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असंतुलन पैदा करती बढ़ती आबादी

सत्यनारायण सिंह
Updated Thu, 30 Jul 2020 01:58 AM IST
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population - फोटो : population

आजादी के समय भारत की जनसंख्या 33 करोड़ थी, जो अब करीब 135 करोड़ हो चुकी है। भारत का क्षेत्रफल मात्र 2.46 प्रतिशत है, जबकि दुनिया की लगभग 16 प्रतिशत आबादी यहां रहती है। भारत में आज जन्मदर प्रति हजार चालीस से ऊपर है। आबादी की वृद्धि के कारण जनघनत्व जो 1901 में प्रति वर्ग किलोमीटर 165 था, वह बढ़कर 2001 में 689 हो गया। चीन में वृद्धि दर 1.0 प्रतिशत है, तो भारत में दोगुनी यानी सालाना दर 1.93  प्रतिशत है। इस दर से आबादी का बढ़ना देश के हित में नहीं है। जनसंख्या की यह वृद्धि  प्रगति के सारे प्रयत्नों को निरर्थक व निष्फल कर रही है।



प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) में स्वीकार किया गया था कि जनसंख्या वृद्धि व सीमित संसाधनों पर पड़ते दबाव को देखते हुए परिवार नियोजन तथा जनसंख्या नियंत्रण की गंभीर आवश्यकता है, जन्म दर को कम कर अर्थव्यवस्था के अनुरूप लाना होगा। परंतु वृद्धि दर में अपेक्षित कमी नहीं आई है व जनसंख्या नियंत्रित नहीं हुई। भारत में कई राज्यों की जनसंख्या की बराबरी दुनिया के बड़े देशों के साथ की जा सकती है। भारत हर साल ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी के बराबर आबादी बढ़ा लेता है।


1977 में परिवार नियोजन कार्यक्रम में तेजी हुई, परंतु ठीक से लागू नहीं होने के कारण राजनीतिक उलटफेर हुआ, जिससे इस कार्यक्रम का नाम ही बदलकर परिवार कल्याण कर दिया गया। वर्ष 1993 में डॉ. एम.एस.स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट के आधार पर 2000 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की घोषणा की गई। भारत जनसंख्या स्थिरीकरण की चुनौती से पिछले 70 साल से जूझ रहा है। शहरों और ग्रामों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। पूर्व में मृत्यु दर अधिक होने से जन्म-मरण के बीच संतुलन हो जाता था व आबादी नहीं बढ़ती थी। 1901 से 1921 के बीच आबादी नहीं बढ़ी। जैसे-जैसे राज्यों में चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार हुआ मृत्यु दर घटी और जन्म दर कम नहीं होने के कारण 1901 व 1961 के बीच 60 वर्षों में अत्यधिक वृद्धि दिखाई दी।


जनसंख्या का नियंत्रण नहीं होना कई क्षेत्रों में चुनौती पैदा कर रहा है। सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक क्षेत्र में है। जनसंख्या के बेतहाशा बढ़ने से भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पेयजल आदि क्षेत्रों में संकट पैदा हो गया है। जनसंख्या का दुष्प्रभाव पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। भूमि, वन, पहाड़, खनिज सभी प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बढ़ रहा है। नदियों का जल दूषित हो रहा है। भूमिगत जल दूषित हो रहा है, प्रदूषण बढ़ रहा है। प्राकृतिक असंतुलन बढ़ रहा है।


इसलिए जरूरी है कि जनसंख्या विस्फोट की रोकथाम को प्रत्येक धर्म समुदायों का राष्ट्रीय कर्तव्य घोषित किया जाए, जिस पर अमल करने की बाध्यता भी आवश्यक हो। धर्म के हानि-लाभ, चुनावी आंकड़ों से इसे अलग रखना चाहिए। समाज में असमानता भी जनसंख्या वृद्धि का कारण है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, कन्या भ्रूण हत्या के कारण भारत में एक हजार पुरूषों पर सिर्फ 918 महिलाएं है। ग्रामों में परिवार नियोजन के प्रति उदासीनता है, लोग अधिकाधिक बच्चे पैदा करने को गौरव की बात मानते हैं।


जनगणना आंकड़ों ने परिवारों को उपलब्ध सुविधाएं, पक्के आवास, पेयजल व बिजली की आपूर्ति,  सरकार के दावों को समाप्त कर दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में 43 प्रतिशत परिवार दो कमरे के मानदंड को पूरा नहीं करते, सुरक्षित पेयजल आपूर्ति अभी कोसों दूर है। ग्रामीण क्षेत्रों व शहरी अल्प आय वर्ग में विवाहित दंपत्तियों के लिए अलग शयन कक्ष उपलब्ध नहीं है। समग्र देश में केवल 36.7 प्रतिशत परिवारों को नल से पेयजल उपलब्ध है। ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 25 प्रतिशत परिवारों को यह सुविधा है।


ग्रामीण क्षेत्रों में राजस्थान में 22 प्रतिशत, बिहार  में 1.4 प्रतिशत, ओडिशा में 2.8 प्रतिशत, असम व छत्तीसगढ़ में पांच प्रतिशत, पश्चिमी बंगाल में सात प्रतिशत, मध्य प्रदेश में नौ प्रतिशत है। परिवार नियोजन के लक्ष्य हासिल करने के लिए हमें स्वास्थ्य तंत्र को अधिक चुस्त व जिम्मेदार बनाना होगा। दो बच्चों को जन्म दे चुके परिवार को नियोजन के लिए प्रेरित किया जाए। नसबंदी कराने वाले स्त्री-पुरूषों को विविध प्रकार की आर्थिक सुविधाएं दी जाएं।

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