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वैचारिक संकेत: यूरोप में हिंसा से जामिया के आंदोलन तक... बयानों के संदर्भ बेशक अलग, संकेतों को समझना जरूरी

अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: न्यूज डेस्क Updated Mon, 26 Oct 2026 06:10 AM IST

सार

फ्रांस समेत कुछ यूरोपीय देशों में भड़की हिंसा, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में चल रहा आंदोलन और जम्मू-कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला के बयान अपने संदर्भों में बेशक अलग हैं, लेकिन इनमें उभरते वैचारिक संकेतों को समझना जरूरी है।
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Jamia Millia Islamia - फोटो : AI Generated


फ्रांस समेत कई यूरोपीय देशों में बढ़ता आक्रोश, भारत में जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर जारी प्रदर्शन के दौरान दीवारों पर लिखे गए आपत्तिजनक नारे और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला की भारत के प्रति अविश्वास जताने वाली टिप्पणियां अलग-अलग घटनाक्रम हैं, लेकिन इनके राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थों पर एकसाथ विचार करने की जरूरत है।


इसमें संदेह नहीं कि यूरोपीय देशों में चल रहे आंदोलनों की मूल वजह आंतरिक समस्याएं ही हैं। लेकिन, इनके पीछे विदेशी डिजिटल नेटवर्क और सोशल मीडिया के जरिये इन्हें हवा देने तथा दुष्प्रचार फैलाने की आशंकाएं भी गंभीर हैं। दूसरी तरफ, भारत में जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग करना गलत नहीं है, लेकिन आंदोलन के बीच परिसर की दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ जैसे नारे लिखे जाना इस आंदोलन के स्वरूप को लेकर सवाल खड़े करता है।


छात्र संघ के चुनाव की मांग और कश्मीर मुद्दे का आखिर क्या संबंध है? अगर इन नारों का उद्देश्य केवल ध्यान आकर्षित करना है, तब भी यह तरीका उचित नहीं कहा जा सकता। अगर इनके पीछे कोई अलग राजनीतिक एजेंडा है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी आपत्तिजनक नारों की निंदा की है और जिम्मेदार लोगों की पहचान करने की आवश्यकता जताई है।


इस संदर्भ में अक्सर विवादों में रहने वाले फारूक अब्दुल्ला का बयान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाकर कश्मीरियों की रक्षा कर रहा है, जबकि भारत सरकार की मंशा सही नहीं है।


सवाल यह है कि जिस देश से संचालित सीमा पार आतंकवाद के कारण जम्मू-कश्मीर ने लंबे समय तक पीड़ा झेली, उसे वहां के लोगों का रक्षक कैसे बताया जा सकता है? दरअसल, इन सभी घटनाओं को केवल अलग-अलग असंतोष की अभिव्यक्ति मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। इनके बीच किसी प्रत्यक्ष साजिश या संगठित संबंध का प्रमाण भले न हो, लेकिन इनमें उभरते वैचारिक संकेतों को समझना जरूरी है। विशेष रूप से तब, जब देश की एकता, सांविधानिक व्यवस्था और राष्ट्रीय हितों से जुड़े प्रश्न राजनीतिक विरोध के केंद्र में हों।

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