पिछले सप्ताह अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी एक ऐसे दिन दिल्ली पहुंचे, जब बारिश के पानी ने सारे शहर में कहर मचा दिया था। जॉन केरी को उस अनुभव से गुजरना पड़ा, जिसका दिल्लीवासी हर बारिश में सामना करते हैं। बारिश के कारण लगे जाम में केरी को इतना समय गुजारना पड़ा कि अगले दिन आईआईटी के छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने मजाक में कहा कि क्या वे नाव से आए हैं! उनकी इस टिप्पणी से भारतीय शहरों की बेहाल व्यवस्था चर्चा का विषय बन गई। इस विषय पर संपादकीय छपे और टीवी पर भी चर्चाएं हुईं। सो अमेरिका से जुड़ी असली खबर हम भूल गए।
असली खबर यह है कि अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते अब इतने मजबूत हो गए हैं कि हमारे रक्षा मंत्री ने पिछले सप्ताह वाशिंगटन में एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे निकट भविष्य में अमेरिकी सैनिक विमान हमारे सैन्य अड्डों से उड़ान भर सकेंगे। एक ऐसा भी समय था, जब हमारे राजनेताओं को अमेरिका से इतनी नफरत थी कि यदि कोई पत्रकार अपने लेख में अमेरिका की तरफदारी करता था, तो उस पर सीआईए का दलाल होने का आरोप लग जाता था। शीतयुद्ध के उस दौर में अमेरिका उन्हीं देशों के साथ दोस्ती करता था, जो युद्ध में उसके साथ सैन्य रिश्ता जोड़ने को तैयार थे। हमारे राजनेता इसके लिए तैयार नहीं थे, जबकि पाकिस्तान के राजनेता जरूरत से ज्यादा तैयार थे। यहां तक कि अयूब खान ने अमेरिकी जासूसी विमानों को पाकिस्तानी जमीन से उड़ान भरने की इजाजत दे दी थी।
ये वे दिन थे, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता को भारत की विदेश नीति का आधार बना रखा था। सो भारत को उन्होंने तब तक अमेरिकी खेमे से बाहर रखा, जब तक चीन ने हम पर आक्रमण नहीं किया। उस युद्ध में भारतीय सैनिकों के पास जो हथियार थे, वे सौ साल पुराने थे, जबकि चीनी सैनिक अत्याधुनिक हथियारों से लैस थे। चीन से युद्ध के दौरान नेहरू ने अमेरिका से सैन्य और आर्थिक सहायता मांगी। इसके पीछे भी एक किस्सा है। चीन के साथ युद्ध शुरू होने से कुछ महीने पहले नेहरू जी इंदिरा गांधी के साथ अमेरिका के दौरे पर गए थे। वहां राष्ट्रपति कैनेडी ने उनकी खूब मेहमाननवाजी की, लेकिन नेहरू जी को बहलाने में वह विफल रहे। कैनेडी भारत के साथ दोस्ती चाहते थे, क्योंकि उनको विश्वास था कि भारत ही चीन जैसे ताकतवर देश का मुकाबला कर सकता है। उनका यह भी मानना था कि भारत चूंकि एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए उसके साथ अमेरिका की दोस्ती स्वाभाविक होनी चाहिए। भारत ने दोस्ती का वह मौका गंवाया और इसकी कीमत अपने जवानों के खून से चुकानी पड़ी। तब यदि हम अमेरिका के दोस्त होते, तो शायद चीन हमला करने का साहस न करता। यदि उसी समय अमेरिका के साथ हमारा रिश्ता मजबूत होता, तो एक दशक बाद बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए हुए युद्ध में अमेरिका पाकिस्तान के बजाय हमारे साथ होता।
नेहरू जी ने विदेश नीति के मोर्चे पर गलतियां कीं, क्योंकि उनके लिए विचारधारा देशहित से ज्यादा अहमियत रखती थी। ऐसे में जब प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिन पहले कहा कि उनकी विदेश नीति का मतलब है भारत का हित या ‘इंडिया फर्स्ट, तो मुझे बहुत अच्छा लगा। सो अब अगर अमेरिका से दोस्ती हो रही है, तो इससे यही समझा जाना चाहिए कि यह दोस्ती भारत के हित में है। इसकी हमें जरूरत है, क्योंकि चीन और पाकिस्तान एक साथ हैं, और यह हमारे हित में नहीं है।