इस वर्ष नवंबर में अमेरिका अपने राष्ट्रपति का चुनाव करेगा। और राष्ट्रपति चुनने के साथ-साथ वह कई दूसरे चुनाव भी करेगा। इसमें एक चुनाव तो यही होगा कि अमेरिकी अपने देश को दुनिया भर में सींग मारते भैंसे की तरह देखना चाहते हैं या ऐसी मजबूत ताकत के रूप में, जो शांति, समझदारी और सहयोग बढ़ाने की टेक रखता हो।
दुनिया का आर्थिक समीकरण जैसे-जैसे बदल रहा है, वैसे-वैसे अमेरिका समेत यूरोप खोखला होता जा रहा है। इसलिए अमेरिका और यूरोप में यह एहसास बढ़ रहा है कि दुनिया में डॉलर और यूरो से अधिक और अलग भी कुछ है, जिसे कमाने की जरूरत पड़ती है। बराक ओबामा आधे-अधूरे ही सही, अमेरिका में इस एहसास के प्रतीक हैं। ओबामा की हार इस एहसास की भी हार होगी।
ओबामा का हारना श्वेत अमेरिका की जीत नहीं होगी और न अश्वेत अमेरिका की हार, बल्कि यह इन दोनों अमेरिकाओं के बीच की खाई को ज्यादा गहरा करेगा। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है कि ओबामा ने अमेरिकी समाज की विभिन्न जातियों को जिस तरह शासकीय धागे में गूंथा है, वैसा किसी दूसरे अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं किया था।
उनका हारना अमेरिकियों की राजनीतिक व सामाजिक समझ का भी पता देगा, क्योंकि राष्ट्रपति के रूप में ओबामा उतने विफल नहीं रहे हैं, जितना उन्हें प्रचारित किया जा रहा है। वह सफल नहीं गिने जा रहे हैं, तो इसलिए कि उन्होंने राष्ट्रपति का पहला चुनाव जीतने के लिए अमेरिकियों की अपेक्षा को बहुत बढ़ा दिया था।
डेमोक्रेटिक पार्टी ओबामा को राष्ट्रपति के रूप में आगे न करे, इसकी पूरी कोशिश 2008 में पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने की थी। वह चाहते थे कि पार्टी उनकी पत्नी को आगे करे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कहें तो यह बिल क्लिंटन की हार भी थी। आज वही क्लिंटन अपनी पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में पहुंचे, तो उन्होंने अमेरिका को यह बताने की जोरदार कोशिश की कि यह क्यों जरूरी है कि ओबामा को फिर से अमेरिका अपनी कमान सौंपे।
उसमें उन्होंने दो बातें बहुत महत्व की कहीं: किसी भी राष्ट्रपति ने, जिनमें मैं भी और मुझसे पहले हुए दूसरे सारे राष्ट्रपति शामिल हैं, हममें से किसी ने भी वैसी कमजोर आर्थिक स्थिति का सामना नहीं किया था, जैसी स्थिति का सामना इस आदमी ने किया है, और चार वर्षों में इस आदमी ने जितनी कमजोर कड़ियों की पहचान की है, उन सबको ठीक करने का काम तो हम सब भी इतने समय में नहीं कर पाते! इसी से लगती हुई दूसरी बात उन्होंने यह कही कि रिपब्लिकन ओबामा का सिर इसलिए कलम करना चाहते हैं कि अपने पिछले लंबे शासन-काल में उन्होंने जितनी-जितनी गंदगी जमा कर दी थी, उसे यह आदमी चार वर्षों में साफ नहीं कर सका!
आतंकवादियों के खिलाफ ओबामा का कड़ा रुख शायद इधर के वर्षों में दूसरे अमेरिकी राष्ट्रपतियों से ज्यादा ईमानदार रहा है और इसलिए ज्यादा परिणामकारी भी रहा है। उन्होंने पाकिस्तान सरकार की मिलीभगत से, पाकिस्तान में छिपे ओसामा बिन लादेन को, वहां अमेरिकी फौजियों को भेजकर जिस तरह मार गिराया, उसकी वैधता आदि की जितनी भी बातें हम करें, सचाई यह भी है कि छल-छद्म का जो राज दुनिया भर में चल रहा है, उसमें पाकिस्तानी गुब्बारे का फूटना जरूरी था।
ओबामा भारत के दोस्त हैं, लेकिन उस तरह नहीं, जिस तरह बुश खुद को दिखाते थे। वह सावधान हैं कि भारत के साथ दोस्ती में अमेरिकी हितों की अनदेखी न हो जाए। वह मनमोहन को गुरु बताते हुए भी, उन पर यह दवाब बनाते रहे हैं कि भारत आर्थिक सुधारों का दूसरा दौर शुरू करे। दूसरे दौर से मतलब भारतीय बाजार में अमेरिकी पहुंच को बढ़ाने का रास्ता खोलना है।
दुनिया की स्थिति ऐसी बनती जा रही है कि अगर तुम अपने देश के प्रति ईमानदार हो, तो बाकी दुनिया के प्रति बेईमानी नहीं कर सकोगे; और करोगे तो अपने देश के प्रति भी ईमानदार नहीं रह सकोगे। इसलिए इस चुनाव में ओबामा की पराजय उन कई संभावनाओं की पराजय बन जाएगी, जिनके आधार पर हम भविष्य के प्रति थोड़ी आशा से देखते हैं।