प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुब्रह्मण्यम स्वामी प्रकरण पर जो कुछ कहा है, उसका सार्वजनिक संदेश यही है कि वे ऐसे व्यवहार से अप्रसन्न हैं। उन्होंने कहा है कि अनावश्यक सुर्खियां पाने से कुछ हासिल नहीं होता है। उन्होंने स्वामी के विपरीत रघुराम राजन को एक देशभक्त कहा है। प्रधानमंत्री के अनुसार, जितना वे राजन को जानते हैं, उनमें किसी से भी कम भारत प्रेम नहीं है। जाहिर है, यदि स्वामी ने उनकी भारत निष्ठा पर प्रश्न नहीं उठाया होता, तो प्रधानमंत्री को ऐसा बोलने की आवश्यकता नहीं होती।
स्वामी के स्वभाव को जानने वाले निश्चयात्मक तौर पर कुछ नहीं कह सकते। वे किसी अनुशासन और नसीहत में बंधकर काम करने वाले चरित्र में से नहीं हैं। यह प्रश्न लगातार विश्लेषकों के मन में उठता रहा है कि आखिर स्वामी उन्हीं नौकरशाहों को निशाना क्यों बना रहे हैं, जिनका संबंध वित्त मंत्रालय से है? इस पर लगभग एक राय है कि स्वामी के असली निशाने पर वित्त मंत्री ही हैं।
स्वामी ने रघुराम राजन के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम और आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास पर टिप्पणियां कीं। उसके बाद जेटली सामने आए और उन्होंने स्वामी को अनुशासन में रहने की सलाह दी। इसके बाद, स्वामी ने एक ट्वीट में जवाब दिया कि अनुशासन की नसीहत देने वाले ये नहीं जानते कि मैंने अनुशासन तोड़ा, तो खून-खराबा हो जाएगा। यह एक प्रकार की धमकी थी, जिसका जवाब न जेटली ने दिया, न किसी और ने। जब मीडिया ने जेटली की प्रतिक्रिया पर जवाब मांगा, तो स्वामी ने कहा कि जेटली क्या बोले, क्या नहीं बोले, इससे मुझे कोई लेना-देना नहीं। मैं पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री से बात कर सकता हूं। तो अब प्रधानमंत्री का वक्तव्य भी आ गया है, जिन्होंने कहा है कि कोई यह समझता है कि वह व्यवस्था से ऊपर है, तो गलत है।
अभी तक पार्टी की ओर से स्वामी के खिलाफ कोई कड़ा वक्तव्य नहीं आया है, न ही उनसे अध्यक्ष ने बातचीत की है। इसका संदेश यह जा रहा है कि शायद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से ही स्वामी को शह मिल रही हो। आखिर इस सरकार में जेटली के मौन विरोधियों की बड़ी संख्या है। वे मानते हैं कि पार्टी एवं सरकार, दोनों जगह जितना महत्व जेटली को मिल रहा है, वह अनुचित है। कई लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि जिस व्यक्ति को मतदाता ने ठुकरा दिया, उसे तीन-तीन विभागों का मंत्री क्यों बनाया गया? अब एक अलग नजरिये से इसे देखने की कोशिश करें। यह सच है कि भारत की आर्थिक नीतियों के निर्धारण में लंबे समय से वैसे लोगों की भूमिका रही है, जो विदेशों में पढ़े-लिखे हैं, वहां के अनुसार आर्थिक सोच रखते हैं तथा विदेशी वित्तीय संस्थाओं में काम कर चुके हैं। इनकी मुखालफत कई मंचों से होती रही है। जब वाजपेयी की सरकार थी, तब भी संघ परिवार के घटक ऐसे लोगों का विरोध करते थे। तब के सरसंघचालक कु. सी. सुदर्शन ने तो यहां तक कह दिया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय में कुछ विदेशी एजेंट बैठे हुए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें, तो स्वामी ने संघ परिवार के घटकों की मनोदशा को देखते हुए ही नौकरशाहों को निशाना बनाया है। प्रधानमंत्री के वक्तव्य के बाद स्वामी क्या करेंगे, इसके लिए प्रतीक्षा करनी होगी, लेकिन उन्होंने अंदर खदबदाते एक द्वंद्व को छेड़ दिया है।