ये साल 1957 के अंतिम दिन थे। किताब का नाम था `आखिरी खत'। डिजाइन बन गया। अमृता को पसंद आ गया। कलाकार भी मिलने लगे, पसंद बढ़ने लगी। वह 1958 की जनवरी थी । 26 जनवरी की छुट्टी का दिन। अमृता से मिलने गया। बातों-बातों में कह बैठा कि आज के दिन मैं पैदा हुआ था। वह उठी और जल्दी वापस आ गयी। कुछ देर बाद ही उनका नौकर एक केक कुर्सी पर सजा गया। उसने केक काटा एक टुकड़ा मुझे दिया और एक खुद ले लिया। न उन्होंने केक काटते हुए हैप्पी बर्थडे कहा और न ही मैंने केक खाकर शुक्रिया कहा। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे, आंखें हंसती रहीं।
वह रोज बस में रेडियो स्टेशन जाया करती थी, पंजाबी प्रोग्राम पेश करने। बस में जाती अमृता को देखकर मुझे अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मैं विवश था। मैं सोचता रहता, बस से, बस की भीड़ से अमृता को मुक्त करवाने के बारे में। अचानक मेरे काम के रुके हुए पैसे मुझे मिले, सोचा हुआ सच हो गया और बल्ले-बल्ले भी। नया स्कूटर आ गया और बस की बेआरामी चली गई। मैं अमृता को हर रोज रेडियो स्टेशन तक ले जाता और वापस भी ले आता। वह पीछे बैठी मेरी पीठ पर उंगलियों से कुछ लिखती रहती, मैंने कभी पूछा नहीं कि वह क्या लिखती है। अमृता ने खुद ही कहीं लिख दिया कि पीठ पर वह साहिर-साहिर लिखती रहती थी। साहिर लुधियानवी का नाम।
एक मुलाकात में मुझसे किसी ने पूछा कि मुझे बुरा नहीं लगता-अपनी पीठ पर लिखा साहिर। मैंने कहा कि इसमें बुरा ही क्या है? पीठ भी उसकी और नाम भी उनके मनचाहे का। रसोई और घर के कामकाज हों या `नागमणि' का संपादन, हर काम हमने मिलकर किया। अमृता के खूबसूरत और प्यारे स्वभाव को मैंने पहले देखा और उसके चेहरे की सुंदरता को बाद में। अमृता को देख-देख कुछ भी अमृता से अलग नहीं दिखाई दिया। उसके साथ लगता कि सब भेद लिए आज भी अमृता ही है। प्यार में प्यार ही दिखता है।
सिर्फ प्यार के पास प्यार है, आदर भी है, जिंदगी भी है और दृष्टि भी। साथ ही विद्रोह करने की शक्ति भी। समाज के पास कानून है, कानून के बंधन हैं। न आदर और न ही आंखों, दृष्टि के नाम पर विद्रोह करने की शक्ति। अमृता एक बार मुझे मिलने भरी बरसात में आई। दरवाजा दस्तक दे रहा था। मैंने द्वार खोला पर वह अंदर नहीं आई। कहने लगी, `तुम्हारे दर पर भी दस्तक देनी पड़े, मुझे यह पसंद नहीं है।' मैंने उसे दूसरी चाबी थमा दी। वह कितनी ही देर चाबी को देखती रही और कभी मुझे और कमरा अपने आप को घर बनता देखता रहा।
मेरी तमन्ना थी कि किसी एक प्रकाशक की सभी किताबों के कवर डिजाइन मैं ही बनाऊं, सुंदर कवर डिजाइन। लेकिन मेरी तमन्ना के जैसा कोई पब्लिशर नहीं मिला। हां, लेखक मिल गया। अमृता की किताबों के तमाम कवर आज तक मैं ही बना रहा हूं। मेरा सौभाग्य...। फिल्म डायरेक्टर गुरुदत्त ने अपनी फिल्म `प्यासा' का कुछ काम मुझसे करवाया था। जो उसे खूब पंसद आया। अब वह अपनी फिल्म कंपनी में काम करने की दावत दे रहे थे, सिर्फ तनख्वाह तय होनी बाकी थी, फिर वेतन भी तय हो गया। उसकी तरफ से अपॉइंटमेंट लेटर आ गया, मैंने 'शमा' से इस्तीफा दे दिया। बम्बई की टिकट बुक करवा ली।
कहने को तो मैं बंबई गया भी, लेकिन तीन दिन बाद ही अमृता को फोन किया कि `मैं यहां टिक नहीं पाऊंगा।' उसने पूछा, `क्यों?' मैंने कहा था, `पता नहीं।' मर्जी का काम, अनेक अवसर, अच्छा वेतन। सब छोड़कर मैं वापस आ गया। मेरे जाने के बाद अमृता को बुखार हो गया था। स्टेशन पर मुझे लेने आई थी। मुझे गाड़ी से उतरते देखकर उसका बुखार भी उतर गया। शाम के गहराते रंगों में चलना फिर शुरू हो गया। एक दिन हम हुमायूं मकबरे के बाग में अपने आप से भरे चल रहे थे कि अमृता ने पूछा, `पहले भी तुम किसी के साथ चले हो न।' `चला हूं, पर जगा किसी के साथ नहीं। सिर्फ तुम्हारे साथ जाग पाया हूं।' सुनकर वह चलते हुए रुक गई और मेरे सामने होकर देर तक मुझे देखती रही। फिर अपने हाथों में मेरा हाथ लेकर यों चलने लगी, मानों सारी हदें सरहदें पार कर ली हों।
उसे कभी कहने की जरूरत नहीं पड़ी कि तुम्हें प्यार करती हूं। प्यार के अस्तित्व को शब्दों की जरूरत भी नहीं होती। मुहब्बत हो, तो सब रंग चुपचाप आंगन में जीवन के साथ आ घुलते हैं-
खेलते देखे हैं मैंने कई बार
सुबह के रंगों में चांद-तारों के रंग।
-पंजाबी से हिंदी अनुवाद- योगेश्वर कौर