विगत चार फरवरी को विदेश नीति से संबंधित अपने पहले भाषण में अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति जो बाइडन के जिस वाक्य ने सबसे अधिक ध्यान खींचा, वह था- 'अमेरिका पटरी पर लौट आया है।' बाइडन का यह भाषण बहुत उथल-पुथल देख चुके अपने देशवासियों के साथ-साथ अमेरिका के विदेशी दोस्तों और सहयोगियों को शांत और आश्वस्त करने के लिए था। शेष दुनिया के लिए बाइडन के भाषण की एक और जो पंक्ति उल्लेखनीय थी, वह थी, 'कूटनीति हमारी विदेश नीति के केंद्र में लौट आई है।' यह ट्रंपकालीन दबंगई और दर्पोक्ति के खत्म होने का उत्साहजनक संकेत था।
बाइडन ने अंतरराष्ट्रीय रिश्तों से संबंधित अपनी प्राथमिकता के बारे में कहा, 'हम अपने गठजोड़ों को दुरुस्त करेंगे और सिर्फ अतीत की नहीं, बल्कि आज और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए एक बार फिर दुनिया से जुड़ेंगे।' उन्होंने किसी को संदेह में नहीं रखा कि पुनर्जीवित की गई उनकी विदेश नीति का उद्देश्य क्या होगा : 'बढ़ते अधिनायकवाद की नई स्थिति का मुकाबला करना होगा, जिसमें अमेरिका को चुनौती देने की चीन की महत्वाकांक्षा भी शामिल है और हमारे लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने तथा इसमें गतिरोध पैदा करने की रूस की कोशिश भी।' अलबत्ता वैश्विक चुनौती की बात करते हुए उन्होंने वास्तविकता भी स्वीकारी, 'उन्हीं मुद्दों को सुलझाएंगे, जिनमें दूसरे देशों की सहमति हो और लक्ष्य साझा हो, अमेरिका यह काम अकेले नहीं कर सकता।'
बाइडन के मुताबिक, 'अमेरिका की कभी खत्म न होने वाली ताकत वस्तुतः इसके लोकतांत्रिक मूल्य हैं : यानी स्वतंत्रता की रक्षा करना, सबको अवसर मुहैया कराना, वैश्विक अधिकारों की रक्षा, कानून के शासन का सम्मान और सभी व्यक्ति की गरिमा का ध्यान रखना।' विडंबना यह है कि अमेरिका द्वारा इन उच्च जीवन मूल्यों की वकालत करने से भारत समेत कई देशों से उसके रिश्ते तनावपूर्ण हो सकते हैं। ट्रंप के अपने दोस्तों और सहयोगियों से भी लापरवाह रिश्ते थे। लेकिन बाइडन के लिए 'अमेरिका के सहयोगी ही उसकी सबसे मूल्यवान संपत्ति हैं, और कूटनीति के साथ आगे बढ़ने का मतलब है अपने सहयोगियों और साझेदारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना।' जाहिर है कि बाइडन अमेरिका के आलोचकों और प्रतिद्वंद्वियों के साथ कूटनीतिक रूप से निपटेंगे। चूंकि चीन के साथ हमारा सीमा विवाद है और एलएसी पर आक्रामकता के कारण गलवां घाटी में हमारे 20 जवान शहीद हुए थे, लिहाजा बाइडन की चीन नीति हमारे लिए भी बहुत महत्वपूर्ण होगी।
चीन के प्रति हमारा और अमेरिका का रवैया एक जैसा होने के बावजूद हमें नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका और चीन की अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे पर इतनी निर्भर हैं कि उनका अलग होना असंभव है। ऐसे ही अमेरिका की आव्रजन नीति, खासकर एच1बी वीजा में नरमी तथा पत्नियों को काम करने देने की अनुमति आदि ऐसे फैसले हैं, जिनसे भारतीय आईटी प्रोफेशनलों की चिंता कम हुई होगी। जैसा कि प्रत्याशित ही था, बाइडन के भाषण में भारत का जिक्र नहीं था। लेकिन बाइडन ने शी जिनपिंग से पहले नरेंद्र मोदी से टेलीफोन पर बात की थी। नए अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकेन अब तक हमारे विदेश मंत्री से दो बार बात कर चुके हैं। ऐसे ही अमेरिका के नए रक्षा मंत्री तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी अपने भारतीय समकक्षों से संवाद कर चुके हैं।
