निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान कर दिया है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मतदान प्रक्रिया मार्च की शुरुआत में समाप्त हो जाएगी। सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां संबंधित राज्यों के लिए अपने घोषणापत्र जारी करने और उम्मीदवारों की सूची बनाने में व्यस्त हैं। चुनावी प्रक्रिया ने एक बार फिर उन मुद्दों को सुर्खियों में ला दिया है, जो लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन सबके के लिए एक संकल्प की जरूरत है, जो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाए। सभी लोकतंत्रों में यह पूर्वानुमानित है कि मतभेदों को सामने लाने के पीछे बहस की भावना हो, विरोधी ताकतें आलोचना कर सकें और यह तर्क किया जा सके कि उनका नजरिया देश के लिए सबसे बेहतर क्यों है। दुर्भाग्य से हमारे देश में यह भावना कमजोर हुई है। हाल के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री की असंसदीय शब्दों में आलोचना की गई, पंजाब में चुनाव लड़ रहे एक पूर्व सैन्य प्रमुख ने कांग्रेस के अपने प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया और पंजाब में ही चुनाव लड़ रहे एक पूर्व मुख्यमंत्री ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को 'डरपोक और तुच्छ व्यक्ति' बताया। यह सब बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
लगभग सभी राजनीतिक दल इस असंसदीय व्यवहार के लिए दोषी हैं। यह राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं और उसके बाद भी कई अवसर पैदा होंगे। क्या सभी राजनीतिक दल इस पर सहमति बना सकते हैं कि आगामी चुनावों में वे मुख्यतः अपनी नीतियों व कार्यक्रमों पर बात करेंगे और केवल प्रस्तावित घोषणापत्र या विरोधी दल के कामकाज की आलोचना करेंगे? राजनीतिक दलों को व्यक्तिगत टिप्पणी के बजाय केवल अपने बारे में बात करनी चाहिए और विपक्षी उम्मीदवार को गाली देकर फायदा उठाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
चुनाव में धनबल का इस्तेमाल एक बड़ी चिंता का विषय रहा है। इस दिशा में बहुत धीमी गति से सुधार हो रहा है। चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव में प्रति उम्मीदवार खर्च की सीमा 28 लाख रुपये निर्धारित की है। लेकिन तथ्य यह है कि वास्तविक खर्च इससे कहीं ज्यादा होता है। पार्टियों द्वारा किए गए खर्च को उम्मीदवारों के खर्च में नहीं जोड़ा जाता है। राजनीतिक दल उम्मीदवारों पर भारी मात्रा में दिल खोलकर खर्च करते हैं। इस तरह धन का एक बहुत बड़ा हिस्सा उम्मीदवारों के खाते में नहीं जुड़ता है। नतीजतन उम्मीदवार निर्धारित सीमा का मात्र 50 से 60 फीसदी खर्च ही दिखाते हैं, जबकि कई उम्मीदवार सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं।
यह चुनावी निधि में सुधार की एक बड़ी जरूरत को रेखांकित करता है, जो भ्रष्टाचार का एक बड़ा स्रोत है। पार्टियां विभिन्न स्रोतों से धन इकट्ठा करती हैं। बीस हजार रुपये तक के चंदे पर उन्हें दान दाता के नाम का खुलासा करने की जरूरत नहीं है। नतीजतन ज्यादातर चंदे को इस सीमा से नीचे के स्रोतों से मिला दर्शाया जाता है। इसलिए यह जरूरी है कि राजनीतिक दलों को जो भी चंदा मिलता है, उसे सार्वजनिक जांच के लिए खुला रखना चाहिए। निर्वाचन आयोग ने हाल ही में सुझाव दिया है कि दो हजार तक की राशि को विवरण के साथ ऑनलाइन रखा जाना चाहिए। इस तरह के चंदे के लिए कोई न्यूनतम सीमा रखने की जरूरत नहीं है। राजनीतिक दलों को जो भी चंदा मिलता है, सभी राशि को चंदा देने वाले व्यक्ति की जानकारी के साथ वेबसाइट पर डाला जाना चाहिए।
यह भी चिंता की बात है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने वाली एक प्रमुख नीति को कमजोर किया जा सकता है। यह मामला अभी चुनाव आयोग के पास है, जो आने वाले दिनों में अपना फैसला सुनाएगा। फैसला चाहे जो हो, पर कुछ मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है। सभी उम्मीदवारों को समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए निष्पक्ष चुनाव कराने की एक स्वस्थ परंपरा रही है। चुनाव आयोग विभिन्न मुद्दों पर सरकार को दिशा-निर्देश देता है। आम तौर पर इसका सम्मान किया जाता है। अतीत में इन्ही दिशा निर्देशों के तहत चुनावी प्रक्रिया की शुरुआत से ठीक पहले बजट पेश करने के समय को कुछ समय के लिए टाला गया है। राज्य सरकारों द्वारा इसका अनिवार्य रूप से पालन हुआ है।
इस समय चुनाव की प्रक्रिया चार फरवरी से लेकर 11 मार्च (मतगणना की तिथि) तक जारी रहेगी। अब तक हर वर्ष 28 फरवरी को बजट पेश किया जाता रहा है। लेकिन इस बार सरकार ने संसद में एक फरवरी को बजट पेश करने की योजना बनाई है। यह राज्य विधानसभा चुनाव की शुरुआत से ठीक पहले होगा। सरकार ने अब तक कोई संकेत नहीं दिया है कि वह बजट को स्थगित करने के लिए तैयार है। सरकार का तर्क है कि यह उसके सुधार एजेंडा का हिस्सा है और इससे पूरे कामकाजी सत्र के लिए संसाधन उपलब्ध होंगे। उसका यह भी तर्क है कि यह केंद्रीय बजट है और चुनाव विधानसभाओं के हो रहे हैं, लोकसभा के नहीं। इसलिए सबको समान अवसर देने की प्रक्रिया पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
इस संदर्भ में कुछ मुद्दों पर विचार करने की जरूरत है। पहला, सरकार पूरी तरह से जानती थी कि सिर्फ उत्तर प्रदेश को छोड़कर बाकी चार राज्यों के विधानसभाओं का कार्यकाल मध्य मार्च में समाप्त हो रहा है। यह स्पष्ट था कि चुनाव प्रक्रिया परवरी की शुरुआत में शुरू होगी। तो फिर सरकार ने क्यों इस वर्ष सुधार प्रक्रिया की पहल की? दूसरा, यह चुनाव पांच राज्यों में हो रहे हैं, जो देश की लगभग 20 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या हम यह तर्क दे सकते हैं कि केंद्र सरकार की बजट नीति का इस बड़ी आबादी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा? तीसरा, केंद्र के पैसे का कुछ हिस्सा राज्यों को दिया जाता है। कई केंद्रीय योजनाएं राज्यों के लाभ के लिए होती हैं। ऐसे में यह मानना कठिन है कि केंद्रीय बजट का चुनावी राज्यों पर असर नहीं पड़ेगा। ऐसे में हम कैसे चुनावी प्रक्रिया में सबको समान अवसर देने की नीति की रक्षा कर सकते हैं? क्या यह सुधार बनाम लोकतंत्र का मुद्दा है?