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विदेश नीति के मोर्चे पर बढ़ती धमक

सुरेंद्र कुमार Published by: Raman Singh Updated Mon, 30 Dec 2019 06:39 PM IST
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सुरेंद्र कुमार - फोटो : a

इस साल हुए द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और घरेलू सम्मेलनों में प्रधानमंत्री मोदी वैश्विक राजनेता के रूप में उभरे। उन्होंने वैश्वीकरण, जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे मुद्दों पर स्पष्टता के साथ अपना नजरिया पेश किया। साथ ही संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से मजबूती तथा समन्वय के साथ लड़ने, भारत प्रशांत क्षेत्र को मुक्त और समावेशी बनाने पर जोर दिया, जहां निर्बाध तरीके से अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत नौवहन और विमानों की उड़ान संभव हो सके और सागर (एसएजीएआर- सिक्योरिटी ऐंड ग्रोथ फॉर आल इन द रिजन) पर जोर दिया।



अपनी खास शैली में उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ निजी केमेस्ट्री विकसित की, जैसा कि व्यापार संबंधी मुद्दों तथा अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान और रूस को लेकर नजरिये में गंभीर मतभेदों के बावजूद सितंबर, 2019 में ह्यूस्टन में हाउडी मोदी कार्यक्रम में नजर आया। अमेरिका के साथ रक्षा व्यापार सहित द्विपक्षीय व्यापार 126 अरब डॉलर को पार कर गया, द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय संयुक्त सैन्य अभ्यास और सहयोग के हर संभव क्षेत्र में दर्जनों संयुक्त अभियानों के साथ भारत और अमेरिका के रिश्ते इतने बेहतर पहले कभी नहीं थे।


ह्यूस्टन सम्मेलन से पहले ट्रंप और मोदी रूस के दूरस्थ पूर्वी क्षेत्र में पहुंचे थे और वहां उन्होंने ईस्ट इकोनॉमिक फोरम में हिस्सा लिया। इसमें हिस्से लेने वाले मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे, जहां रूस के साथ रक्षा, तेल, गैस और खनन के संबंध में 25 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। भारत ने न केवल रूस के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास में हिस्सा लिया, बल्कि वह अमेरिकी दबाव को नजरंदाज करते हुए एसए-400 रूसी एयर डिफेंस सिस्टम को हासिल करने से पीछे नहीं हटा। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन और सीएए तथा एनआरसी के मुद्दे पर हो रहे प्रदर्शनों को लेकर रूस ने व्यावहारिक रूप से मौन साधा है।


2017 के दोकलम के टकराव के बाद से भारत और चीन की सरकारों ने सरहद पर शांति और स्थिरता बहाल रखने के लिए गंभीरता से प्रयास किए हैं। मल्लापुरम (12 अक्तूबर, 2019) शिखर बैठक और एससीओ, ब्रिक्स तथा आसियान में मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकातों और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच 21 दिसंबर को आगरा में कंस्ट्रक्टिव बॉर्डर टाक की 22 वें दौर की बैठक के बावजूद सीमा संबंधी विवाद को सुलझाने और व्यापार असंतुलन को दूर करने की दिशा में खास प्रगति नहीं हुई है। चीन लंबे समय से पाकिस्तान स्थित आतंकवादी मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची में शामिल करने का विरोध करता रहा है, उसने एनएसजी में भारत के प्रवेश को भी रोका है और कश्मीर में अनुच्छेद 37 को निष्प्रभावी किए जाने पर भड़काऊ बयान भी जारी किए हैं। मोदी ने जिनपिंग के पसंदीदा बीआरआई का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया और इसके प्रतिकूल प्रभावों को लेकर चिंताए जाहिर की है, जिन्हें अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों का भी समर्थन मिला। उन्होंने चीन समर्थित आरसीईपी में शामिल होने से भी इनकार कर दिया, उनके आलोचकों ने इसे चूक बताया है।


फ्रांसीसी राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रों और जर्मन चांसलर एजेंला मर्केल के साथ मोदी के अच्छे रिश्ते हैं और उन्होंने इन दोनों के साथ शिखर बैठकें की। द्विपक्षीय आर्थिक और प्रतिरक्षा संबंधों के अलावा वैश्वीकरण, जलवायु परिवर्तन और मुक्त तथा निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर तीनों नेताओं के विचारों में उल्लेखनीय समानता है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की स्थिति चुनाव से और मजबूत हुई है, लिहाजा ब्रेग्जिट अब तय दिख रहा है। भारतीय मूल के 15 सांसदों, जिनमें से कुछ अहम मंत्रालय तक संभाल रहे हैं, ब्रिटेन भारत के साथ अपने आर्थिक रिश्ते को फिर से मजबूत करना चाहेगा।


