों ने जब पराजित किया, तो देश की आंखें बंद हुईं, उनमें जलन होने लगी, धीरे-धीरे वह अंधेरे का अभ्यस्त हुआ, पराधीनता का अंधेरा उसे रास आया, लेकिन आंखों की पुतलियों ने स्वयं को बड़ा किया और फिर हम उजाले के बीच आ गए। पंद्रह अगस्त अंधेरे की अभ्यस्तता को पराजित कर, देश के आलोकमय अवतरण का पर्व है।
यह भाद्रपद (भादो माह) में आता है और यह माह भी एक आलोकपुत्र के अवतरण का साक्षी है, कृष्ण जन्म का पर्व, जिसे हम जन्माष्टमी के नाम से संबोधित करते हैं। यह उजाले का उत्सव है। इसी दिन अंधेरे को पराजित कर कृष्ण जन्मे थे, एक उजास पुरुष के रूप में। उनका नाम भले कृष्ण रहा हो, लेकिन उनसे उजला व्यक्तित्व इतिहास में कोई नहीं है।
कृष्ण की स्मृति से जुड़ा यह पर्व कृष्ण के ही समान है, जिसने परतंत्रता के अंधकार को चीरकर स्वाधीनता के आलोक से देश के कण-कण को जगमगा दिया। हम इसे अधिकतर स्वतंत्रता के पर्व के नाम से संबोधित करते हैं। लेकिन लगता है, स्वतंत्रता दिवस से अधिक सटीक है इसे स्वाधीनता दिवस कहना। स्वतंत्रता में कहीं स्वच्छंदता की आहट भी छिपी है और स्वच्छंदता हमारे लिए कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती। इसलिए कि चाहे व्यक्ति स्वतंत्र हो या उसके नायक, वे दोनों अनुशासन का अतिक्रमण कर सकते हैं और स्वाधीनता का आशय बड़ा स्पष्ट है स्वयं के अधीन रहने का। स्वयं के अधीन रहना, स्वयं के विवेक के अधीन रहना है। इसका आशय किसी को अधीन नहीं रखने की मंशा का भी है।
स्वाधीन शब्द के गर्भ से अन्य सभी के स्वाधीन रहने की आकांक्षा अंकुरित होती है। स्वाधीनता प्राणीमात्र का अधिकार है। स्वतंत्रता में कहीं निजता का स्पर्श है, जबकि स्वाधीनता, जिसमें सबके मुक्त बने रहने का भाव है, वह पूरी तरह लोकपरक है।
स्वाधीनता के आशय ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों और महाकाव्यों में स्पष्ट हैं। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में जहां स्व की अवधारणा आत्मिक स्वतंत्रता के रूप में है, वहीं छान्दोग्योपनिषद् तक आते-आते वह ‘आत्मन स्वाधीनता’ के रूप में और स्पष्ट हो जाती है। यहां स्वाधीन का अर्थ आत्मा के बाहरी बंधनों से मुक्त होने और स्वयं की चेतना में स्थित होने से है। महाभारत के शांति पर्व में स्वाधीनता को आत्मनियंत्रण और धर्म पालन से जोड़ दिया गया है और भागवत तो स्वाधीनता के पूरे आशय का ही आख्याता है।
साहित्य में तुलसी से लेकर मध्यकाल के सभी कवियों ने, वे चाहे जिस धारा के हों, स्वाधीनता को मुक्ति का ही पर्याय माना। तुलसी ने जहां पराधीन सपनेहु सुख नाहीं कहा, वहीं कबीर ने घोषणा की कि मुक्ति को घर सहज है, सहज मिले सो पाय। इसलिए स्वाधीनता हमारी अनमोल विरासत है, जिसका सीधा संबंध मुक्ति और आत्मानुशासन से है। इसकी व्यंजना स्वतंत्रता से कहीं अधिक व्यापक है।
यह स्वाधीनता, जो पंद्रह अगस्त, 1947 को मिली, वास्तव में देश के जनमानस के उस अमूर्त जीवट की परिणति थी, जिसका मूर्त रूप महात्मा गांधी के नेतृत्व में किए गए आंदोलन भी थे और भगत सिंह तथा चंद्रशेखर आजाद सहित महान क्रांतिवीरों के बलिदान भी। यह स्वाधीनता किसी एक व्यक्ति या पक्ष की देन नहीं थी।
यह अमूर्त जीवट उस अगस्त्य मुनि की भांति था, जिसने अपनी अंजुरी में पराधीनता के सागर को समेट कर अपने मुख से समूचा पी लिया था, यह जीवट वह शिवकंठ था, जिसने परतंत्रता के गरल से देश को और विषाक्त होने नहीं देते हुए स्वयं में धारण कर इस देश की धरती को विषमय होने से बचा लिया था और यह वह जीवट था, जिसने अपनी सामर्थ्य से उस सूरज को अस्ताचल की राह दिखा दी थी, जिसे अपने पर इतना भरोसा था कि वह कभी डूब नहीं सकता। पंद्रह अगस्त इसी जिजीविषा के, जीवट के सूर्योदय का साक्षी पर्व है।
आज जब हम इस स्वाधीनता दिवस को मना रहे हैं, तो यह केवल एक दिवस को मनाने की औपचारिकता भर न हो, बल्कि संकल्प हो इस स्वाधीनता को और मुखर-प्रखर करने का, क्योंकि यदि किसी निधि को सहेजे भर रहें, तो उसकी प्रखरता धूमिल होने लगती है, उसकी मुखरता मौन में परिवर्तित होने लगती है, वह केवल गौरव का उपादान भर रह जाती है। स्वाधीनता दिवस केवल धूमिल, मौन से मंडित गौरव उपादान भर न बना रहे, बल्कि आगे की पीढ़ी के लिए एक दीप्ति से भरपूर और विकास का उद्घोष करने वाला जीवंत गौरव बने, यह संकल्प लेना ही इस दिवस की सार्थकता है।
आज अठहत्तर बरस हुए स्वाधीनता मिले और इन बरसों में क्या पाया-क्या खोया का आकलन प्राय: प्रतिदिन होता है, लेकिन यह आकलन कभी नहीं होता कि हमने क्या दिया? देने को लेकर वह सब गिनाया जा सकता है, जो हमारा निजी उद्यम है और इसी निजता को सहेजकर हम इसे राष्ट्र सेवा से जोड़ देते हैं। स्वाधीनता दिवस पर शहरों के तमाम रास्ते ऐसे निजी उद्यमियों और स्वयंभू सेवकों की भीड़ से पटे पड़े हैं, भीड़ इतनी कि असंख्य सिर जुड़कर रास्ता हो गए और रास्ते इतने कि उनकी असंख्य दिशाएं मिलकर भीड़ हो गईं। दोनों में अंतर नहीं हो पाता। कहीं पांव ही नहीं दिखाई देते। पांव चलने का अनुभव देते हैं, लेकिन गंतव्य का पता नहीं देते, इन पंक्तियों से तस्वीर यह बनती है-चलने को चल रहा हूं पर इसकी खबर नहीं/मैं हूं सफर में या मेरी मंजिल सफर में है।
इसलिए इस स्वाधीनता पर्व पर यह सुनिश्चित करना होगा कि मंजिल स्थिर रहे और उसकी ओर सुनिश्चित रास्तों पर पांव गतिशील होते रहें। आज जयशंकर प्रसाद की ये पंक्तियां फिर प्रासंगिक हो गई हैं-हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती/स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती/अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो/प्रशस्त पुण्य पंथ है बढ़े चलो, बढ़े चलो...।