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पिछले दरवाजे से सत्ता में

तवलीन सिंह Updated Sun, 20 May 2018 06:45 PM IST
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तवलीन सिंह
ऐसा पहली बार हुआ होगा कि आईपीएल के मौसम में देशवासियों ने क्रिकेट मैच देखने का मजा त्याग कर राजनीतिक समाचारों पर अधिक ध्यान दिया। इनमें मैं भी थी। कर्नाटक के परिणाम आने और येदियुरप्पा के शपथ लेने तक मैं टीवी के सामने बैठी रही, जैसे कोई बहुत ही दिलचस्प क्रिकेट मैच देखा जा रहा हो।


इस विधानसभा चुनाव के उतार-चढ़ाव भी पत्रकारों ने ऐसे दर्शाए, जैसे क्रिकेट मैच में दर्शाए जाते हैं। सो राजभवन कौन पहले पहुंचा, उसकी पल-पल की खबर हमको मिली, फिर राज्यपाल के निर्णय की प्रतीक्षा की घड़ियों का हर क्षण गिनाया गया, फिर बुधवार देर रात हुए सर्वोच्च न्यायालय में हुआ घटनाक्रम भी हमको दिखाया गया और पत्रकारों ने गर्व से हमको यह खबर भी दे दी कि उन्हें सारी रात जाकर गुजारनी पड़ी। पिक्चर अब भी बाकी है।


इस ड्रामा के पहलू कई थे और रंगमंच भी। एक रंगमंच था सोशल मीडिया पर, दूसरा टीवी स्टूडियो में और तीसरा दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में। ऐसा लगा, जैसे इस देश का हर व्यक्ति अपनी बात रखने का प्रयास कर रहा हो। अंत में दो खेमे बने। एक में थे कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने के समर्थक और दूसरे में येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाने के समर्थक।


प्रसिद्ध वकील दोनों खेमों में थे, फिर भी निजी तौर पर मुझे तब आश्चर्य हुआ, जब सर्वोच न्यायालय का दरवाजा आधी रात को खटकाने की नौबत आई। बाद में कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने स्पष्ट करने की पूरी कोशिश की कि उनका मकसद सिर्फ लोकतंत्र और संविधान को सुरक्षित रखने का था। क्या ऐसा अगले दिन नहीं हो सकता था? जिस समय शपथ ग्रहण समारोह शुरू हुआ, तब कांग्रेस अध्यक्ष ने ट्वीट कर अपने खेमे की रणनीति यह कहकर स्पष्ट की कि ‘जहां भारतीय जनता पार्टी अपनी खोखली जीत का जश्न माना रही है, वहां देश लोकतंत्र की हार का शोक माना रहा है।’


मैं अपने आप को दोनों खेमों से दूर रखना चाहती हूं, लेकिन इतना जरूर कहना चाहूंगी कि चुनाव परिणाम अगर एक बात को पूरी तरह स्पष्ट करते हैं, तो वह यह कि कांग्रेस सरकार को हटाना चाहते थे कर्नाटक के मतदाता। सो, कांग्रेस का पिछले दरवाजे से सत्ता में लौटना बिल्कुल शोभा नहीं देता। सच तो यह है कि अपनी इस सबसे पुरानी राजनीतिक दल को चिंता न लोकतंत्र की है और न ही सेक्यूलरिज्म की है। चिंता है सिर्फ यह कि कर्नाटक को खो देने के बाद कांग्रेस के पास दो ही सरकारें बचतीं। एक पंजाब में और दूसरी पुदुचेरी में। सच यह भी है कि अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके लिए चंदा इकट्ठा करने की जरूरत है।


कर्नाटक न रहा, तो यह पैसा आएगा कहां से? कर्नाटक में राजनेताओं के लिए पैसा इकट्ठा करना इतना आसान है कि जितने भी सदस्य बने हैं नई विधानसभा के, तकरीबन सब करोड़पति हैं। एक घड़ी को लेकर चुनाव अभियान के दौरान खूब हल्ला मचाया था भारतीय जनता पार्टी  के एक प्रवक्ता ने, लेकिन थोड़ा इधर-उधर देखा होता ईमानदारी के इस तथाकथित ठेकेदार ने, तो जरूर दिखता उसे कि लाखों रुपयों की घड़ियां उसके अपने साथियों ने भी पहन रखी थीं।


उनके चेहरों की तरफ नजर गई होती, तो यह भी दिखता कि उनकी विदेशी डिजाइनर ऐनकें इतनी कीमती हैं कि उन्हें लगाकर गरीब जनता की सेवा करने की बातें झूठी लगती हैं। कर्नाटक के राजनीतिज्ञ गर्व से कहते फिरते हैं कि उनकी पैदाइश और परवरिश गरीब किसान परिवारों में हुई है। तो जनाब सवाल यह है कि कहां से आया आपके पास इतना पैसा।
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