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मैदान मारने की जल्दबाजी

Sun, 05 Apr 2015 07:33 PM IST
जगदीश उपासने
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भारतीय जनता पार्टी का यह नया रूप है। बंगलूरू में पार्टी की दो दिनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के पितृ-पुरुष लालकृष्ण आडवाणी का परंपरागत रूप से होने वाला ‘मार्गदर्शक’ उद्बोधन न होने को हालांकि ‘वाजपेयी-आडवाणी युग’ का पटाक्षेप बताया गया, पर पार्टी में असल बदलाव यह नहीं है, बल्कि 35 वर्ष की परंपरा टूटना एक तरह से ‘परिवर्तन प्रकृति का नियम है’ की वास्तविकता है। असली बदलाव है पार्टी की नई-नवेली आक्रामकता, जो उसकी दशा-दिशा में बड़े परिवर्तन की झलक देती है। भाजपा अपने शासन के बारे में फैलाई जा रहीं ‘मिथ्या धारणाओं’ से भी असली दुश्मन से लड़ने की तैयारी के साथ भिड़ना चाहती है। भूमि अधिग्रहण कानून पर कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के ‘दुष्प्रचार’ और ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ से लेकर बिहार को ‘जंगल राज’ से मुक्त करने के लिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने जैसा आक्रामक लहजा अख्तियार किया, वैसा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए शासन में भाजपा ने शायद ही किन्हीं मुद्दों पर किया हो।
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भाषणों में ठोस कार्यक्रमों का आधार था। विभिन्न राज्यों में पार्टी की चुनावी जीत पर न तो बहुत अहंकार भरे भाषण हुए, और न ही दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार को गले का ढोल बनाया गया। दिल्ली में आप जैसे अनुभवहीन दल से हार के बाद देश भर में पार्टी कार्यकर्ता जिस दुविधा में पड़ा था, उसे दूर करने की जरूरत थी। कई असंबद्ध घटनाओं और कुछ पार्टी नेताओं के अटपटे बयानों के बाद मोदी सरकार पर कथित सेक्यूलर जमात के एक हिस्से के उग्र हमलों ने भी कार्यकर्ता की दुविधा में इजाफा किया। इसके लिए भी जरूरी था कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी विभिन्न मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाते। भाजपा ने वाजपेयी-काल की एनडीए सरकार के कार्यकाल में सरकारी उपक्रमों के विनिवेश से तब पार्टी संगठन में पैदा हुई दुविधा के पाठ से, लगता है सबक सीख लिया।

संगठन और सरकार की उपलब्धियां और कार्यक्रम आक्रामकता से पेश करने का पहला मंच तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक ही बनी। भूमि अधिग्रहण कानून (उसमें नौ महत्वपूर्ण संशोधनों के बावजूद) को लेकर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में संभवत: वैसी स्पष्टता नहीं थी, जिसकी जरूरत सरकार को अपनी पार्टी में है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां अगर इस कानून पर ‘भ्रम फैलाने’ में कामयाब हुई हैं, तो इसका एक कारण इस कानून को लेकर सत्तारूढ़ दल के एक तबके का पसोपेश रहा है। भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों की सार्वजनिक आपत्तियों से भी इस पसोपेश में वृद्धि हुई। संघ के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ शाह और अरुण जेटली की हाल में दिल्ली में हुई बैठक के बाद भूमि सुधार कानून में किए गए नौ संशोधनों से इन आपत्तियों की तल्खी तो कम हुई, पर पार्टी में स्पष्टता के बिना इस कानून पर ‘दुष्प्रचार’ से लड़ने की योजना बेमानी होती। इसलिए कार्यकारिणी में भूमि सुधार कानून पर लंबा-चौड़ा पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन दिया गया और एक पुस्तिका बांटी गई। शाह ने भूमि सुधार कानून पर मिथ्या प्रचार से निपटने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं से घर-घर पहुंचने का जो आह्वान किया, उसका आधार पार्टी का जल्द शुरू होने वाला ‘नए सदस्यों की सदस्यता की पुष्टि करने’ और देश के हर जिले में पार्टी कार्यालय खोलने का अभियान है। भारत में हरेक राजनीतिक दल के संगठन तंत्र के सिर्फ चुनाव मशीनरी में तब्दील हो जाने के चलते इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी, कहना कठिन है। भूमि अधिग्रहण पर मोदी समेत दूसरे बड़े नेताओं की रैलियां शायद ज्यादा कारगर होंगी।
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भूमि अधिग्रहण जिस तरह बैठक के दोनों दिन छाया रहा, उससे पता चलता है कि सरकार के लिए यह कितनी बड़ी चिंता का विषय है। यह तब है, जब सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज ने 2013 के उत्तरार्ध में देश के 18 राज्यों में जो सर्वेक्षण किया, उससे पता चलता है कि भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों में व्याकुलता तो है, लेकिन सिर्फ वही किसान (मात्र पांच फीसदी) इसे लेकर व्यग्र हैं, जो अपने पुत्र की शिक्षा और बेटी की शादी के लिए भूमि की बिक्री-खरीद करना चाहते हैं। देश में खेती और किसानों की बदतर हालत के कारण 66 प्रतिशत किसान चाहते हैं कि नौकरी मिले, तो आज खेती छोड़ दें। भाजपा ने समझ लिया है कि भूमि अधिग्रहण पर लड़े बगैर गुजरात की फार्म इनकम इंश्योरेंस स्कीम जैसी खेती और किसान के उद्धार की अभिनव योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकता। ‘अंत्योदय’ तथा सरकारी योजनाओं के केंद्र में गरीब को रखना भूमि अधिग्रहण पर महज ‘मिथ्या प्रचार’ की काट के लिए नहीं है। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उनकी सरकार के ‘गरीब कल्याण मेले’ काफी कारगर रहे थे, यह अलग बात है कि बड़े उद्योगपतियों और विदेशी निवेशकों के अहमदाबाद में हुए सालाना सम्मेलन ज्यादा सुर्खियां बने।

भूमि अधिग्रहण का हर पहलू कार्यकारिणी सदस्यों को स्पष्ट करना इसलिए भी जरूरी था, ताकि पार्टी पदाधिकारियों-कार्यकताओं की नीति-नियंताओं से संवादहीनता की शिकायत (यदि कोई है तो) दूर हो जाए। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार बनाने से पार्टी के अनुच्छेद 370 और अलगाववादियों से दूरी जैसे मुद्दों पर भी गुबार न छांटा जाता, तो मुश्किल होती।

मोदी और जेटली ने अपने भाषणों में बड़े सौदों में भ्रष्टाचार की रोकथाम और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता को जैसा महत्व दिया, उससे पता चलता है कि जल्द ही इसका विस्तार राज्यों तक भी होगा, कई राज्य तो पार्टी-शासित ही हैं। आम तौर पर सत्तारूढ़ दलों की कार्यकारिणी का विचार-विमर्श अपनी सरकार की तारीफ पर केंद्रित होता है। बंगलूरू भी अपवाद न था। पर अगर मोदी की रैलियों में आज भी एक लाख से अधिक लोग जुटते हैं, तो पार्टी कार्यकारिणी के लिए उनकी सरकार के कामकाज पर मुहर लगाना लाजिमी ही था।
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