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धर्म के नाम पर कट्टरपंथी तत्वों को किसी भी रूप में हावी नहीं होने दिया जा सकता

शशांक Published by: शशांक पूर्व विदेश सचिव Updated Mon, 02 Nov 2020 03:47 AM IST
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फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

फ्रांस में एक शिक्षक द्वारा नागरिक शास्त्र की कक्षा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाते हुए पैगंबर पर बने विवादास्पद कार्टून दिखाने पर एक छात्र ने उनकी नृशंस तरीके से हत्या कर दी थी। बाद में हालंकि पुलिस ने भी उस हत्यारे को मुठभेड़ में मार गिराया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने उस शिक्षक की हत्या को इस्लामी आतंकवाद बताते हुए कहा कि इस्लाम हमारा भविष्य हथियाना चाहता है, जो कभी सफल नहीं होगा।



उन्होंने उस विवादास्पद कार्टून के सार्वजनिक प्रदर्शन की बात भी कही, जिससे न केवल कई इस्लामी देश फ्रांस के खिलाफ हो गए हैं, बल्कि इस्लामी अनुयायियों द्वारा फ्रांस में एक के बाद एक कई हत्याएं हुई हैं, जिसे फ्रांस के अधिकारी आतंकी हमला बता रहे हैं। बीते बृहस्पतिवार को दक्षिणी फ्रांस में तीन लोगों पर चाकू से हमला किया गया, जिसमें एक महिला व एक पुरुष की मौत हो गई, जबकि दूसरी महिला बुरी तरह से घायल हो गई। धर्म के नाम पर इस तरह की हिंसक घटनाओं को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। किसी भी धर्म के ऐसे कट्टरपंथी तत्वों की हिमायत करना या उनके हिंसक वारदातों को जायज ठहराना उचित नहीं है।



हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आज जो इस्लामी देश फ्रांस की आलोचना कर रहे हैं और उसके उत्पादों के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की बात कर रहे हैं, उन्हें खुद अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और अपने समाज की गड़बड़ियों को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। सिर्फ फ्रांस ही क्यों, दुनिया के अनेक देशों में इस्लाम से जुड़े संगठन एवं उनके अनुयायी ऐसे हिंसक आतंकवादी वारदातों को अंजाम देते रहे हैं। खुद इस्लामी देश भी आतंकवादी घटनाओं से अछूते नहीं हैं। ऐसा क्यों है कि जहां कहीं भी आतंकी घटनाएं होती हैं, उनका कोई न कोई संबंध पाकिस्तान या पाकिस्तानी आतंकी संगठनों से जुड़ा पाया जाता है?


इस्लाम और ईसाइयत के बीच संघर्ष कोई नई बात नहीं है। ऐसा शताब्दियों से चल रहा है। लेकिन एक देश के रूप में फ्रांस खुद को धर्मनिरपेक्ष बताता रहा है। अगर फ्रांस के राष्ट्रपति ने इस्लाम के खिलाफ बयान दिया है, तो आखिर उन्हें ऐसा क्यों करना पड़ा, इस पर भी इस्लामी देशों को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। अगर इमैनुएल मैक्रों के किसी बयान से इस्लामी देशों या अनुयायियों को नाराजगी है, तो इसे मिल-बैठकर सुलझाया जा सकता है। इसके लिए हिंसा को बढ़ावा देना या आतंकी संगठनों के पक्ष में खड़ा होना उचित नहीं। किसी भी देश को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे देशों में आतंकवाद फैलाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करे।


