फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

चुनौती: अखबार बचेगा... तो समाज बचेगा, रास्ते तलाशने के लिए जुटना पड़ेगा

गोविंद सिंह, अध्यक्ष, मीडिया सलाहकार समिति, उत्तराखंड सरकार Published by: पवन पांडेय Updated Sat, 03 Jan 2026 07:50 AM IST

सार

अखबारों को बचाने और बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। अखबारों का अस्तित्व बचेगा, तो समाज भी बचेगा। इसलिए पत्रकारों, पत्र स्वामियों और सरकारों को मिलकर अखबार को बचाए रखने के रास्ते तलाशने होंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
अखबार बचेगा, तो समाज बचेगा - फोटो : अमर उजाला


एक तो कोरोना के बाद वैसे ही अखबारों की बिक्री कम हो गई थी। अब यह नया संकट आ गया है। जाहिर है, यह मेरे लिए एक ऐसी घटना थी, जिससे मन उदास हो गया। वे दिन याद आने लगे, जब अखबार आते ही उसके अलग-अलग पन्नों के लिए घर के सदस्य टूट पड़ते थे। सुदूर मुंबई-कोलकाता से आने वाली पत्रिकाओं के लिए टकटकी लगाकर इंतजार किया करते थे! वहीं खड़े-खड़े अखबार पलटने लगा, तो एक खबर पर नजर पड़ी। दिल बाग-बाग हो गया। खबर यह थी कि उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए अखबार पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। हर स्कूल एक हिंदी और एक अंग्रेजी का अखबार मंगवाएगा। सुबह प्रार्थना के समय अखबार पढ़ने के लिए दस मिनट का समय अलॉट करना होगा। हर रोज पांच नए या कठिन शब्दों के बारे में बताना होगा। स्कूल के नोटिस बोर्ड में ये शब्द टांगने होंगे। बच्चों को भी अपना अखबार बनाना होगा। सुडोकू और वर्ग पहेली की प्रतियोगिताएं करवानी होंगी, यानी अखबार को स्कूली शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।


यह कोई अनायास लिया गया फैसला नहीं था। पिछले महीने एक बैठक हुई, जिसमें इस बात पर चर्चा हुई कि बच्चों में पढ़ने की रुचि कैसे विकसित की जाए? मोबाइल, लैपटॉप या टीवी स्क्रीन पर अति-निर्भरता के कारण बच्चों में पढ़ाई की आदत लगभग खत्म हो गई है। इसलिए स्कूल स्तर पर ही बच्चों में पढ़ने की आदत डालनी होगी। और इस काम के लिए अखबार से बेहतर और कोई साधन नहीं हो सकता। इसलिए तमाम विचार मंथन के बाद यह आदेश निकाला गया।


कहा गया कि अखबार पढ़ने से बच्चों का सामान्य ज्ञान बढ़ेगा, बच्चे समसामयिक घटनाओं के बारे में जान पाएंगे। उनके भीतर पढ़ाई के संस्कार पड़ेंगे। वे स्क्रीन से दूर होंगे। उनकी भाषा सुधरेगी। शब्दों की जानकारी बढ़ेगी। लेखन शैली बेहतर होगी। उनमें आलोचनात्मक सोच विकसित होगी। वे अपने आसपास की घटनाओं से वाकिफ होंगे। उनमें तार्किकता बढ़ेगी। वे सही और झूठी खबरों में अंतर कर पाएंगे। मानवीय अभिरुचि की खबरें पढ़कर उनके भीतर दूसरों के प्रति सहानुभूति तथा दर्द की अनुभूति विकसित होगी। वर्ग पहेली हल करते हुए वे समस्या-समाधान के गुर सीख पाएंगे। स्क्रीन पर आंखें गड़ाए रखने से सेहत पर पड़ने वाले कुप्रभावों से वे बचेंगे। कुल मिलाकर, अखबार में इतनी खूबियां हैं कि वह मोबाइल से टक्कर ले सकता है। दुनिया के अनेक देशों में इसीलिए मोबाइल को बच्चों से दूर रखने के आदेश दिए गए हैं।


बच्चे ही क्यों, बड़े भी अखबार से दूर हो रहे हैं। यह केवल अपने देश में ही नहीं, यूरोप-अमेरिका में भी हो रहा है। पत्रकारिता का शिक्षक होने के नाते हर साल पहली कक्षा में ही विद्यार्थियों से पूछता हूं कि हर रोज कौन-कौन अखबार पढ़ता है? लगभग एक-चौथाई विद्यार्थी ही हाथ खड़े करते हैं। यानी जब पत्रकार बनने के इच्छुक विद्यार्थी ही अखबार नहीं पढ़ रहे, तो बाकी कौन और क्यों पढ़ेगा?


पश्चिमी देशों में 20 साल पहले ऐसी ही स्थिति पैदा हो गई थी। उनके बड़े-बड़े अखबारों ने कभी अपना कलेवर और आकार बदल कर, तो कभी उसकी विषय सामग्री बदल कर अखबारों को जिंदा रखने की कोशिश की। फिर भी सुधार नहीं हुआ, तो अखबारों को मुफ्त बांटना शुरू किया। बहुत से अखबार बंद हो गए, तो बहुत से अखबार डिजिटल संस्करण तक सिमट गए। वहां हालत अब भी सुधर नहीं रही, बल्कि बदतर ही हो रही है, क्योंकि उन्होंने उत्तर प्रदेश की तरह विचार नहीं किया।


योगी सरकार के इस फैसले से निस्संदेह एक आशा जगी है कि यदि बच्चों में अखबार पढ़ने की आदत पड़ जाती है, तो एक शक्तिशाली माध्यम संकट से उबर जाएगा और समाज भी अनेक बीमारियों से बच जाएगा। दुनिया में अखबार की उम्र 420 साल हो चुकी है, जबकि अपने देश में उसे 245 साल हो गए हैं। उसके जीवन में अनेक बार संकट आ चुके हैं। रेडियो आया तो, टीवी आया तो, उसके सामने संकट तो बहुत आए, लेकिन उसने हर संकट से खुद को बचा लिया। अखबार की जगह कोई नहीं ले पाया।
विज्ञापन


निश्चय ही इस प्रक्रिया में उसने खुद को भी बहुत सुधारा। लेकिन डिजिटल दुनिया के सामने वह घुटने टेकने लगा है, जो अखबार की सेहत के लिए ठीक नहीं है। आज मीडिया के सामने जितनी भी समस्याएं हैं, उनमें से 90 प्रतिशत डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की देन हैं। इसलिए पत्रकारों को, पत्र स्वामियों को और सरकारों को मिलकर अखबार को बचाए रखने के रास्ते तलाशने होंगे।


अखबार को हम मित्र, दार्शनिक और गाइड मानते रहे हैं। उसे सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का बेहतरीन माध्यम मानते रहे हैं। उसे केवल धनोपार्जन का माध्यम न मानकर एक जिम्मेदारी समझ कर निकाला जाए, क्योंकि अखबारों का अस्तित्व बचेगा, तो समाज भी बचेगा। - लेखक उत्तराखंड सरकार में मीडिया सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next