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कोहिमा की याद में

Tue, 24 Jun 2014 11:21 AM IST
गार्डनर हैरिस
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सत्तर वर्ष पहले इसी समय भारत के नगालैंड में एक युद्ध में हजारों सैनिक मारे गए थे। कोहिमा में दो सप्ताह तक चली वह खूनी लड़ाई एक टेनिस कोर्ट से बस कुछ ही गज की दूरी पर लड़ी गई थी। तब कई रातों तक जापानी सैनिक टेनिस कोर्ट की सफेद पट्टी पार करने के क्रम में ब्रिटिश एवं भारतीय मशीनगनों द्वारा लगातार की जा रही गोलीबारी का शिकार होते रहे। कोहिमा और इंफाल की वह लड़ाई द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत में लड़ी गई सबसे खूनी लड़ाई थी। उस लड़ाई को भारत में काफी हद तक औपनिवेशिक अतीत का प्रतीक मानकर भुला दिया गया है। जो भारतीय सैनिक यहां लड़े और मरे, वे ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से लड़े थे। भारत के इस पूर्वोत्तर इलाके में लंबे समय से स्वायत्तता की मांग को लेकर आदिवासी समूहों के बीच से उभरे उग्रवादी संगठनों और सेना के बीच हुए हालिया संघर्ष ने पुराने गौरव की यादों को महत्वहीन बना दिया है।
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अब जब इस क्षेत्र में भारत ने सुरक्षा पकड़ में ढिलाई की है और विभिन्न संघर्षरत उग्रवादी गुटों के बीच अस्थायी शांति है, इतिहासकारों को उम्मीद है कि इस वर्ष उस जंग की सालगिरह दुनिया को द्वितीय विश्वयुद्ध की उस असाधारण लड़ाई की याद दिलाएगी। पिछले वर्ष ब्रिटेन के नेशनल आर्मी म्यूजियम द्वारा कराई गई एक प्रतियोगिया में उस लड़ाई को सर्वाधिक वोट मिले थे। वाटरलू और डी-डे (नॉरमंडी लैंडिंग्स) को पीछे छोड़ वह ब्रिटेन की सबसे महान लड़ाई के तौर पर आंका गया था।

जापान्स लास्ट बिड फॉर विक्टरीः द इन्वेशन ऑफ इंडिया, 1944 के लेखक रॉबर्ट लेमैन बताते हैं कि इंफाल की लड़ाई को जापानी अपनी सबसे बड़ी पराजय मानते हैं। दूसरी ओर, उस लड़ाई ने भारतीय सैनिकों को अपनी सैन्य क्षमता पर भरोसा दिलाया। उस लड़ाई ने जताया कि वे दुनिया की किसी भी सेना के बराबर और उनसे बेहतर ढंग से लड़ सकते हैं।
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नगालैंड और मणिपुर स्थित वह युद्धक्षेत्र, जो म्यांमार की सीमा से कुछ ही मील की दूरी पर है, लंबे समय से अलग-थलग रहने के कारण पूरी तरह से संरक्षित है। खाइयां, बंकर और हवाई पट्टी आज भी वैसे ही हैं, जैसे सत्तर वर्ष पहले थे। बेशक उन पर समय और मानसून की मार पड़ी है, पर जंगल में उन्हें स्पष्ट देखा जा सकता है।

इस पहाड़ी शहर में एक सुंदर, सीढ़ीदार सैन्य समाधि भी है, जिस पर पुराने टेनिस कोर्ट की सीमा-रेखाएं सफेद पत्थर से चिह्नित हैं। तीन महीने के इस स्मरणोत्सव का समापन समारोह इंफाल में 28 जून को होगा, जिसमें भारतीय प्रतिनिधियों के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य देशों के लोग भी शामिल होंगे। इसमें शामिल होने की योजना बना रहे नई दिल्ली स्थित जापानी दूतावास के उप प्रमुख याशुहिसा कावामुरा कहते हैं, 'जापान के लोग इंफाल और कोहिमा की लड़ाई को नहीं भूले हैं। सैन्य इतिहासकार इसे विश्व इतिहास की भीषण लड़ाइयों में शुमार करते हैं।'

