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यह विकास सभ्य बनने का भ्रम है!

Sat, 03 Aug 2013 08:04 PM IST
डॉ. आर. के. पचौरी/मशहूर पर्यावरणविद्
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आज जलवायु परिवर्तन का प्रभाव वैश्विक मौसम, ग्लेशियरों और पर्वतों पर तो दिख ही रहा है। लेकिन इसका सबसे खतरनाक पहलू मानव स्वास्थ्य से जुड़ा है।
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जलवायु परिवर्तन के कारण संक्रामक रोगों में बढ़ोत्तरी हो रही है। संक्रमण के फैलने की रफ्तार और उसका असर पहले से ज्यादा बढ़ा है। वैज्ञानिक कारक साफ तौर पर नजर आ रहे हैं। हम अपनी आंखें बंद कर सकते हैं, लेकिन वास्तविकता को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

जलवायु परिवर्तन के कारण ध्रुवीय भूमि पर बर्फ की चादर के आंशिक रूप से पिघलने से समुद्र जल का स्तर कई मीटर बढ़ सकता है। बढ़ते हुए जलस्तर के प्रभाव से नदियों के डेल्टा और समुद्र के तटीय इलाकों पर इसका विपरीत असर पड़ सकता है।
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जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ते समुद्र जल के स्तर से तटीय क्षेत्रों के पास स्थित कोलकाता, शंघाई और ढाका जैसे शहरों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो रहा है।

वर्ष 2007 में जलवायु परिवर्तन से जुड़े इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने जब अपनी रिपोर्ट पेश की तो लोग हैरत में पड़ गए। तभी यह बात साफ हो गई थी कि नीति निर्धारकों के लिए लंबे समय तक जलवायु परिवर्तन के खतरे को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

उस दौरान जर्मनी में हुए जी-8 सम्मेलन में भी जलवायु परिवर्तन और मानव जाति के अस्तित्व का मुद्दा चर्चा में छाया हुआ था। आईपीसीसी की उस रिपोर्ट से दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन से जुडे़ खतरों को लेकर एक बहस छिड़ गई थी, लेकिन कोई रिपोर्ट एक बार हलचल जरूर पैदा कर सकती है, इसका स्थायी असर नहीं हो सकता। लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं।

इसलिए हमें ऐसे उपायों के बारे में सोचना होगा, जिससे लोगों को जलवायु परिवर्तन के बारे में निरंतर संदेश मिलता रहे और इसके प्रति उनकी संवेदनशीलता बनी रहे। ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में प्रकृति के साथ हुई छेड़छाड़ और उससे जुडे़ खतरों की चर्चा पहले नहीं हुई थी।

लेकिन उन चर्चाओं और सुझावों पर अमल नहीं किया जाता। हमें यह समझना होगा कि शहरों के विकास के मॉडल को पहाड़ों पर जस का तस लागू नहीं किया जा सकता। पहाड़ों की अलग प्रकृति और जरूरते हैं। इसलिए वहां विकास का मॉडल स्थानीय जरूरतों के मुताबिक होना चाहिए।

आपदाओं का कारण सिर्फ जलवायु परिवर्तन न होकर अंधाधुंध विकास और जरूरत से ज्यादा मानवीय दबाव भी है। नदियों के किनारे बड़े-बड़े होटल, मकान और टूरिस्ट कॉम्प्लेक्स तैयार किए गए हैं। नदियों के पानी में सिल्ट (गाद) बहकर आती है। जंगलों के कटने के कारण सिल्ट की समस्या बढ़ गई है।

लिहाजा जब बाढ़ आती है तो नदी के किनारे पानी को संभाल नहीं पाते और सब कुछ बह जाता है। ज्यादातर सड़कें नदियों के ठीक ऊपर बनाई गई हैं। सड़कों के रखरखाव के दौरान निकला मलबा सीधे नदियों में पहुंचता है। यह स्थिति लंबे समय में खतरनाक साबित होती है।

अगर निर्माण के नियमों, दूरगामी नतीजों और जनता के हितों पर समय रहते ध्यान दिया जाता तो उत्तराखंड में इतना विनाश नहीं होता। हमें इन घटनाओं से भविष्य के लिए सबक सीखना चाहिए। प्रकृति से छेड़छाड़ और जलवायु परिवर्तन की स्थिति में लोग और संपत्ति दोनों ही प्रभावित होंगे।
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इसलिए दुनिया भर की सरकारों को जल्द से जल्द जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के उपाय करने होंगे। विकास का मकसद लोगों के जीवन स्तर को सुधारना और उसे सुरक्षित बनाना होना चाहिए। विकास का खाका ऐसे खींचा जाए जिससे नुकसान कम हो और भविष्य भी सुरक्षित रहे।

हम अभी विकास की जो गाथा कह रहे हैं, दरअसल वह सभ्य बनने का एक भ्रम है। पूरी दुनिया को इस भ्रम से बाहर आना होगा।
अमर उजाला 'संवाद' का अंश
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