खरीदारी करते हुए इतनी उलट-पलट तो होनी ही चाहिए जी कि कहीं जूते की तली क्रैक न हो या कमीज कटी-फटी न हो, सीवन उधड़ी हुई न हो। पर तख्तों और ताजों का यों रोज पलटना जनता को ठीक न लगता। इसीलिए उसने पार्टियों को फिर से पूर्ण बहुमत देना शुरू किया था। हालांकि बरसों से तख्तों और ताजों की उलट-पलट हुई नहीं थी। अब तमिलनाडु में पन्नीरसेलवम के सिर पर से ताज फिर उतर गया। पर गुस्सा तो दूर, अम्मा की वापसी ने उन्हें खुश कर दिया। आज ऐसे लोग कितने होंगे, जो खुशी-खुशी अपना ताज दूसरे के सुपुर्द कर दें!
इधर जनता ने वर्षों बाद केंद्र में मोदी जी को पूर्ण बहुमत दिया, तो दिल्ली में केजरीवाल जी को इतने विधायक दे दिए कि उन्हें चिंता हो रही होगी कि इन्हें संभालूं कैसे? अलबत्ता भाजपा को उन्होंने एक फिर परिवार नियोजन वाले उस नारे की याद जरूर दिला दी होगी-बस दो या तीन बच्चे होते हैं घर में अच्छे। बरसों पहले राजीव जी ने भी उन्हें परफेक्ट परिवार वाला एक दूसरा नारा याद दिलाया था-हम दो, हमारे दो।
फिर भी जी, तख्तापलट का डर है कि वह जाता ही नहीं। इधर केजरीवाल-सिसोदिया की जोड़ी कह रही है कि केंद्र सरकार अफसरों के जरिये उनका तख्ता पलटना चाहती है, उधर महाराष्ट्र में अठावले साहब कह रहे हैं कि पवार साहब वहां सरकार गिराने की जुगत में हैं, यानी तख्तापलट का डर वहां भी है। अब दिल्ली की बात तो समझ में आती है कि केजरीवाल जी की सरकार को उनचास दिन छोड़िए, सौ दिन पूरे हो गए, फिर भी वह जमी हुई है। लेकिन पवार साहब का गणित आज तक कोई समझ नहीं पाया, पता नहीं, अठावले जी ने कैसे समझ लिया। खैर जो भी हो, पर पहले तख्त के पायों को टिकने तो दो यार, उस पर बैठकर किसी को सांस तो लेने दो। फिर पलट लेना। पर तख्त एक बार जम गया, तो फिर उसे पलटा कैसे जाएगा? सो तख्त को पलटना है, तो कोशिशें अभी से शुरू हो जानी चाहिए। वे कोशिशें शुरू हो गई हैं। इस दौर में पन्नीरसेवलम जैसा होना बहुत दुर्लभ है।