पांच विधानसभाओं के आगामी चुनावों में निर्वाचन आयोग ने अभी तक जो निर्देश जारी किए हैं, उससे लगता है कि वह इन चुनावों को पहले के चुनावों से भी ज्यादा बेहतर और साफ-सुथरे ढंग से संपन्न कराना चाहता है। निर्वाचन आयोग के इन प्रयत्नों का सबको स्वागत करना चाहिए, क्योंकि ये प्रयत्न लोकतंत्र को मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं।
निर्वाचन आयोग ने मुख्यतः दो नई बातें कही हैं, उनमें से पहली है चुनावी खर्च के बारे में और दूसरी है, चुनाव में धर्म, भाषा, जाति आदि के इस्तेमाल को लेकर। जहां तक चुनावी खर्चे का सवाल है, भारत सरकार ने चुनाव आयोग की सिफारिश पर हर उम्मीदवार के लिए चुनावी खर्च की एक सीमा निर्धारित की है। यह उम्मीद की जाती है कि सभी उम्मीदवार इस सीमा के भीतर ही चुनाव में खर्च करेंगे। लेकिन पिछले चुनावों में यह देखा गया है कि उम्मीदवार असल में खर्चा तो ज्यादा करते हैं, मगर चुनाव के बाद निर्वाचन आयोग को दिए हुए चुनावी खर्चे के शपथ पत्र में उसे निर्धारित सीमा से कम करके बताते हैं। कम खर्च दिखाने का यह प्रचलन इतना फैला हुआ है कि 90-95 फीसदी उम्मीदवार अपने शपथ पत्र में गलत सूचना देते हैं।
इसके बारे में निर्वाचन आयोग हर उम्मीदवार के खर्च का एक स्वतंत्र हिसाब भी रखता है, वह उम्मीदवारों के चुनाव खर्चे का ब्योरा रखने के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त करता है। इन पर्यवेक्षकों द्वारा दिए गए खर्चे के ब्योरे से उम्मीदवारों द्वारा दिए गए खर्चे के ब्योरे की तुलना की जाती है और अगर उम्मीदवार द्वारा शपथ पत्र में पर्यवेक्षकों के हिसाब से कम खर्च दिखाया जाता है, तो पर्यवेक्षकों द्वारा जितना ज्यादा खर्च दिखाया जाता है, उसे उम्मीदवारों के खर्च में जोड़ दिया जाता है। फिर अगर संबंधित उम्मीदवार का खर्च निर्धारित सीमा से ज्यादा होता है, तो उसके चुनाव को रद्द किया जा सकता है। पर ऐसा बहुत कम होता है, क्योंकि अक्सर उम्मीदवार अपने खर्च को इतना कम करके दिखाते हैं कि उसमें कितना भी जोड़ो, निर्धारित सीमा से वह ज्यादा नहीं हो पाता। अतीत के अनुभव बताते हैं कि तमाम सख्ती के बावजूद चुनाव का असली खर्च सामने नहीं आ पाता।
उम्मीदवार निर्धारित सीमा के भीतर ही चुनाव में खर्च कर सकें, इस नियम को और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए इस बार चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों को ये निर्देश दिए हैं कि हर उम्मीदवार को अपने चुनावी खर्चे के लिए एक नया बैंक एकाउंट खोलना पड़ेगा और हर तरह के चुनावी खर्च का लेन-देन बैंकों के माध्यम से ही करना होगा। इस कदम से भी उम्मीद है कि प्रत्याशियों के बेहिसाब खर्च पर अंकुश लगेगा। चुनावी खर्च को नियंत्रित करने की दिशा में ये कदम सराहनीय तो हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका कितना असर पड़ेगा, यह तो चुनाव के बाद ही पता लग सकेगा। हां, इतना जरूर है कि उम्मीदवारों को गैरकानूनी खर्च करने से पहले आगामी चुनावों में काफी सोचना पड़ेगा।
निर्वाचन आयोग का दूसरा मुख्य कदम सुप्रीम कोर्ट के हाल ही में दिए फैसले के अनुरूप है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि धर्म, जाति या भाषा का इस्तेमाल करके वोट मांगना एक चुनावी अपराध है और अगर कोई उम्मीदवार ऐसा अपराध करता है, तो उसकी उम्मीदवारी खारिज की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लागू करना एक बहुत पेचीदा और मुश्किल काम है, क्योंकि उम्मीदवारों या उनके समर्थकों के कहे हुए किन वाक्यों या शब्दों को धर्म, जाति या भाषा के तहत गलत साबित किया जाए, यह निर्धारित करना कोई आसान काम नहीं है। यह भी हो सकता है कि इसको लेकर कुछ मामले अदालतों में भी जाएं और आगे मुकदमे चलें। इस फैसले को लागू करने में मुश्किलों के दो उदाहरण तो पहले ही सामने आ चुके हैं। इस फैसले के एक-दो दिन बाद ही एक प्रमुख राजनीतिक दल के नेता ने एक खास समुदाय से अपील की कि वह उसी की पार्टी को वोट दें। जबकि हाल ही में एक अन्य पार्टी के एक राजनेता ने एक खास समुदाय को देश की उन्नति में बाधक बताया। इस दूसरे मामले में उस राजनीतिक नेता को निर्वाचन आयोग की तरफ से नोटिस भी जारी किया गया है। इस दूसरे मामले में क्या कार्रवाई होती है, उससे भी यह पता लगेगा कि इस फैसले को किस तरह, किस हद तक और किस सख्ती के साथ लागू किया जाएगा।
इन दो बड़ी कार्रवाइयों के अलावा आदर्श आचार संहिता को कितनी मुस्तैदी से लागू किया जाता है, यह भी एक अहम मुद्दा है। आदर्श आचार संहिता यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि किसी भी राजनीतिक दल को और खास तौर से सत्तारूढ़ दल को अनधिकृत फायदा नहीं मिलना चाहिए। आदर्श आचार संहिता को लागू करवाने में जितनी चुनाव आयोग की भूमिका होती है, उतनी ही राजनीतिक दलों, स्वैच्छिक संस्थाओं और साधारण नागरिकों की भी भूमिका होती है। नागरिकों, स्वैच्छिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों पर नजर रखनी होगी कि वे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन न करें और अगर कोई ऐसा करता है, तो उसकी सूचना ठोस प्रमाणों के साथ तुरंत चुनाव आयोग को दी जानी चाहिए।
एक बात सबको ध्यान में रखनी चाहिए कि चुनाव को स्वतंत्र, निष्पक्ष और साफ-सुथरे ढंग से संपन्न कराना सिर्फ आयोग की ही जिम्मेदारी नहीं है। चुनाव में सबसे अहम भूमिका मतदाताओं और नागरिक संगठनों की होती है, क्योंकि राजनीतिक दल तो इसमें स्पर्धाशील खिलाड़ी होते हैं, जो जीतने की आकांक्षा रखते हैं और कभी-कभी जीतने के लिए कानूनों का उल्लंघन भी करते हैं। उन्हें गलत काम करने से रोकने का उत्तरदायित्व चुनाव आयोग के साथ-साथ मतदाताओं और नागरिक संगठनों का भी है, जिन्हें चुनाव आयोग की से मदद करनी चाहिए। जब समस्त समाज एकत्रित होकर साफ और स्वच्छ चुनाव संपन्न कराने की कोशिश करेगा, तभी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न हो सकते हैं।