हाल के कुछ वर्षों में फ्रांस में इस्लाम को मानने वाले व्यक्तियों द्वारा हिंसक घटनाओं में तेजी आई है। अपराध के मामले बढ़े हैं । फ्रांस का अपना संविधान है, उसके अपने नियम-कायदे हैं। वहां बाहर से जो लोग रहने आते हैं, वे कई बार उन नियम-कायदों को नहीं मानना चाहते, इसलिए कभी-कभी सामुदायिक संघर्ष उत्पन्न होते हैं। यूरोपीय देशों के लोगों की अपेक्षा होती है कि बाहर से जो लोग आए हैं, वे उनके नियम-कायदों को मानें, लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो समुदायों के बीच संघर्ष भी शुरू हो जाता है, जिसे सभ्यताओं का संघर्ष भी कहा जाता है। फ्रांस के लोग आधुनिक रीति-रिवाजों को मानते हैं, लेकिन वहां शरणार्थी के रूप में जो लोग आए हैं, उनमें शिक्षा की कमी है, वे कबायली ढंग से जीवन जीना चाहते हैं और धर्म के प्रति उनमें कट्टरता ज्यादा होती है।


हाल के वर्षों में इस तरह की ज्यादातर हिंसक घटनाओं में इस्लामी देशों से आए शरणार्थियों को लिप्त पाया गया है। हमारे देश में सांप्रदायिक संघर्ष बहुत कम देखने में आया है और सभी धर्म के लोगों को अपने-अपने रीति-रिवाज एवं पूजा की स्वतंत्रता हासिल है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में हमारे यहां भी धर्म को लेकर तनाव बढ़े हैं, और इक्का-दुक्का घटनाएं भी सामने आती हैं, लेकिन हमारे यहां धार्मिक आधार पर समाज के विभाजन को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता।


फ्रांस के खिलाफ इस्लामी देशों की नाराजगी इस हद तक बढ़ गई है कि कई मुस्लिम देशों ने फ्रांस के उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया है। कुवैत में गैर सरकारी को-ऑपरेटिव संगठन ने बॉयकाट फ्रांस को लेकर दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं और कई स्टोर में फ्रांस के उत्पादों का व्यापार बंद हो गया है। कतर विश्वविद्यालय ने फ्रांस के रवैये को इस्लाम के खिलाफ बताते हुए फ्रेंच सांस्कृतिक सप्ताह के कार्यक्रम टाल दिए हैं। तुर्की के राष्ट्रपति ने मैक्रों को अपने दिमाग का इलाज करवाने की सलाह दी है, तो उधर सऊदी अरब स्थित 57 देशों के इस्लामी संगठन ने फ्रांस की आलोचना करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आप किसी धर्म की या ईशनिंदा नहीं कर सकते।
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इन सबके मद्देनजर फ्रांस की सरकारी मशीनरी एवं कूटनीतिज्ञों ने डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू कर दी है और मैक्रों ने भी ट्विटर के जरिये संदेश दिया है कि वह नफरत फैलाने वाले बयानों के पक्ष में नहीं हैं और मानवीय गौरव तथा सार्वभौमिक मूल्यों का समर्थन करते हैं। साथ ही, उन्होंने सभी संप्रदायों को शांति बनाए रखने का भी संदेश दिया। भारत आतंकवाद के सख्त खिलाफ है और यह कभी नहीं चाहेगा कि कोई भी देश आतंकवाद को प्रोत्साहित करे। इसलिए भारत इस मुद्दे पर फ्रांस के साथ खड़ा है। वैसे भी फ्रांस यूरोप में भारत का सबसे बड़ा सहयोगी है। अगर फ्रांस के राष्ट्रपति अपने समाज में संतुलन एवं आतंकी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए सख्त रवैया अपना रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है? भारत में ऐसी कोई भी घटना नहीं होनी चाहिए, जिससे लगे कि भारत फ्रांस में आतंकी घटना को अंजाम देने वाले लोगों के साथ खड़ा है।


फ्रांस के विपक्षी दलों ने मांग की है कि पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के नागरिकों के आने पर रोक लगाई जाए। इसलिए हमें सावधान रहना होगा कि हमारे देश के किसी समुदाय के नागरिक के खिलाफ ऐसा कोई रवैया नहीं अपनाया जाए, क्योंकि इससे देश की बदनामी होती है। दूसरी तरफ हमें इस बात को लेकर भी सचेत रहना होगा कि हमारे समाज में किसी तरह का कोई विभाजन न हो। कट्टरपंथी तत्वों को किसी भी रूप में हावी नहीं होने दिया जा सकता।

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