कई साल बाद जब मुकदमे में ट्रायल शुरू होगा, तो सबूतों को लेकर प्रश्न खड़े होंगे। बेडरूम में पति-पत्नी के अलावा तीसरा व्यक्ति या सीसीटीवी नहीं होता। यह निजता का भी उल्लंघन है। सहमति के बगैर जबरदस्ती बनाए गए संबंध, यानी मैरिटल रेप में क्या सिर्फ पत्नी के बयानों के आधार पर ही पति को सजा दी जा सकती है? यह सवाल कानून के संभावित दुरुपयोग का नहीं, बल्कि अपराधशास्त्र के बुनियादी उसूलों से जुड़ा है। मैरिटल रेप अगर अपराध घोषित हो गया, तो यह कानून सभी धर्मों के विवाहित पुरुषों के ऊपर लागू होगा।
मैरिटल रेप को अपराध का दर्जा देने वाले लोगों के तीन बड़े तर्क हैं-पहला, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, 29 फीसदी महिलाएं पारिवारिक हिंसा और यौन-उत्पीड़न का शिकार होती हैं। वैवाहिक दुष्कर्म शारीरिक हिंसा के साथ मानसिक तौर पर भी पीड़ादायक होता है। दूसरा, नए बीएनएस कानून की धारा-63 में दिए गए कानूनी अपवाद से विवाहित महिलाओं को रेप के दायरे से बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद-14 और 15 का उल्लंघन है। विवाहित महिलाओं को भी रेप के खिलाफ कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए। तीसरा, किसी भी पुरुष या पति को स्त्री के साथ जबर्दस्ती संबंध बनाने का अधिकार नहीं है। औपनिवेशिक आईपीसी कानून में विवाहित पुरुषों को दी गई सुरक्षा पितृ-सत्तात्मक है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका में मैरिटल रेप को अपराध माना गया है। इसलिए भारत में सुप्रीम कोर्ट को प्रगतिशील नजरिये से फैसला देना चाहिए।
इसका विरोध करने वालों के भी तीन बड़े तर्क हैं-पहला, शारीरिक हिंसा के लिए पतियों के खिलाफ कानून में प्रावधान हैं। घरेलू हिंसा के खिलाफ वर्ष 2005 में बनाए गए कानून में यौन-शोषण भी जुड़ा है। कानून के अनुसार, पीड़िता को क्रूरता के आधार पर तलाक के साथ गर्भपात का भी अधिकार है। दूसरा, निर्भया कांड के बाद जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी ने इसे अपराध की श्रेणी में रखने की सिफारिश की थी, जिसे तत्कालीन यूपीए सरकार ने नहीं माना। तीसरा, मैरिटल रेप संबंधी कानून में बदलाव के लिए अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और यूएन की एजेंसियों का दबाव है। दहेज उत्पीड़न मामलों में आईपीसी की धारा-498-ए के दुरुपयोग के खिलाफ संसद और सुप्रीम कोर्ट में हो रही चर्चा के साथ मैरिटल रेप से जुड़े विषयों पर भी विमर्श होना चाहिए।
सरकार ने संसद में बार-बार कहा है कि भारतीय समाज में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना जाता है। मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने पर विवाह संस्था कमजोर होने के साथ कानून का दुरुपयोग बढ़ेगा, इसलिए यह अपवाद नहीं हटना चाहिए। इन्हीं तर्कों के आधार पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया है। पिछली सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा था कि अगर सरकार ने जवाब नहीं दिया, तो वे संविधान के अनुसार मामले का निपटारा करेंगे। इसलिए इस मामले से जुड़े सांविधानिक बिंदुओं का आकलन जरूरी है। पहला, सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की बेंच ने केशवानंद भारती फैसले में सरकार, संसद और सुप्रीम कोर्ट के बीच शक्तियों के विभाजन पर मोहर लगाई थी। संविधान के अनुसार, शादी का विषय समवर्ती सूची में आता है। इस मामले पर केंद्र सरकार ने राज्यों की राय मांगी थी।
19 राज्यों में से 10 राज्यों ने विरोध में, तीन राज्यों ने समर्थन में और छह राज्यों ने अस्पष्ट राय दी थी। महिला आयोग ने भी इस मांग का विरोध किया। संविधान ने संसद और विधानसभा को कानून बनाने और उसे बदलने का अधिकार दिया है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी सरकार को कानून में बदलाव के लिए निर्देश दिए थे। इसलिए सभी राज्यों का पक्ष जाने बगैर इस मामले में सुनवाई और फैसला संविधान सम्मत नहीं है। दूसरा, सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों से समलैंगिक विवाह (सेम सेक्स मैरिज) को मान्यता मिलने के साथ व्यभिचार और अप्राकृतिक सेक्स अपराध के दायरे से बाहर हो गए हैं। इस मामले में कुछ याचिकाओं के अनुसार, स्त्री-पुरुष की समानता के आधार पर दुष्कर्म संबंधी अपराध को लिंग निरपेक्ष होना चाहिए। ऐसा होने पर पत्नियों के खिलाफ पति भी रेप का मामला दर्ज करा सकेंगे। ऐसा होने पर पारिवारिक व्यवस्था ध्वस्त होने के साथ मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी।
प्रगतिशील कानून बनाने के साथ गलत और फर्जी मुकदमेबाजी करने वालों के खिलाफ सख्त दंड का प्रावधान होना चाहिए। इसलिए जल्दी में अदालती सुनवाई करने के बजाय विधि आयोग और संसदीय समिति को इस मामले से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं पर विचार करना चाहिए। तीसरा, नए बीएनएस कानून की धारा-63 के अनुसार, 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध रेप अपराध के दायरे में आ सकते हैं। राजस्थान सरकार ने इस मामले में पक्षकार बनने के लिए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है। हिमाचल प्रदेश ने लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष कर दी है।
दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट के अनेक जज किशोर बच्चों के बीच सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर रखने की बात कर रहे हैं। जनवरी 2019 में दिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, अगर लिव-इन रिलेशनशिप में पुरुष और महिला के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बने और बाद में पुरुष शादी से मुकर जाए, तो उसे दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता। मैरिटल रेप से जुड़े फैसले का समाज के साथ कई अन्य कानूनों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ेगा। इसलिए इस मामले पर तीन के बजाय पांच जजों की संविधान पीठ में सुनवाई होनी चाहिए।