नेताजी बहुत परेशान हैं। वह घंटों कंप्यूटर पर बैठे रहते हैं। मोबाइल पर ट्वीटर, फेसबुक उनकी समझ में नहीं आता। कभी किसी नेता की ट्वीट्स चेक करते हैं, तो कभी किसी परिचित अधिकारी की। बीच-बीच में पीएम साहब की ट्वीट्स भी चेक कर लेते हैं कि कहीं गलती से उन्हें भी इन्विटेशन न भेज दिया हो। पीर पर्वत-सी हो गई है, पर पिघल नहीं रही।
दो अक्तूबर की शाम से ही झाड़ू, पोंछा, बाल्टी, ग्लब्स, मुंह पर बांधने के लिए कपड़ा... और 12 मेगा पिक्सल वाला कैमरा, पूरी किट खरीद लाए थे वह। प्रेस रिलीज भी पहले से ही लिखवा रखी है उन्होंने, ताकि पत्रकारों को जहमत न उठानी पड़े। गली-मोहल्ले के लड़के भी तैयार बैठे हैं कि कब नेताजी का इशारा हो बस। सब कुछ तैयार है, जरूरत है तो बस एक इन्विटेशन की। उनके दिमाग में किसी ने यह बात घुसा दी कि सफाई तभी करनी है, जब आपको कोई इन्वाइट करे। और इन्वाइट दो ही तरीके से होता है, टीवी पर, नहीं तो ट्वीटर पर।
नेताजी का इलाके में इतना रुतबा है कि बिना उनको इन्वाइट किए, इस इलाके में शादी-ब्याह तक नहीं होते। कार्ड वाला इन्वाइट होता, तो वह कब का करवा लेते। मगर इलाके के बड़े-बड़े धन्ना सेठ न ही देश-दुनिया में नामचीन हैं, और न ही टीवी पर आते हैं। विकट समस्या है। एक बार लगा कि पीएम ऐसे ही एक-एक करके अगर हर स्टेट, फिर हर जिले में नौ लोगों को इन्वाइट करते रहेंगे, तो उनका नाम भी एक न एक दिन आ ही जाएगा, तब लगा लेंगे झाड़ू।
मगर लगा कि तब तक तो देर हो जाएगी, फिर क्या किया जाए? वैसे भी ज्यादा दिनों तक आइडिया पोस्टपोंड नहीं किया जा सकता। तभी एक चेला दौड़ा-दौड़ा आया। अखबार की कटिंग दिखाकर वह हांफते-हांफते बोला, नेताजी, जे वाली हेडलाइन देखिए, लिखा है- बिना इन्वाइट के ही शरद पवार ने लगाई झाड़ू। नेताजी की तो निकल पड़ी, संजीवनी मिल गई। तुरंत मुनादी करवा दी कि शाम को होगा स्वच्छता अभियान... और फिर बड़बड़ाए जा रहे थे, किसने कहा था कि इन्वाइट होना जरूरी है...!