कोरोना महामारी का चिंताजनक पक्ष यह है कि इसकी दवा नहीं है। पर यह चिंता उनकी भी है, जो पीड़ित मानवता की किसी प्रकार की मदद करने की स्थिति में नहीं है। वे इसके प्रभाव को गहरे में महसूस कर रहे हैं और व्यक्त कर रहे हैं।
उनमें एक प्राणी है खबरनवीस, जो इलाज तो नहीं कर सकता, पर करीब जाकर खबर ला रहा है और उसी के आधार पर आसन्न संकट से लोगों को आगाह और खबरदार कर रहा है। दूसरा प्राणी है साहित्यकार, जो स्थानों, तिथियों घटनाओं को ब्योरेवार इतिहास की तरह दर्ज नहीं करता।
वह संवेदनशील प्रसंगों को सालोंसाल आत्मसात किया रहता है। उसकी रचना त्वरित प्रतिक्रिया नहीं होती। साहित्य फास्ट फूड नहीं होता, वह कच्ची मिट्टी के बर्तन में धीमी आग पर देर तक पकने वाली पकवान जैसी रचना देर तक असरदार रहती है।
पत्रकारिता की खूबसूरती जल्दबाजी में है। जबकि साहित्यकार उसी तरह प्रतीक्षा कराता है, जैसे वृक्ष पर लगा फल पकने का इंतजार कराता है। कोराना संदर्भित घटनाएं मीडिया के अनेक रूपों में सामने आ रहा है। जाहिर है, साहित्य इसे देर से प्रकट करेगा।
प्रख्यात कथाकार राजेंद्र यादव ने एक बार कहा था कि घीसू, माधव यदि अपनी कहानी खुद लिखेंगे, तो वे प्रेमचंद की तरह नहीं लिखेंगे। कोरोना के कारण अब प्रेमचंद के पात्र धनिया, होरी, बुधिया, सिलिया आदि लेखक हो गए हैं। उनके संघर्ष, उनकी जिजीविषा, उनके दुख-दर्द की कहानियां सुनी-पढ़ी जा रही हैं।
कक्षा आठ में पढ़ने वाली पंद्रह साल की ज्योति लॉकडाउन में अपने पिता को साइकिल पर बिठाकर एक हजार किलोमीटर से ज्यादा की दूरी आठ दिन में तय करके गुरुग्राम से बिहार के दरभंगा के सिरहुली गांव पहुंची। यह कहानी वायरल होकर इतनी जगह फैल गई कि अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी तक को इस पर टिप्पणी करनी पड़ी।
कोरोना महामारी में मजदूरों की गति-क्षति अब देखी नहीं जा रही। मामले बढ़ रहे हैं और मजदूर डरी-घबराई भीड़ की शक्ल में उमड़ रहे हैं। कोरोना का कहर जिन पर सीधा प्रभावी हुआ है, क्या उनमें से कोई अपना भोगा हुआ यथार्थ लिखेगा? संभव है, भोगने वाले से देखने वाला बेहतर लिख दे।
भोगने वाले के पास भाषा अभ्यास का अवकाश कहां है? वह यथार्थ से दूर ले जाती अतिशय कल्पना का क्या करेगा? इस दौर में कितनी बुधियाओं के सुरक्षित प्रसव नहीं हो सके। कितने घीसू-माधव लाचार मालिकों का मुंह देखते रहे। क्या वे कभी अपनी सत्यकथा दर्ज कर पाएंगे? कभी उनके लिए भी अच्छे दिन आएंगे? कोई आज का निराला पत्थर जैसा कोरोना काल तोड़ने वाली के पास जाकर कुछ पूछेगा?
कबीर के यहां भूख के लिए हाहाकार क्यों नहीं है? क्या उनके पास खाद्य सामग्री की बहुतायत थी? नहीं, ऐसा नहीं था। वह श्रमण संस्कृति के कवि थे। उन्हें अपने श्रम पर भरोसा था। इसलिए कविता में भूख को लेकर चीख-पुकार क्यों? कमाकर खाने वाला पराश्रित नहीं होता।
लॉकडाउन में अपवाद छोड़कर श्रमिक भीख की ओर प्रवृत्त होते नहीं दिखे। हां, उनके प्राणों की रक्षा की शर्त पर मानवीय मदद, जो अपर्याप्त ही थी, उन्होंने स्वीकार की। वे तो काम और आश्रय मांग रहे थे। व्यवस्था में खामियां न होतीं, तो यह उन्हें बिना मांगे मिल सकती थी।
पर दान पर निर्भर रहने वाले मंदिरों के पुजारियों ने काम के बजाय सरकारों से भोजन-पानी की मांग की, काम की नहीं। दूसरी ओर, श्रमिक-सहायिकाएं तो कोठी-बंगलों में सेवार्थ ही आते थे और जिंदा रहने लायक ही तो पाते थे। वे महल बनाकर झुग्गियों-झोपड़ियों में जिंदगी बिताते थे।
हमें मिनरल की बोतलें पहुंचाकर नगर निगम का रनिंग वाटर पीकर सो जाते थे। हम एसी के बनावटी जाड़े में बीमार हो रहे थे और वे श्रमजनित रोग प्रतिरोधक क्षमता से जी रहे थे। पर हम साधन-सुविधाओं के आदी लोग सोचते हैं कि मजदूर लौटकर फिर आएंगे, वे गांव में रहकर क्या खाएंगे?
पर सच्चाई यह है कि उनमें से कितने मजदूर घर भी नहीं पहुंचेंगे, तो वे लौटकर आएंगे कहां से? वे हादसों से गुजरे हैं। किसी ने हाथ गंवाया है, किसी ने पांव, किसी ने पति, किसी ने पत्नी, किसी ने बच्चे और किसी-किसी ने अपने माता-पिता।
अन्य आपदाओं में तो देशी-विदेशी मीडिया और राहतकर्मी दौड़-दौड़कर बचाने-दिखाने पहुंच जाते हैं, पर चूंकि कोरोना रूपी आपदा का केंद्र सीधा मनुष्य है, इसलिए इसमें पीड़ितों से अपनों को भी बच-बचकर रहना पड़ता है। श्रमिकों की नब्बे फीसदी आबादी ग्रामीण दलितों और भूमिहीनों की है।
मीडिया, अस्पताल, स्कूल सब शहरों में हैं। ऐसे में यदि गांव में संकट आता है, तो उन्हें कौन बचाएगा? गांव में उनका काल के सिवा कौन बैठा है? जातिभेद रूपी कोरोना गांव में पहले ही जड़ें जमाए बैठा है। उसी से राहत के लिए तो वे शहरों के फुटपाथों, झुग्गियों में रहने को मजबूर होते हैं। दृश्य असंख्य हैं, आखिर हम किस-किस से आंखें मूंदेंगे?