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समाज: ऐ मेरे प्यारे वतन, उत्सव की उमंग में मानवता की ओर

नंदितेश निलय स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक Published by: शुभम कुमार Updated Fri, 15 Aug 2025 07:16 AM IST

सार

स्वतंत्रता दिवस पर जय हिंद के उद्घोष के साथ हम आम नागरिकों के जीवन की जय मनाते हैं। बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल, माता-पिता का भरोसा, और मजबूत दीवारें आजाद भारत की पहचान हैं। यह लेख भारत के लोकतंत्र में आम लोगों की सुरक्षा और विकास की अहमियत पर जोर देता है।

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79वें स्वतंत्रता दिवस का उत्सव - फोटो : अमर उजाला


माता-पिता भी उन तमाम दीवारों पर भरोसा करते हैं और यह मानते हैं कि स्कूल प्रबंधन और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी में यह भी रखता होगा कि जब बरसात आती है, तो सिर्फ वायरस ही नहीं आता, बल्कि उन दीवारों के दरख्तों में पानी भी आता है और वह बेखौफ और कुछ बद्तमीज पानी बिना किसी भय के कहीं भी प्रवेश कर जाता है। वह यह भी नहीं सोचता कि आजाद भारत में स्कूल की दीवारें, सड़कों और पुलों की तरह खोखली हो सकती हैं।


बारिश का पानी यह नहीं देखता कि दीवारें किसी भारी-भरकम फीस वाले स्कूल की नहीं हैं। वे तो आम दीवारें हैं, उन आम बच्चों के लिए, जिनके माता-पिता कभी भी किसी बादल के फटने से अपने घर-गांव संग बह जाते हैं और चूंकि वे आम लोग होते हैं, इसलिए उस जीवन-मृत्यु को समाचार का भी हिस्सा नहीं बनाया जाता, क्योंकि वे घटनाएं भी आम ही तो हैं। और बस, दोष तो उस बारिश के पानी का है, जो अपनी निष्ठुरता के साथ उन दीवारों को लिए उन मासूमों पर गिर जाता है और उधर उन दबी चीखों से दूर आजादी के जश्न में जय हिंद के नारे गूंजते रहते हैं। आखिर यह कैसी आजादी है?


ऐसा क्यों होता है कि जब वह बच्चा विद्यार्थी बन जाता है, तो वह खुद को स्कूल की बिल्डिंग के नीचे धंसा हुआ पाता है या पिछले साल की तरह किसी लाइब्रेरी में पढ़ते-पढ़ते जलमग्न हो जाता है। तो फिर बार-बार उस आजाद जीवन का इतना अनप्रेडिक्टेबल होना कि कब कौन दीवार गिर जाए, पुल टूट जाए, सड़क धंस जाए, गर्मी में एसी फट जाए, बरसात में बिजली का खंभा ही सिर पर गिर जाए और जाड़े के पहले प्रदूषण से दम घुट जाए, तो फिर यह कैसी आजादी है?


अगर देश के स्कूलों की दीवारें इतनी कमजोर हैं कि बारिश में भरभराकर गिर जाएं, तो फिर ऐसे जीवन का क्या, ऐसे कल्याणकारी राज्य का क्या? उन स्मार्ट सिटी का क्या, जो बरसात के आते ही जलमग्न हो जाएं, वे चुनावी सड़कें शर्म से धंस जाएं। और फिर यह कहें कि उस पर चलता हुआ आदमी कोई आम आदमी ही तो था और इतने बड़े देश में कुछेक सौ के जाने से कुछ नहीं होता। दोष बारिश का है। इतना बड़ा देश है, इतने सारे लोग हैं, कुछ न कुछ तो होता ही रहेगा। अगर ऐसा तर्क हम देते हैं, तो एक ऐसी निष्ठुरता को सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाते हैं, जो सिर्फ कुर्सी के करीब होती है।


नहीं तो नोआखाली की गालियों में कोई और भी महात्मा गांधी के साथ गया होता, उस दुख को महसूस किया होता और यह समझा होता कि आजादी का जश्न उन तमाम जनता की खुशियों से जुड़ा है, जो हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई नहीं हैं, बल्कि मनुष्य हैं और उस आजाद देश के नागरिक हैं। तो फिर ऐसी आजादी कैसे संभव बनाई जा सकती है, जिसमें एक आम बच्चे, विद्यार्थी और उस हर आम नागरिक का जीवन सुरक्षित न हो सके? भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाने के लिए विवेकानंद के अद्वैत राज्य को कैसे जिया जा सकता है?


