बुंदेलखंड में पचास हजार से अधिक कुएं हैं और कोई सात सौ पुराने ताल-तलैया। केन, उर्मिल, लोहर, बन्ने, धसान, काठन, बाचारी और तारपेट जैसी नदियां हैं। इसके अलावा सैकड़ों बरसाती नाले और अनगिनत प्राकृतिक झिर व झरने भी इस जिले में मौजूद हैं। पर जिला मुख्यालय में भी बारिश के दिनों में एक समय ही पानी आता है। होली के बाद गांव के गांव पानी की कमी के कारण खाली होने लग जाते हैं।
लोग सरकार को कोसते हैं, लेकिन इस त्रासदी का ठीकरा केवल प्रशासन के सिर पर फोड़ना बेमानी होगा। इसका असली कुसूरवार तो यहां के बाशिंदे हैं, जिन्होंने नलों से घर में पानी आता देख अपने पुश्तैनी तालाबों में गाद भर दी थी और जंगलों को उजाड़ कर नदियों को उथला बना दिया था। विडंबना है कि मध्य प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं, लेकिन बुंदेलखंड में प्यास व पानी पर कब्जे का मुद्दा कहीं नहीं है।
बुंदेलखंड के छतरपुर जिले में एक गांव का नाम ही है, बनी तलैया। कभी यहां के लोग पानी की अपनी जरूरतों के लिए इसी तलैया पर निर्भर थे। पर आधुनिकता की ऐसी आंधी आई कि लोगों को इस तालाब की सफाई करवाने की सुध ही नहीं रही। लिहाजा साल भर लबालब रहने वाला तालाब बरसाती गड्ढा बनकर रह गया।
छतरपुर हो या बक्सवाहा या फिर खजुराहो-हर बस्ती के मुहाने पर पहाड़ जरूर मौजूद हैं, जिससे सटकर तालाब खोदना यहां सदियों पुरानी परंपरा रही है। ये तालाब 900 से 1200वीं सदी में चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए थे। तब वैज्ञानिक समझ बेहद उन्नत थी-कम बारिश होने पर भी पानी की आवक, संचयन, जावक और बहाव निर्मित किए गए थे। अंग्रेज शासक भी यह तकनीक देखकर चकित थे। जिले की अधिकांश सिंचाई परियोजनाएं उन्होंने इन्हीं तालाबों पर स्थापित की थीं। धीरे-धीरे इनमें इलाके भर की गंदगी गिरने लगी।
तालाबों की देखभाल का सरकारी बजट न के बराबर था, और जितना था, वह कभी तालाब तक पहुंचा ही नहीं। कांग्रेस के शासन में ‘सरोवर हमारी धरोहर’ योजना आई, तो शिवराज सिंह सरकार ने ‘जलाभिषेक’ का नारा दिया। लेकिन तालाबों पर हुए कब्जे हटाने से भी सरकारी महकमे ने मुंह मोड़ लिया।
चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत भ्रमण पर आए थे, तब उन्होंने अपने वृत्तांत में दर्ज किया था कि खजुराहो में एक मील योजन में फैला एक तालाब था। आज उसी खजुराहो और उससे चार किलोमीटर दूर स्थित कस्बे राजनगर में एक-एक बूंद पानी के लिए मारामारी मची है। राजनगर का विशाल तालाब, खजुराहो के प्रेम सागर व शिवसागर बदबूदार नाबदान बनकर रह गए हैं।
जिला मुख्यालय से चौदह किलोमीटर दूर ईसानगर गांव में 535 एकड़ क्षेत्रफल में फैला तालाब वर्षों से खेतों को सींचता था। वर्ष 1989 में सिंचाई विभाग द्वारा दर्ज आंकड़े में इस तालाब का सिंचाई रकबा शून्य दर्ज किया गया। इतना बड़ा तालाब अचानक कैसे सूख गया?
उत्तर प्रदेश पुलिस हत्या के एक मामले में कुख्यात माफिया सरगना और विधायक अशोक वीरविक्रम सिंह उर्फ भैयाराजा को गिरफ्तार करने आई, तो खुलासा हुआ कि उदयपुर के लेक पैलेस की तर्ज पर अपना जल महल बनाने के लिए भैयाराजा ने तालाब पर अपना कब्जा कर वहां पक्का निर्माण कार्य शुरू करवा दिया था। समूचे जिले में ऐसे तालाब, जल महल और भैयाराजा चप्पे-चप्पे पर फैले हुए हैं।
यह इलाका ग्रेनाइट पत्थर संरचना वाला है, जिसे तोड़कर ही पानी पा सकते हैं। अस्सी के दशक में कई नेताओं ने तमिलनाडु के सेलम से मशीनें मंगवाईं और जगह-जगह नलकूप लगा दिए गए। असल में वे नलकूप जमीन के गर्भ का नहीं, बल्कि बारिश के दौरान जमीन से रिसकर नीचे ग्रेनाइट की सतह पर जमा पानी को उलीच रहे थे। बेतहाशा जल निकासी से कुओं का जल स्तर घटता गया और ताल-तलैया खत्म हुए। ऐसे में नलकूपों का तिलिस्म तो टूटना ही था।
अब सरकारी अधिकारी कह रहे हैं कि तालाब खत्म होने से ग्राउंड वाटर रिचार्ज नहीं हो पा रहे। जहां बड़े तालाब हैं, वहीं नलकूप भी सफल हैं। तालाबों का संरक्षण नारा तो बन गया है, पर उन पारंपरिक रास्तों पर बने अवैध निर्माण हटाने को कोई राजी नहीं है, जिनसे होकर बारिश की बूंद तालाबों तक पहुंचती थी।