इस हफ्ते जो बहस पाकिस्तान में सुर्खियों में रही, वह थी पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ को इस्लामिक स्टेट (आईएस) से लड़ने वाले मुस्लिम सेनाओं के एक गठजोड़ का नेतृत्व करने के लिए सऊदी अरब द्वारा दिया गया प्रस्ताव। पूरे मुल्क में मानो कहर बरप गया, क्योंकि लोगों ने एक स्वर से सांप्रदायिक विभाजन के इस झगड़े में पाकिस्तान को घसीटे जाने की अनुमति देने से इन्कार कर दिया, क्योंकि ईरान और सीरिया जैसे कई शिया बहुल देश सऊदी के नेतृत्व वाले इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है।
नवाज सरकार ने पहले ही सऊदी सेना के साथ लड़ने के लिए अपने जवानों को यमन भेजने से मना कर दिया था। यदि राहिल शरीफ इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं, तो यह मूर्खतापूर्ण गलती होगी और पाकिस्तान को बेवजह विवादों में घसीटना होगा। इसके बजाय सभी मुस्लिम देशों को आईएस से लड़ने के लिए एकजुट होना चाहिए, जो धीरे-धीरे इस उप-महाद्वीप में अपनी पैठ बना रहा है।
लेकिन अभी सबसे ज्यादा जरूरी चार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अचानक रहस्यमय ढंग से गायब होने की गंभीर और क्रूर वास्तविकता पर बात करने की है, जिसके बारे में सरकार समेत किसी को भी पता नहीं है कि वे कहां हैं। कई लोग इसे भयावह स्थिति बता रहे हैं, क्योंकि एक मानवाधिकार कार्यकर्ता, कवि और शिक्षाविद सलमान हैदर अचानक इस्लामाबाद से गायब हैं। फिर लाहौर और मुल्क के अन्य हिस्सों से वकास गोराया, असीम सईद और अहमद रजा नासीर जैसे अन्य कार्यकर्ता घर नहीं लौटे। पूरे पाकिस्तान में सैकड़ों लोगों ने इसका विरोध करते हुए सरकार से इन चारों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का पता लगाने की मांग की, जो पिछले हफ्ते से गायब हैं।
पाकिस्तान के स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग के पूर्व प्रमुख सांसद अफरसियाब खटक ने इस्लामाबाद में विरोध प्रदर्शन करने वालों से कहा कि 'यह सरकार की दादागीरी है। जिन लोगों ने यह काम किया है, उन्होंने कानून तोड़ा है। यह मुल्क किसी जनरल, किसी नौकरशाह, पूंजीवादी या सामंत का नहीं है, बल्कि आम लोगों का है। हम चुप नहीं बैठेंगे।'
अभी तक किसी समूह ने इन चारों के अपहरण का दावा नहीं किया है। ये सोशल मीडिया पर आतंकवाद और सेना के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते थे। इससे पहले बलूचिस्तान से गायब हुए लोगों पर कभी इतना ध्यान नहीं दिया गया, क्योंकि संघीय सरकार इस प्रांत की अनदेखी करती थी। लेकिन इन चारों के गायब होने की घटना की चर्चा सत्ता के गलियारों (इस्लामाबाद) में हो रही है, क्योंकि सरकार इसको नजरंदाज करने का नाटक नहीं कर सकती। यह घटना ऐसे समय में हुई है, जब मुल्क में सेना का नहीं, बल्कि दो तिहाई बहुमत वाली सरकार का शासन है। सैन्य प्रमुखों की दबंगई की वे रातें पीछे रह गईं, जब इस तरह के अपहरण की घटनाएं आम थीं।
इस ताजा घटना के सभी लोग चिर-परिचित हैं, लेकिन ऐसे असंख्य मामले हैं, जिनमें गायब हुए लोगों का मामला कभी मीडिया तक नहीं पहुंचा।
लोगों की उंगलियां सुरक्षा प्रतिष्ठान की तरफ उठ रही हैं, लेकिन सशस्त्र बलों का लोक निकाय इंटर सर्विसेज प्रेस रिलेशंस इस बारे में चुप्पी साधे बैठा है। अतीत में यही एजेंसी बलूचिस्तान से असंतुष्टों को उठाने में शामिल रही है, जिनमें से कुछ दशकों से लापता हैं। जबरन गुमशुदगी से संबंधित जांच आयोग का कहना है कि वर्ष 2016 में 728 पाकिस्तानी लापता हुए, जिनमें से ज्यादातर बलूचिस्तान से थे। मुल्क के लोग लगातार हो रही गुमशुदगी की आलोचना कर रहे हैं और सरकार से एक स्वतंत्र और सुरक्षित समाज की मांग कर रहे हैं, जो सहिष्णु हो और असंतुष्ट लोगों की आवाज न दबाए। वे सरकारी एजेंसियों से अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने और इसके पीछे के रहस्यों को उजागर करने की मांग कर रहे हैं।
संसद में जब विपक्षी दलों ने सरकार को घेरा, तो गृह मंत्री चौधरी निसार ने कहा कि लोगों को गायब करने की उनकी सरकार की कोई नीति नही है और वह स्वयं भी इन ताजा गुमशुदगी की घटना की जांच कर रहे हैं। हालांकि उन्हें विपक्षी सदस्यों के बहिर्गमन का सामना करना पड़ा, जब उन्होंने कहा कि आतंकी समूहों से सांप्रदायिक समूह अलग हैं और वे उन्हें एक समान नहीं मानेंगे।
वास्तव में पाकिस्तान में सांप्रदायिक समूहों ने आतंकवादियों की तुलना में कई गुना ज्यादा नुकसान किया है। मुल्क कब यह समझेगा कि जेहादियों और आतंकवादियों को पनपने का मौका देना आत्मघाती होगा, क्योंकि वे उग्रवाद फैला रहे हैं और नफरत व असहिष्णुता फैलाते हैं। मगर ये गायब हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता वही भाषा बोलते हैं, जिसे मुल्क की बहुसंख्यक अवाम समझती है और वे सरकार से मांग कर रहे हैं कि उन्हें बोलने की अनुमति दी जाए। यह याद रखना चाहिए कि मुल्क कानूनों से चलता है और अगर ये मानवाधिकार कार्यकर्ता कुछ गलत कर रहे थे, तो उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें अदालत में पेश करना चाहिए।
अगर सरकार यह समझती है कि इन कार्यकर्ताओं ने गुनाह किया है, तो उनका अपहरण करके उन्हें अलग-थलग रखना एक लोकतांत्रिक समाज में कहां तक जायज है? इस प्रकरण का सबसे दुखद पहलू यह है कि कई बार पीड़ित परिवार इतना डरा होता है कि गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज नही कराता और अगर वे घर लौट आते हैं, तो इस बारे में एक भी शब्द सुनने को नहीं मिलता कि वे कहां थे। इससे पहले लेखक, प्रकाशक और बलूच कार्यकर्ता वाहिद बलूच का अपहरण किया गया था, जिसे व्यापक विरोध के बाद छोड़ा गया। अब तक कोई नहीं जानता कि उन्हें किसने अपहृत किया और छोड़ा था।
यही समय है कि भय का यह चक्र टूटे और इस गुमशुदगी के पीछे के लोगों को सबक सिखाया जाए। पाकिस्तान पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए सबसे खतरनाक मुल्कों में से एक है। सेना के आलोचकों को हिरासत में रखा, पीटा और मार दिया जाता है।