अगर भाजपा दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीतती, और गुजरात में नरेंद्र मोदी के नाम पर बने मंदिर पर विवाद खड़ा होता, तो क्या प्रधानमंत्री सार्वजनिक तौर पर उस मंदिर पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते? यह सच्चाई सामने आने के बाद, कि गुजरात के उस मंदिर में मोदी की मू्र्ति काफी समय से है, यह प्रश्न खास तौर पर प्रासंगिक है। इसके बावजूद मोदी ने अपने नाम पर बने मंदिर की आलोचना इतने दिनों बाद, अब तक के अपने सबसे खराब चुनावी नतीजे के बाद, की। या उन्होंने दिल्ली चुनाव में हारने के कारण ही राजकोट में अपने नाम पर बने मंदिर की आलोचना की? पर यह समय इस पर विमर्श करने का नहीं है। दिल्ली के चुनावी नतीजे पर भाजपा और मोदी के खिलाफ बहुत कुछ कहा जा चुका है।
अगर आप 1967 के बाद के चुनावी परिदृश्य पर नजर डालें, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली एक पार्टी की राजनीतिक व्यवस्था दरकने लगी थी, तो पाएंगे कि उसी नेता के नेतृत्व में वह पार्टी सिर्फ दो बार ही केंद्र की सत्ता में आ पाई-एक बार 1998-1999 में-अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग, और दूसरी बार 2004-2009 में-मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संप्रग। 1971 का चुनाव जीतने के बाद 1977 में कांग्रेस बुरी तरह हारी। जबकि आपातकाल के बाद सत्ता में आई जनता पार्टी 1980 के चुनाव में पराजित हुई। बेशक 1984 में कांग्रेस को लगातार दूसरी बार जीत हासिल हुई, पर राजीव गांधी के नेतृत्व में वह एकदम नई पार्टी थी। अगर इंदिरा गांधी की दुर्भाग्यजनक तरीके से हत्या न होती, तो वह चुनाव कांग्रेस जीतती, इसमें संदेह है।
वर्ष 1999 का चुनाव कारगिल युद्ध के करीब एक महीने बाद हुआ था, इसलिए राजग को सत्ता में वापस लाने में वह महत्वपूर्ण साबित हुआ। इसी तरह 2009 का चुनाव कांग्रेस ने यूपीए-1 की अपनी उपलब्धियों के कारण तो जीता ही, विपक्षी पार्टी के तौर पर भाजपा की विफलता के कारण भी वह विजयी रही थी। इससे यही पता चलता है कि राजनीतिक पार्टियों को केंद्र में लगातार दूसरा मौका या तो अपने कामकाज के कारण मिलता है, जैसा कि यूपीए-1 को सूचना का अधिकार कानून और रोजगार गारंटी कानून के कारण मिला, या राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे में होने के कारण, जैसा कि कांग्रेस को 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, और भाजपा को 1999 में कारगिल युद्ध के बाद मिला।
अगर लगातार सत्ता हासिल करने को राज्य के स्तर पर देखें, तो नरेंद्र मोदी की उपलब्धियां शानदार हैं; उन्हें लगातार तीन विधानसभा चुनावों में जीत मिली। इस मामले में ज्योति बसु की उपलिब्धयां तो सबसे बड़ी हैं। गेगांग अपांग भी दो दशक से अधिक समय तक अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। इस समय ओडिशा में नवीन पटनायक, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और बिहार में जदयू एक से अधिक बार चुनाव जीतकर सत्ता में है, जबकि त्रिपुरा में माकपा 1993 से सरकार में है। राज्यों की सत्ता में एक से अधिक बार रहने वाले मुख्यमंत्री दरअसल वे हैं, जिन्होंने जनता के हित में कदम उठाए हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले गुजरात को छोड़ दें, तो दूसरे किसी राज्य में मतदाताओं ने ऐसे किसी नेता को लगातार नहीं जिताया, जिसने प्रशासन की कॉरपोरेट शैली विकसित की हो। इससे यही पता चलता है कि भारतीयों के लिए अच्छे प्रशासन का मतलब कामकाज का पुराना तौर-तरीका ही है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और उसके प्रति मतदाताओं के रुख का आकलन करना महत्वपूर्ण है। पहली बात यह कि संघीय व्यवस्था की जगह केंद्रीकरण की एक ऐसी प्रणाली ने ले ली है, जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय बहुत शक्तिशाली हो गया है, और छोटे-छोटे मुद्दों पर नजर रखने की व्यवस्था है। अत्यधिक नियंत्रण की इस प्रशासनिक व्यवस्था लोगों को नागवार गुजर रही है; वे चाहते हैं कि सरकार थोड़ी लोकतांत्रिक और व्यवस्था विकेंद्रित हो।
दूसरी बात यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास कहने-करने को बहुत कुछ है, वह ऊर्जा से भरपूर हैं, पर अमल करने के मामले में वह बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। यह मोदी के कामकाज की पुरानी शैली है। उनकी आदत है कि वह पुरानी योजनाओं को झाड़-पोंछकर नया रूप देते हैं, इसलिए उनकी सभी नई योजनाओं पर नजर रखने की जरूरत है। उनकी यह आदत शुरुआत से ही है, जब गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर वह बगैर जरूरी अनुमोदन के ही योजनाओं की शुरुआत कर देते थे। इससे वहां तदर्थवाद की संस्कृति पनप गई थी, जिसमें योजनाएं शुरू तो की जाती थीं, पर उनके चलने की गारंटी नहीं होती थी। गुजरात जैसे छोटे राज्य में ऐसी व्यवस्था चल सकती है, पर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा नहीं चल सकता। पिछले दिनों प्रधानमंत्री के साथ बैठक में कई मुख्यमंत्रियों ने तकरार का रुख अपनाते हुए कहा कि वे उन सरकारी कार्यक्रमों पर खर्च क्यों करें, जिनके सफल क्रियान्वयन का सेहरा प्रधानमंत्री के सिर बंधेगा। मोदी सरकार की छवि यह बनती जा रही है कि वह सिर्फ अमीरों के हितों में काम करती है। भारत जैसे देश में किसी सरकार की ऐसी छवि बन जाना बहुत घातक है। इस कारण मोदी छवि की लड़ाई हार रहे हैं। हालांकि इस संदर्भ में सीएसडीएस का सर्वे भी देखने लायक है, जिसके मुताबिक, दिल्ली के विधानसभा चुनाव में जिन लोगों ने आप को वोट दिया, वे अब भी राष्ट्रीय नेता के तौर पर मोदी का ही समर्थन करेंगे।
चुनाव आते और जाते रहेंगे। पर हर विजेता नेता के सामने एक आदमी चुनौती देता खड़ा रहता है। और यह उस नेता की योग्यता पर निर्भर है कि वह अपने कार्यकाल को कितना विस्तार दे पाते हैं। कम से कम यह एक सीख तो मोदी को लेनी ही चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार, और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक