भारत के नए प्रधानमंत्री के रूप में आज शाम जब नरेंद्र मोदी शपथ लेंगे, तब देश के इतिहास में एक नया दौर शुरू होगा। स्वतंत्रता मिलने के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब भारत के सबसे पुराने राजनीतिक दल को लोकसभा में इतनी कम सीटें मिली हैं। आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में भी कांग्रेस को 150 से अधिक सीटें मिली थीं। तो भला कौन कह सकता था कि इस बार 44 सीटें ही आएंगी। इसलिए जब परिणाम आए, तो मुझे विश्वास हो गया कि वास्तव में कहीं कोई विधाता है। इसलिए कि हम जैसों को मालूम था कि कांग्रेस ने अपने राज में अपनी सेवा ज्यादा और जनता की सेवा कम की है।
नेहरू जी का जमाना कैसा था, मैं नहीं कह सकती हूं, लेकिन पत्रकार बनने के बाद जब से मैंने अपना राजनीतिक होश संभाला है, तब से यह देखा है कि लोकतंत्र के नाम पर दिल्ली में दरबार था। इंदिरा गांधी राजनेता से ज्यादा महारानी थीं। उनके दरबार में जब कभी कांग्रेस के किसी सदस्य ने विरोध जताने की हिम्मत दिखाई, तो उसे दरबार से निकाल दिया जाता था। जब देशवासियों ने 1975 में विरोध जताने की कोशिश की, तो उन पर आपातकाल लगा दिया गया। आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी की जब हार हुई और फिर वह जीतकर आईं, तो उन्होंने एक नए किस्म का सामंतवादी लोकतंत्र कायम किया। तभी से कांग्रेस गांधी परिवार की निजी कंपनी बनने में लग गई।
इंदिरा गांधी ने स्पष्ट कर दिया कि इस कंपनी के मालिक हमेशा उनके अपने परिवार के सदस्य रहेंगे। इस सामंतवादी लोकतंत्र की परंपरा को मजबूत करने के लिए अन्य कांग्रेस नेताओं को भी अपने बच्चों और परिजनों को अपने राजनीतिक विरासत के हकदार बनने का अधिकार दिया गया। कारवां बनता रहा और विपक्षी दल भी इसी रास्ते पर चलने लगे। ऐसी बातों के पीछे छिपी रही ऐसी हकीकत, जिसके जरिये राजनीति जनता की सेवा न रहकर एक कारोबार बनकर रह गई। इसलिए जब जनता को पहली बार मोदी में विकल्प दिखा, तो उन्हें इस उम्मीद से पूरा बहुमत देकर दिल्ली भेजा है कि वह अपने दौर में असली लोकतंत्र कायम कर सकेंगे।
लेकिन क्या वह ऐसा कर सकेंगे? मोदी ने जब संसद में भाजपा के नवनिर्वाचित सांसदों को संबोधित किया, तो उन्होंने देखा होगा कि पार्टी के पुराने नेताओं के कितने बच्चे चुनकर आए हैं। टिकट उनको क्यों मिला? सिर्फ इसलिए कि वे किसी राजनेता के बेटा या बेटी थे, इसलिए नहीं कि उन्होंने अपनी तरफ से इस देश की सेवा करने की कोई भावना दिखाई हो। जब किसी राजनीतिक दल में यह प्रथा शुरू हो जाती है, तो खराबी भी साथ-साथ शुरू हो जाती है। अगर मोदी को देश भर में परिवर्तन और विकास लाना है, तो उन्हें इसे पहले अपनी पार्टी में लाना होगा। जिन लोगों ने राजनीति को एक व्यापार बना दिया है और अगर उन्हें मंत्रिमंडल से दूर रखा जाता है, तो मोदी की तरफ से साफ इशारा जाएगा कि वह राजनीतिक सभ्यता बदलना चाहते हैं।
जिस दिन शहजादों के लिए दरवाजे बंद होने लगेंगे, उस दिन ऐसे लोगों के लिए दरवाजे खुल जाएंगे, जो सेवा करने के लिए राजनीति में आना चाहते हैं। मोदी ने संसद में अपने पहले भाषण में कहा तो है, 'जो लोग चुनकर आए हैं, उन्हें लोकतंत्र के इस मंदिर में जनता की सेवा करने का भाव लेकर आना चाहिए, किसी पद की भूख का भाव लेकर नहीं।' मगर इस विचार को यथार्थ में बदलने के लिए उस वंशवाद को समाप्त करना जरूरी है, जो भाजपा ने कांग्रेस की नकल करते सीखी है।
यह वंशवाद एक महामारी है, जो तकरीबन हर भारतीय राजनीतिक दल के शरीर में फैल चुकी है। इसके होते हुए भारत के कभी अच्छे दिन नहीं आएंगे, क्योंकि राजनीतिक प्रणाली में वह परिवर्तन नहीं आएगा, जो बहुत जरूरी हो गया है।