क्या मूल्य स्खलन का दौर अब समाप्तप्राय है? भारतीय संस्कृति के मूल्यों को कला के माध्यम से पूरे विश्व तक ले जाने की हमारी समृद्ध परंपरा वैदिक युग से है। भरत ने भारत से विश्व को रस का विचार पहली बार दिया, तो कालिदास समेत नाट्यकवियों ने दृश्यकाव्य के अक्षुण्ण उदाहरण सामने रखे। प्रथम विश्वयुद्ध के युद्धकामी परिप्रेक्ष्य में रवींद्रनाथ ने गीतांजलि प्रस्तुत किया, तो सत्यजित राय पथेर पांचाली लेकर कान के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह तक गए। परंपरा थमी नहीं।
आधुनिक दौर में गिरीश कारनाड पहले भारतीय नाटककार हुए, जब उन्होंने युनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष मनाए जाने वाले विश्व रंगमंच दिवस की पूर्वसंध्या पर दुनिया के रंगकर्मियों के लिए भारत की ओर से संदेश दिया। इधर मूल्यसंवहन की यह परंपरा स्खलित दिखती है। जैसे इस बार कान फिल्म समारोह में अपने देश से एक भी फिल्म नहीं चुनी गई, जबकि कुछ ग्लैमरस अभिनेत्रियों को रेड कार्पेट पर महज चलने के लिए खर्चीले ढंग से आमंत्रित किया गया था।
यह हमारे लिए गर्व की बात है या शर्म की, यह अस्पष्ट नहीं है। क्या हम अब पेन ऐंड ग्लोरी (स्पेन), ला मिजरेबल (फ्रांस) या सॉरी वी मिस्ड यू (ब्रिटेन) जैसी फिल्म भी नहीं बना सकते, जिन्हें इस बार इस महत्वपूर्ण फिल्म समारोह के लिए चुना गया था? आखिर यह स्खलन किन स्तरों पर हुआ है? या इसे हमें ऐसे देखना चाहिए कि मूल्य स्खलन का दौर अब समाप्तप्राय है और अब हम संस्कृति की दृष्टि से एक विकसित देश में रूपांतरित हो रहे हैं।