उत्तर सरल है। आइए, ऊपरी ढांचों में उलझने के बजाय बुनियादी ढांचों पर ध्यान दें और अपनी संरचनाओं को और मजबूत बनाएं। और आजाद भारत की आधारभूत संरचनाओं में से एक है स्कूली शिक्षा, नैतिकता, आचार-विचार और मूल्य, और रोजमर्रा की जिंदगी में आम आदमी की सुरक्षा। इसलिए यदि जीवन का उद्देश्य जीना है, तो जीवित रहने से बढ़कर कोई आनंद नहीं है। एक विकासशील देश में अंग तस्करी, निजी अस्पतालों का एकाधिकार, बढ़ते चिकित्सा खर्च, बदतर सीवेज सिस्टम, रेलवे ट्रैक की दुर्दशा, स्कूलों, सड़कों और पुलों के ढहने की कहानियां बेहद निराशाजनक हैं। हमारा देश ऐसी रोजमर्रा की दुर्घटनाओं से कब मुक्त होगा? गर्मी के मौसम में एसी फटने, पार्कों और अस्पतालों में आग लगने की घटनाओं ने कई जानें ले लीं। बरसात में जलभराव आम बात है। क्या लोगों की मौत को भी अब एक नए सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार किया जा रहा है? नहीं, यह आजादी नहीं है।
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नौकरशाही और नेतृत्व को भारतीय विकास की कहानी को ऐसी दर्दनाक घटनाओं और घातक मानसिकता से बचाना होगा। एक समाज में जब मूल्यों को किसी व्यक्ति के पालन-पोषण में इनपुट के रूप में प्रदान किया जाता है, तो नैतिकता एक व्यावहारिक क्रिया, यानी आउटपुट के रूप में प्रकट होती है। लेकिन अगर कोई समाज व्यक्तिगत, वैवाहिक, पारिवारिक और संगठनात्मक स्तरों पर उन मूल सार्वभौमिक मूल्यों को प्राथमिकता देने में विफल रहता है, तो नैतिक संवेदनशीलता का पूरा मुद्दा एक नैतिक अनुपालन बन जाता है।


फिर न्याय में निष्पक्षता क्या है? फिर नैतिकता क्या है? फिर मानव विकास की कहानी और मनुष्य के विवेक की प्रासंगिकता क्या है?

यह आजादी, कानून, नियम, संविधान, ये सब किसके लिए हैं? मनुष्य के लिए। एआई के युग में, एक मनुष्य ही मनुष्य को बचा सकता है। सही और गलत आचरण, व्यवहार या विकल्पों के बीच के सूक्ष्म अंतर को समझना तभी संभव हो सकता है, जब मूल्यों या नैतिकता पर कोई व्यंग्य न किया जाए, उन्हें भी आजाद व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए, उन्हें जिया जाए।


कुछ उस तरह जैसे भारत ने कोविड महामारी के वक्त हर व्यक्ति के जीवन को तवज्जो दी थी, और हमें ऐसा भारत चाहिए। और वह मानवीय नजर भी, जो यह अनुमान लगा सके कि बरसात के बाद एक दिन ठंड भी आएगी और आएगा वह कुहरा, वह फेफड़ों को प्रदूषित करता वह धुआं, वह सब कुछ जो आकाश को पूरी तरह से ढक देगा। और उधर उन स्कूल के मैदान उन मजबूत दीवारों के बीच बच्चों की मुट्ठी में उन्मुक्त तिरंगा अपने रंग में फहराएगा, और वह संगीतमय उद्घोष भी गुंजायमान हो जाएगा…ऐ मेरे प्यारे वतन…

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