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ऐसे हों लोक सेवक: पद नहीं, सेवा और सत्यनिष्ठा हो पहचान; राष्ट्र पहले की भावना से ही मजबूत होगा सुशासन का आधार

डॉ. देवेश चतुर्वेदी Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 20 Jun 2026 07:24 AM IST

सार

कॅरिअर के बदलावों के बीच सिविल सेवकों को नए दायित्वों का निर्वहन पूरे जोश और कर्मठता के साथ करते हुए अपने मूल्यों पर अडिग रहना होगा, ताकि नई पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले सके।
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कैसे हों लोक सेवक? - फोटो : ANI


प्राचीन समय में यज्ञ करने का उद्देश्य समाज में दिव्यता और अच्छाई फैलाना था। शैतान इसमें रुकावट डालने की कोशिश करते थे। आज के युग में, सुशासन की स्थापना और आतंकवाद, भ्रष्टाचार या अपराधीकरण के खिलाफ लड़ाई भी एक यज्ञ की तरह ही है। इस यज्ञ को सरकार के अंदर और बाहर के लोग बड़े पैमाने पर भलाई के लिए कर रहे हैं, जिनमें राजनीतिक नेतृत्व, लोक सेवक, न्याय प्रणाली, सिविल सोसाइटी, मीडिया और आम नागरिक शामिल हैं। पर, शैतानी सोच रखने वाले कुछ लोग इसमें विघ्न डालने की कोशिश करेंगे। अच्छाई बनाम बुराई की यह लड़ाई सदियों से चली आ रही है। एकजुट होकर ही बुराई पर सच्चाई की जीत सुनिश्चित होगी। प्रशासनिक सेवकों के कॅरिअर में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। उन्हें कम महत्वपूर्ण पदों पर भी तैनात किया जा सकता है। अगर, ऐसे बदलाव उनके हौसले पर असर डालने लगें, तो शायद वे अपने मूल्यों से समझौता करने लगें। पर, समझदारी यह है कि उन्हें नए दायित्वों का निर्वहन पूरे जोश व कर्मठता के साथ करते हुए अपनी कार्यशैली की छाप छोड़नी चाहिए। वहीं, महत्वपूर्ण या शक्तिशाली पदों पर तैनात प्रशासनिक सेवक को अहंकार नहीं करना चाहिए और हर स्थिति में विनम्र बने रहना चाहिए। सिविल सेवकों को महंगे उपहार या शानदार आतिथ्य लेने से पहले, उसके उद्देश्य को समझना होगा। आचरण नियमावली तय करती है कि क्या ग्रहण किया जा सकता है और क्या नहीं, फिर भी दो नैतिक प्रश्नों पर ध्यान देना होगा। पहला, क्या इस मेहमाननवाजी या महंगे उपहार देने के पीछे कोई छिपी हुई बदनीयती या निजी स्वार्थ है? और दूसरा, क्या उन्हें ग्रहण करने से कामों में निष्पक्षता या ईमानदारी पर कोई असर पड़ेगा? अगर दोनों में से किसी भी सवाल का जवाब हां है, तो ऐसी सेवाएं या वस्तुएं ग्रहण करने से बचना ही सही है।


प्रशासनिक नेतृत्वकर्ता के तौर पर, हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने उन अधीनस्थों और अन्य हितधारकों का हौसला बढ़ाएं, जो पूर्ण समर्पण और सत्यनिष्ठा के साथ काम कर रहे हैं। इससे ईमानदारी व सच्चाई के मार्ग पर चलते रहने के लिए उन्हें प्रोत्साहन मिलता है। इससे ऐसा माहौल बनेगा, जहां नई पीढ़ी इन अधिकारियों से प्रेरणा ले सके। ‘राष्ट्र पहले’ के आदर्श को लोक सेवकों से अपने कामों में अपनाने की अपेक्षा की जाती है । अतः, एक सिविल सेवक को अपने पद से जुड़े दायित्वों के निर्वहन के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहिए, परंतु इससे जुड़ी सुविधाओं तथा पद के प्रति निर्लिप्त रहना होगा।

-लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। 
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