बाइडन प्रशासन भारत को 'हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक मानता है तथा इस क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत के उभरने का स्वागत करता है।' इसके अलावा 'हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त और उदार बनाए रखने' के लिए अमेरिका क्वाड को आगे बढ़ाता रहेगा। समुद्री सुरक्षा प्रदान करने के अलावा क्वाड जलवायु परिवर्तन, कोविड-19 महामारी और लोकतंत्रों को मजबूत करने में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है। बाइडन ने लोकतांत्रिक देशों की बैठक आयोजित करने का जो सुझाव दिया है, जिसमें म्यांमार जैसे मुद्दे पर बहस हो सकती है, भारत को उसका स्वागत तो करना ही चाहिए, उसे अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप भी कदम उठाना चाहिए।
भारत और अमेरिका के बीच न सिर्फ विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग निरंतर जारी है, बल्कि अमेरिका में रिपब्लिकन्स और डेमोक्रेटिक, दोनों ही पार्टियों ने अपने कार्यकालों में इसे आगे बढ़ाया है। बाइडन-हैरिस के कार्यकाल में इस आपसी सहयोग के और आगे बढ़ने की ही संभावना है। अलबत्ता बाइडन ने अपने भाषण में स्वतंत्रता की रक्षा, वैश्विक अधिकारों की बहाली, कानून के शासन का सम्मान, सभी को समान गरिमा देने की प्रतिबद्धता और बढ़ते अधिनायकवाद का मुकाबला करने जैसे जिन मूल्यों को बढ़ावा देने की बात कही है, भारत को उसका ध्यान रखना चाहिए। इसकी वजह यह है कि जरूरत पड़ने पर बाइडन प्रशासन इन मुद्दों पर अपनी चिंता जताने में नहीं झिझकेगा।
विगत 26 जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा की अमेरिका में आलोचना हुई। लेकिन सरकार की आलोचना करने पर कार्टूनिस्ट और स्टैंड अप कॉमेडियन की गिरफ्तारियों या उन पर देशद्रोह के तहत मामला दर्ज करने या विरोधियों पर प्रवर्तन निर्देशालय के छापे और एनसीबी की पूछताछ और कथित लव जेहाद के आरोप में गिरफ्तारियों से अमेरिकी जनमत में भारत की नकारात्मक छवि बन रही है। अमेरिका में जब ‘ब्लैक लाइव मैटर्स’ का आंदोलन चल रहा था, तब हजारों भारतीयों ने सोशल मीडिया में उसके पक्ष में टिप्पणियां की थीं। लेकिन जब हमारे यहां के किसान आंदोलन पर एक अमेरिकी सेलिब्रिटी रिहाना ने कुछ टिप्पणियां कीं, तो हमने तल्ख प्रतिक्रिया जताई। 1.3 अरब की आबादी वाले देश को एक अमेरिकी गायिका की टिप्पणी पर पागलों जैसा व्यवहार क्यों करना चाहिए?
हम इस प्रतिक्रिया की अनदेखी क्यों नहीं कर पाए? दिल्ली पुलिस ने रिहाना के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का जो कदम उठाया, वह तो और भी बेतुका और हास्यास्पद था। हमें एक आत्मविश्वासी और परिपक्व लोकतंत्र की तरह, जिसका हम दावा करते हैं, व्यवहार करना चाहिए। 'घर को बेहतर बनाने के साथ अपनी साख और नैतिक आभा फिर से हासिल करने' की बाइडन की प्रतिबद्धता क्या भारत के लिए भी प्रासंगिक नहीं है?