पिछले हफ्ते प्रियंका गांधी ने जब दर्द भरे स्वर में कहा कि उनके पति को जलील किया जाता है, तो उनको तकलीफ होती है, तब कुछ क्षणों के लिए मेरी भी आंखों में आंसू आ गए। अपनी दादी की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि जब भी उनके बारे में कोई गलत बयान आता है, तो इंदिरा जी की सलाह याद आती है कि छाती के अंदर एक कवच रखना चाहिए। प्रियंका ने आगे बताया कि कैसे वह अपने बच्चों से रोज कहती हैं कि सत्य एक दिन सामने आएगा और उनको विश्वास रखना चाहिए कि ऐसा होगा। उनकी दर्द भरी बातों का प्रभाव मीडिया पर भी पड़ा। अगले दिन देश भर के अखबारों में प्रियंका का वक्तव्य पहले पन्ने पर सुर्खियों में छपा और टीवी चैनलों पर बार-बार दिखाया गया।
दरअसल गांधी परिवार की जगह खास है देश के लोगों के लिए। सो, प्रियंका गांधी जब अपने पति रॉबर्ट वाड्रा के बारे में कहती हैं कि उन पर लगाए जा रहे इल्जाम झूठे हैं, तो हम उसे मानने को तैयार हो जाते हैं। तो क्या नरेंद्र मोदी झूठ बोल रहे हैं, जब वह कहते हैं कि रॉबर्ट वाड्रा का बिजनेस मॉडल गजब का है, क्योंकि उन्होंने दिखाया है, कैसे एक लाख रुपये को तीन सौ करोड़ बनाया जा सकता है तीन वर्षों में?
इल्जाम सिर्फ नरेंद्र मोदी ने नहीं लगाए हैं वाड्रा साहिब पर। अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल ही खुलासा किया था, जिससे मालूम पड़ा कि कैसे वाड्रा साहिब को कौड़ियों के दाम जमीन बेची गई थी और फिर वापस खरीदी गई करोड़ों रुपये का मुनाफा देकर। हाल में अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक खोजी पत्रकार ने लेख लिखा, जिससे मालूम हुआ कि कैसे वाड्रा साहिब राजस्थान में सस्ती जमीन खरीदने गए ऐन उस समय, जब उनके दाम कई गुना बढ़ने वाले थे एक बड़ी सरकारी योजना के वहां आने के कारण। कहने का अर्थ यह है कि प्रियंका वाड्रा के पति पर कइयों ने सवाल उठाए हैं। अपने परिवार के अपमान की जब उन्होंने बात कही, तो मुझे निजी तौर पर ठेस लगी, क्योंकि मैंने कांग्रेसियों से गालियां सुनी हैं सिर्फ इसलिए कि मैंने दरबार नाम की किताब लिखी थी 2012 में, जिसमें मैंने सोनिया जी के बारे में कहा था कि उनको भारतीय राजनीति से कभी नफरत थी।
क्या यह बात सच नहीं है? क्या उन्होंने अपने पति को राजनीति में आने से रोकने की कोशिश नहीं की थी कभी? क्या उन्होंने अपनी इतालवी नागरिकता उस वक्त तक बरकरार नहीं रखी, जब तक राजीव गांधी ने राजनीति में आने का फैसला नहीं लिया था? सच तो यह है कि देश में जितनी आलोचना अन्य राजनेताओं की होती है, उतनी गांधी परिवार की नहीं, क्योंकि उनकी जगह खास है देश के लोगों में। सो यह जानते हुए कि बोफोर्स की रिश्वत का पैसा इतालवी ओट्टावियो क्वात्रोची के स्विस बैंक खातों में पाया गया था, हमने उतना हंगामा नहीं किया, जितना कर सकते थे। जब भाजपा की सरकार बनी केंद्र में, तब भी अटल बिहारी वाजपेयी ने क्वात्रोची को पकड़ने की वह कोशिश नहीं की, जो वह कर सकते थे। फिर 2009 के आम चुनाव से पहले मनमोहन सिंह ने क्वात्रोची को वह पैसा वापस कर दिया, जिस पर हमारी सरकार ने पाबंदी लगाई थी।
रही बात जलील करने की, तो आजकल के नौजवानों में वह आदर नहीं है गांधी परिवार के लिए, जैसा हम लोगों में रहा है। देश की युवा पीढ़ी के लिए सभी राजनेता एक जैसे हैं। सो अगर नरेंद्र मोदी पर बाल विवाह के कारण कीचड़ उछाला जा सकता है, तो रॉबर्ट वाड्रा के कारोबार पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं। इसलिए कि आधुनिक लोकतांत्रिक देशों में आम मतदाता अपेक्षा करता है अपने रहनुमाओं से कि वे राजनीति में तभी आएं, जब वे साबित कर सकें कि उनके दामन बेदाग हैं। जब दाग दिखने लगते हैं किसी के दामन पर, तब सवाल तो उठेंगे ही।