नॉर्डिक देशों तक मोदी ने 2018 में पहुंच बढ़ानी शुरू की थी; तीस साल में स्वीडन जाने वाले वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं और वहां उन्होंने डेनमार्क, फिनलैंड, आईसलैंड, नार्वे और स्वीडन के नेताओं के साथ शिखर बैठक की। स्वीडन के महाराजा और महारानी दिसंबर की शुरुआत में भारत आए। प्रति व्यक्ति उच्च आय तथा तकनीकी रूप से समृद्ध ये देश निवेश, नवोन्मेष और रक्षा उपकरणों का महत्वपूर्ण स्रोत हैं; ये साइबर अपराध  कम करने में भी मददगार हो सकते हैं।


दिल्ली में 2015 में भारत-अफ्रीका सम्मेलन के साथ शुरू हुआ अफ्रीकी देशों के साथ रिश्तों को मजबूत करने का सफर 2019 में भी जारी रहा, जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बेनिन, गाम्बिया और गुएना की यात्रा की और राजनाथ सिंह पहले रक्षा मंत्री के रूप में मोजांबिक पहुंचे। पिछले पांच वर्षों के दौरान पिछले पांच दशकों की तुलना में भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की कहीं अधिक अफ्रीकी देशों की यात्रा हुई और अफ्रीकी राष्ट्रपतियों की भारत यात्रा हुई।
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चीन की उदारता की तुलना में भारत की 10 अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन और पांच हजार स्कॉलरशिप मामूली लग सकती है, लेकिन कौशल प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण, तथा टेलीमेडिसीन तथा टेलीएजुकेशन के क्षेत्र में भारत के नजरिये और जापान के साथ मिलकर एशिया-अफ्रीका गलियारे के निर्माण ने भारत के प्रति अच्छी सद्भावना पैदा की है।


मोदी के शासनकाल में अर्जेंटीना, ब्राजील और मैक्सिको जैसे जी-20 के तीन सदस्यों सहित लैटिन अमेरिका के साथ व्यापार, कारोबार और निवेश के रिश्ते में प्रगाढ़ता आई है। वहीं मोदी की चिंता के कारण भारत के खाड़ी क्षेत्र खासतौर से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ रिश्ते अपने सबसे अच्छे दौर में हैं। उन्होंने चार साल में तीन बार यूएई का दौरा किया और उस समय शहजादे मोहम्मद बिन सलमान (फरवरी, 2019) की अगवानी की, जब वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गए थे। मोदी बहरीन और कतर भी गए और न्यूयॉर्क में ईरान के राष्ट्रपति से मुलाकात भी की। इन मुलाकातों ने तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति और निवेश सुनिश्चित किया।


गणतंत्र दिवस पर आसियान नेताओं की अगवानी करने के बाद मोदी ने इस क्षेत्र पर खासा ध्यान दिया है। वह नवंबर में बैंकाक में आसियान और ईस्ट एशिया सम्मेलन में शामिल हुए।


हालांकि पड़ोसी पहले की नीति का पालन करने के बावजूद अभी पड़ोसी देशों के साथ हमारे रिश्ते मिश्रित हैं। बांग्लादेश, भूटान और मालदीव के साथ जहां रिश्ते बेहतर दिखते हैं, वहीं अफगानिस्तान के घटनाक्रम से भारत के लिए संभावनाएं धुंधली हुई हैं। वहां ट्रंप तालिबान के साथ बात करना चाहते हैं और अपनी फौज की वापसी चाहते हैं, पाकिस्तान भारत का विरोध कर रहा है, चीन और रूस का दखल बढ़ा है और राष्ट्रपति अशरफ गनी की स्थिति कमजोर हुई है। नेपाल भारत के खिलाफ चाइना कार्ड खेलने की कोशिश करता है। श्रीलंका में भी राजपक्षे बंधुओं के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनने से भारत को चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर सतर्क होना पड़ेगा।


बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद सरहद से आतंकवादियों की घुसपैठ तथा पाकिस्तान की ओर से होने वाली गोलाबारी में कमी नहीं आई है। हालांकि एफएटीए के दबाव के बावजूद पाकिस्तान अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे मलयेशिया और तुर्की के अलावा किसी और का समर्थन नहीं मिला। हैरत नहीं कि सीएए के बढ़ते विवाद ने बांग्लादेश को भी नाराज किया है।

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