रिपोर्ट में देश में शिक्षा, रोजगार और बेरोजगारी की असली स्थिति का लेखा-जोखा दिया गया है। यह रिपोर्ट 2021 में हुए नेशनल सैंपल सर्वे के डाटा पर आधारित है। इसके अनुसार, देश में 29.1 करोड़ लोग पढ़ाई कर रहे हैं। देश की अनुमानित साक्षरता दर 80.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसमें शहरी लोगों का प्रतिशत लगभग 90 फीसदी और गांवों का 77 फीसदी बताया गया है। देश में कुल 87.2 फीसदी पुरुष और 74.6 फीसदी महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं। रिपोर्ट कुछ मामलों में देश में प्रगति की बात तो करती है, लेकिन अधिकतर मामलों में हालात अब भी चिंताजनक हैं।
यूनेस्को इंस्टीट्यूट फॉर स्टैटिस्टिक्स (यूआईएस) के आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में वयस्कों की साक्षरता दर लगभग 88 प्रतिशत है, जबकि 15 से 24 साल के युवाओं में साक्षरता दर 93 प्रतिशत। इसमें पिछले कुछ वर्षों में बढ़ोतरी हुई है। 1950 में दुनिया में लगभग 56 प्रतिशत शिक्षित युवा थे, जिनकी संख्या 1980 तक बढ़कर लगभग 70 फीसदी हो गई। इसके बावजूद, बिना पढ़े-लिखे युवाओं की अनुमानित संख्या 73.9 करोड़ बताई जाती है। इनमें दो-तिहाई महिलाएं भी शामिल हैं। यह आंकड़ा बताता है कि क्यों स्कूलिंग तक सबकी पहुंच बढ़ाने से साक्षरता में असमानता अपने-आप खत्म नहीं हो जाती। ये 73 करोड़ से ज्यादा युवा बुनियादी लिखना-पढ़ना भी नहीं जानते। इससे उनकी साक्षरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
असल में साक्षरता में कमी का मुख्य कारण गरीबी, सामाजिक व आर्थिक असमानता तथा संसाधनों की कमी है। गरीब परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना प्राथमिकता होती है। ऐसे में, बच्चे पढ़ाई करने के बजाय कम उम्र में ही काम या मजदूरी करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। वहीं ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में स्कूलों, योग्य शिक्षकों, किताबों और बुनियादी शैक्षणिक सुविधाओं का अभाव रहता है। कई समाजों में आज भी लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिक्षा को कम महत्व दिया जाता है, जिससे महिलाओं में साक्षरता दर पिछड़ जाती है। तेज गति से बढ़ती जनसंख्या के कारण सरकार द्वारा दी जाने वाली शैक्षणिक सुविधाएं और योजनाएं हर व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाती हैं। जागरूकता की कमी के कारण कई परिवारों में माता-पिता शिक्षा के महत्व को नहीं समझ पाते और बच्चों को स्कूल नहीं भेजते। असमानता के कारण कुछ वंचित समुदायों तक शिक्षा की पहुंच सुगम नहीं हो पाई है।
साक्षरता बढ़ाने के लिए व्यक्तिगत, सामाजिक और सरकारी स्तर पर समन्वित प्रयास करने की जरूरत है। आधुनिक समय में डिजिटल और वित्तीय जागरूकता का प्रसार करना भी साक्षरता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बच्चों में शुरुआती स्तर पर सीखने की जिज्ञासा बढ़ानी होगी। गांवों और शहरों में मुफ्त पुस्तकालय स्थापित किए जाएं, ताकि हर व्यक्ति तक किताबों की पहुंच हो सके। साथ ही, विद्यालयों और घरों में बच्चों को पढ़ने के लिए सकारात्मक, प्रेरणादायक और संसाधन-युक्त वातावरण प्रदान किया जाए।
‘विकसित भारत 2047’ के विजन और आत्मनिर्भर भारत की नींव को मजबूत करने की दिशा में शिक्षा मंत्रालय का स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग स्कूल से बाहर और पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों की पहचान कर उन्हें दोबारा शिक्षा से जोड़ने के लिए एक देशव्यापी अभियान शुरू करने जा रहा है। 2020 में जारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 2030 तक प्री-स्कूल से लेकर सेकेंडरी लेवल तक 100 प्रतिशत ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन, सवाल यह है कि क्या साक्षरता दर को बढ़ाने के लिए सरकार के प्रयास काफी हैं? आंकड़े बताते हैं कि केवल सरकार के भरोसे बैठना सही नहीं होगा। साक्षरता बढ़ाने के लिए सामाजिक संस्थाओं, शिक्षाविदों के साथ आम आदमी को भी आगे आना होगा, तभी शिक्षा की अलख जगाई जा सकती है।