इतिहास के एक स्थानीय प्रशंसक हेमंत कटोच के नेतृत्व में पिछले साल भर से युद्धक्षेत्र के आसपास एक छोटा, मगर तेजी से पर्यटन उद्योग पनपा है। लेकिन भारत उस लड़ाई की याद में सचमुच उत्सव मनाएगा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नेता द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन का समर्थन करने के मसले पर बंटे हुए थे और भारत की सरकारें आम तौर पर उस लड़ाई में हिस्सा लेने वाले अपने देश की सेनाओं तक से संबंध जोड़ने में असहज महसूस करती रही हैं। इसलिए अब तक केवल स्थानीय अधिकारी और एक पूर्व शीर्ष सैन्य अधिकारी ने ही इस सप्ताह होने वाले समापन समारोह में हिस्सा लेने के प्रति सहमति जताई है।

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के फेलो मोहन गुरुस्वामी बताते हैं, 'आजादी के बाद से भारत ने छह लड़ाइयां लड़ी हैं, लेकिन हमारे यहां एक भी युद्ध स्मारक नहीं है। इंफाल में बेशक भारतीय सैनिक मरे, पर वे एक औपनिवेशिक सरकार के लिए लड़ रहे थे।' सेंटर फॉर आर्म्ड फोर्सेस हिस्टॉरिकल रिसर्च, नई दिल्ली के सचिव राणा टीएस छिना बताते हैं, 'इस वर्ष प्रथम विश्वयुद्ध की महत्वपूर्ण लड़ाइयों के सौ वर्ष के अवसर पर हुए समारोह में शीर्ष भारतीय अधिकारियों ने हिस्सा लिया था। मुझे लगता है कि इंफाल और कोहिमा की लड़ाई को स्वीकार करने में हमें कुछ और दशक लग सकते हैं, फिर भी उम्मीद है।'

जापान की 15वीं आर्मी, जो भारत पर आक्रमण के लिहाज से 85,000 जवानों से लैस थी, उस लड़ाई में अनिवार्यतः नष्ट हो गई। उसके 53,000 सैनिक या तो मारे गए या लापता हो गए। बाकी घायल और बीमार हो गए। उस लड़ाई में करीब 16,500 ब्रिटिश सैनिक हताहत हुए।

इंफाल के निकट उस भीषण युद्धस्थल पर पहाड़ी की तराई में बने एक घर में वह लड़ाई देखने वाले 83 वर्षीय एक बुजुर्ग अब भी जीवित हैं। उन्होंने देखा था कि कैसे ब्रिटिश टैंकों ने जापानियों द्वारा बनाए बंकर नष्ट कर दिए थे। टैंकों के बारे में वह कहते हैं, 'हम उसे लोहे का हाथी कहते थे। उससे पहले हमने ऐसी चीज पहले कभी नहीं देखी थी।'

एंड्र्यू एस आर्थर उस समय वहां से दूर क्रिश्चियन हाई स्कूल में थे, जब लड़ाई शुरू हुई थी। बाद में जब वह शांगशाक गांव स्थित अपने घर लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनका घर नष्ट हो चुका था और उनके परिजन जंगलों में रह रहे थे। वह याद करते हैं कि उनकी मुलाकात एक घायल जापानी सैनिक से हुई थी, जो मुश्किल से खड़ा हो पाता था। वह उसे ब्रिटिश सैनिकों के पास ले गए, जिन्होंने उसका इलाज किया। वह बताते हैं, 'मेरे जीवन में ज्यादातर समय कभी किसी ने उस युद्ध के बारे में बातें नहीं कीं। यह अच्छी बात है कि लोग आखिरकार उसके बारे में बातें कर रहे हैं।'
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