फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अफगानिस्तान से बढ़ता खतरा

Mon, 31 Aug 2015 07:42 PM IST
कुलदीप तलवार
विज्ञापन
विज्ञापन
अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने हाल ही में अफगानिस्तान में हिंसा की बढ़ती हुई घटनाओं पर पाकिस्तान की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि उनके देश को अमन की आशा थी, लेकिन इस्लामाबाद से काबुल को जंग के संदेश मिल रहे हैं। गनी की इस प्रतिक्रिया के बाद आशा करनी चाहिए कि पाकिस्तान के बारे में उनकी यह गलतफहमी जल्दी ही दूर हो जाएगी कि पाकिस्तान अफगानिस्तान का भाई है।
विज्ञापन


तस्वीर का एक रुख यह भी है कि तलिबान कमांडर मुल्ला उमर के मारे जाने की तालिबान द्वारा पुष्टि और तालिबान के छोटे गुट द्वारा मुल्ला अख्तर मंसूर को नया नेता नियुक्त किए जाने के बाद तालिबान इन दिनों सत्ता हस्तांतरण के कटु दौर से गुजर रहा है। मुल्ला अख्तर मंसूर को नया नेता चुने जाने से अधिकांश तालिबान सख्त नाराज हैं। उनका कहना है कि मुल्ला मंसूर ने मुल्ला उमर की मृत्यु की खबर दो साल तक छिपाए रखी। इस बीच मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला याकूब की क्वेटा में हत्या कर दी गई, जो अपने पिता की जगह लेने की कोशिश कर रहा था। माना जा रहा है कि याकूब की हत्या के पीछे विपक्षी तालिबान और पाकिस्तान का हाथ है। तेजी से बदले घटनाक्रम के बाद अफगानिस्तान में तालिबान के दोनों तरफ के गुटों में कई बार भिड़ंत हो चुकी है।

अशरफ गनी का यह भी कहना है कि वह सरकार का विरोध करने वाला कोई भी 'समानांतर सियासी ढांचा' कुबूल नहीं करेंगे। इस बयान को तालिबान के संदर्भ में देखा जा रहा है। जबकि पाकिस्तान तालिबान को बातचीत के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहा है। पाक की यह कोशिश इस हकीकत के बावजूद हो रही है कि मुल्ला मंसूर की नियुक्ति के मामले में तालिबान में गहरे मतभेद हैं। यह पूरा घटनाक्रम अफगानिस्तान और अमेरिका के लिए कदापि शुभ नहीं। माना जा रहा है कि इस फूट के कारण तालिबान का एक गुट उस इस्लामिक स्टेट से हाथ मिला सकता है, जो अफगानिस्तान में अपने पैर जमा चुका है। अगर ऐसा होता है, तो यह इस क्षेत्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा होगा।
विज्ञापन


गर्ज यह कि तालिबान में फूट पड़ने के बाद अफगानिस्तान में हिंसा और अराजकता बढ़ रही है, जिसे कमजोर अफगान सुरक्षा बल भी दबा नहीं पा रहे। अमेरिकी अगुवाई वाली नाटो सेना के अफगानिस्तान में बचे हुए बारह हजार जवानों के लौट जाने के बाद अफगान सुरक्षा बलों से हालात पर काबू नहीं पाया जा सकेगा। अफगान सुरक्षा ढांचा लगातार ढहता जा रहा है। इसकी ताजा मिसाल अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में पिछले दिनों हुआ दोहरा आत्मघाती बम धमाका था, जिसमें 50 से अधिक लोग मारे गए। तालिबान के हमलों से अफगान सुरक्षा बलों के जवानों की मृत्यु का आंकड़ा भी बढ़ रहा है।

बहरहाल, पाक समर्थित तालिबान अगर फिर अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गए, तो पाकिस्तान अपने हितों की पूर्ति के लिए एक कठपुतली सरकार कायम करने में सफल हो जाएगा। ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान भारत को ही होगा। भारत ने अफगानिस्तान में दो अरब डॉलर से भी अधिक का निवेश कर रखा है। इसलिए अफगानिस्तान के उक्त बदलते हुए हालात को मद्देनजर रखते हुए भारत को कुछ ऐसे कदम जरूर उठाने चाहिए, जिससे तालिबान वहां अपनी मंशा में सफल न हो सकें।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें