पहले तो रोते रहते हैं कि हाय, साहित्यकारों का सम्मान नहीं होता, और जब कोई करने पर उतर आता है, तो ये भागते फिरते हैं।
बताइए, विश्व हिंदी सम्मेलन में चालीस साहित्यकारों का सम्मान किया जाना था, मगर आधे भी नहीं पहुंचे। इन साहित्यकारों, लेखकों में यही आदत होती है कि ये अपने अलावा किसी को सम्मान के लायक ही नहीं समझते।
अब यह तो कोई बात ही नहीं हुई कि दस ही थे सम्मान के लायक और चालीस का झुंड बना दिया। आपका तो क्या है कि यहां-वहां सम्मान होता रहता है, मगर उन बेचारों का क्या, जो विश्व हिंदी सम्मेलन का इंतजार ही इसलिए करते हैं कि उनकी बरसों की मेहनत रंग लाएगी।
सम्मेलन के पदाधिकारियों की नजर में रहने के लिए कितनी मेहनत करते हैं ये लोग। चरण-स्पर्श से शुरू होकर सिर मालिश तक करने को तैयार रहते हैं ये प्राणी! बड़े और सम्मान के लायक लेखक बनने के लिए विनम्र होना चाहिए, इसीलिए ये लोग रीढ़ खूंटी पर टांगकर बाहर निकलते हैं। तो क्या ऐसे साहित्य (कार) प्रेमियों का सम्मान भी न करें।
जो नहीं आए, वे खुद तो कभी हाजिरी बजाते नहीं हैं और सम्मेलन के पदाधिकारी अगर ज्ञान के प्रकाश और विवेक से पता लगा लेते हैं, तो इनकी नानी मरने लगती है और कन्नी काटने लगते हैं। यों बताते हैं, जैसे दूसरों की तरह पैसा देकर सम्मान करवा रहे हों।
बस नहीं चलता, वरना उन्हीं लेखकों का सम्मान करें, जो जाने-परखे हों और भरोसे के हों। यदि जो गायब रहे, उनके ही भरोसे रहते, तो आज मुंह दिखाने लायक नहीं रहते हम तो।
आप ही सोचिए कि यदि गायब रहे लेखकों का ही सम्मान कर दें, तो सब्जी लाने, बच्चों को स्कूल लाने- ले जाने, रेल टिकट बुक करवाने और हमारे नाम से लेख लिखवाने के लिए क्या आसमान से फरिश्ते आएंगे? वर्षों खटते हैं, तो क्या सम्मान के लायक नहीं हैं? साहित्यकार की सेवा भी तो साहित्य-सेवा ही है। और विश्व हिंदी सम्मेलन के पदाधिकारी से बड़ा साहित्यकार और कौन हो सकता है?
जानते थे कि भारत में सम्मान किया, तो ये आएंगे नहीं और भद पिटवाएंगे, इसीलिए अमेरिका तय किया था कि घूमने-फिरने के बहाने ही आ जाएंगे। अब यह तो नहीं हो सकता कि जो नहीं आए, इसलिए जो आए हैं, उनका भी सम्मान न करें। जिसने हमारा मान किया, यदि उनका सम्मान भी न करें, तो कल से कौन फटकेगा हमारे घर!