भारत के उत्तर और पूर्व में 2,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हिमालय मजबूत सैनिक के रूप में सीमाओं की रक्षा करता है। माथे पर बर्फ का कवच पहने और उसके नीचे हरियाली ओढ़कर वह पानी, हवा, मिट्टी उपहार के रूप में दे रहा है। इस हिमालय की छांव में पले-बढ़े चिपको नेता घनश्याम सैलानी ने बीती सदी के अस्सी के दशक में स्वरचित गीत में देश-विदेश के लोगों का आह्वान करते हुए लिखा था कि आप अपने भाई-बहन व संबंधियों के साथ एक बार हिमालय के दर्शन करें।
उस दौरान जंगल कट रहे थे। तब चिपको के प्रणेता चंडीप्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा जनता के बीच से आवाज देते थे कि क्या है जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार! आज भी ये सवाल जिंदा हैं। चिपको आंदोलन की महिला नेत्री गौरा देवी और हजारों महिलाओं का संगठन जंगलों से वन काटने वाले मजदूरों को भगाते हुए बोल रहा था, घास, लकड़ी, पाणी, इसके बिना योजना काणी! अर्थात हिमालय के पर्वतों में जंगल नहीं है, तो इसके बिना विकास की योजनाएं खोखली हैं। आज भी राष्ट्रीय हिमालयी नीति अभियान, जल बिरादरी और संत-महात्मा हिमालय के सवालों पर मुखर हैं।
हिमालय को बचाने की इस पहल को केंद्र की सरकारों ने अब तक दबाकर रखा है। त्वरित भौतिक विकास की अंधी दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों का निर्मम दोहन किया जा रहा है, जिस कारण हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है। पहले ग्लेशियरों तक लोग पहुंचते ही नहीं थे। अब बचे-खुचे ग्लेशियरों की ओर पर्यटकों को आकर्षित किया जा रहा है। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो यह आस जगी थी कि ‘नमामि गंगे’ के साथ हिमालयी विकास के मॉडल पर विचार होगा। इसके लिए बाकायदा उन्हें हजारों हस्ताक्षरों के साथ हिमालय नीति बनाने के लिये सरकारी आंकड़ों के साथ एक दस्तावेज भी सौंपा गया। 11 जुलाई, 2014 को संसद में हरिद्वार के सांसद व उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने हिमालयी राज्यों की अलग सामाजिक, राजनीतिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए एक अलग मंत्रालय बनाने की जोरदार पहल की थी, जिसका अनेक सांसदों ने समर्थन किया था। तब राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा था कि सरकार हिमालयी क्षेत्रों के प्रति प्रतिबद्ध है। संसद की वह बहस देखकर आस जगी थी कि प्रधानमंत्री आपदा प्रभावित केदारनाथ के पुनर्निर्माण में जिस तरह रुचि दिखा रहे हैं, उसी तरह हिमालय के लिए अलग मंत्रालय बनाएंगे।
लेकिन मोदी सरकार के सत्ता के पांचवें साल में प्रवेश के बाद भी हिमालय के सवाल ज्यों के त्यों हैं। इस दौरान गंगा की अविरलता के सवालों की अनदेखी तो हुई ही, हिमालय के प्रति कोई गंभीरता भी नहीं दिखाई गई। राष्ट्रीय हिमालय नीति अभियान ने आठ सितंबर, 2017 को सांसदों के नाम खुला पत्र जारी किया था, वह भी संसद के गलियारे से गायब है।
वैसे हिमालयी राज्यों का अलग मंत्रालय बनाने की बात नई नहीं है। वर्ष 1992 में भी योजना आयोग के विशेषज्ञों ने भी डॉ. जेएस कासिम की अध्यक्षता में हिमालय विकास प्राधिकरण का खाका तैयार किया गया था, जिसे बाद में ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। संसद में 11 हिमालयी राज्यों से कुल 40 सांसद चुनकर जाते है, जो अकेले बिहार के बराबर है। अतः संसद में हिमालयी प्रश्नों की अनदेखी चिंताजनक है।
-लेखक पर्यावरण कार्यकर्ता हैं