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इस पड़ोसी से कैसे निपटें

Wed, 23 Nov 2016 07:40 PM IST
सुरेंद्र कुमार
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सुरेंद्र कुमार
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जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर मच्छेल सेक्टर में शहीद तीन भारतीय जवानों में से एक के शव के साथ पाकिस्तानी सेना ने जिस तरह की बर्बरता की है, वह मध्ययुगीन बर्बरता की याद दिलाता है। कुछ दिन पहले भी पाकिस्तान ने एक और भारतीय जवान के साथ ऐसी हरकत की थी। दुनिया का कोई भी देश ऐसे कृत्य को बर्दाश्त नहीं करेगा। पाकिस्तान के हुक्मरानों को, चाहे वह नागरिक सरकार के मुखिया हों या सेना प्रमुख, यह बात समझ में नहीं आ रही है कि ऐसी बर्बरता से न तो भारत कमजोर पड़ेगा और न ही चुप रहेगा। ऐसा नहीं हो सकता कि पाकिस्तान कोई भड़काने वाली हरकत करे और भारत चुप रहे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, सेना प्रमुख, और आईएसआई के मुखिया को पिछले ढाई वर्षों के दौरान, जबसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे नेता दृढ़ नेता सत्ता में हैं, समझ लेना चाहिए था कि भारत के साथ संबंध बेहतर बनाने के लिए उन्हें अपनी नीतियां और व्यवहार, दोनों को ही बदलना पड़ेगा।
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पाकिस्तान इस समय संक्रमण के दौर से भी गुजर रहा है। वहां सैन्य प्रमुख राहील शरीफ रिटायर हो रहे हैं और उनकी जगह नए सैन्य प्रमुख की तलाश जारी है। इस मुल्क का इतिहास बताता है कि वहां का राजनीतिक नेतृत्व चाहता है कि किसी कमजोर के हाथ में सेना की कमान हो, मगर वहां का ढांचा ऐसा है कि सैन्य प्रमुख की कुर्सी पर बैठने वाला शख्स सत्ता का एक केंद्र बन जाता है। नवाज शरीफ ने भी कभी जनरल मुशर्रफ को इसलिए कमान दी थी, क्योंकि वह मानते थे कि वह उनके अधीन रहेंगे, पर हुआ उलटा। नवाज शरीफ खुद भी पनामा पेपर्स घोटाले में नाम आने से परेशान हैं, वह कोई ऐसा जनरल चाहेंगे, जो उनकी मदद करे, उनका सिरदर्द न बने।

इसमें कोई संशय नहीं है कि पाकिस्तान के भीतर जो आतंकी ढांचा मौजूद है, उसे वह खत्म करे, तभी वह भारत के साथ अच्छे रिश्ते की उम्मीद कर सकता है। यदि किसी भारतीय जवान का सिर काटा जाएगा, शहीद जवान की आंखें निकाली जाएंगीं, तो क्या भारतीय सेना को चुप रहना चाहिए? यदि पाकिस्तान खुद को नहीं बदलता है, तो यह सिलसिला चलता रहेगा। उसकी ओर से ऐसी जो भी कार्रवाई की जाएगी, उसका करारा जवाब उसे मिलता रहेगा।
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इसके बावजूद मेरा यह मानना है कि यह तात्कालानिक समाधान है। दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व को विफलताओं और झटकों के बावजूद दीर्घकालीन समाधान के बारे में विचार करना चाहिए। दोनों देशों के संबंधों का इतिहास बताता है कि रिश्ते बिगड़ते हैं, टकराव बढ़ता है, लड़ाई होती है और फिर बातचीत के रास्ते तलाशे जाते हैं। यह सच्चाई है कि देर-सबेर पाकिस्तान को बातचीत की टेबिल पर आना ही पड़ेगा। याद कीजिए, कारगिल युद्ध में क्या हुआ था। उस वक्त कोई कह सकता था कि दोनों देशों के बीच फिर बात होगी, मगर ऐसा हुआ। संवाद और मुलाकातों का कोई न कोई रास्ता तलाशना ही पड़ता है। कारगिल युद्ध में हमारे छह सौ जवान शहीद हुए थे। उस वक्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसके कुछ वर्ष बाद स्टेट्समैनशिप दिखाते हुए जनरल मुशर्रफ को बातचीत के लिए आमंत्रित किया था। यह किसी से छिपा नहीं है कि कारगिल युद्ध को भड़काने में जनरल मुशर्रफ की कैसी भूमिका थी, मगर वाजपेयी ने दूरगामी रिश्तों को देखकर यह पहल की थी।

निश्चय ही, अभी पाकिस्तान की ओर से जैसी हरकत की गई है, उससे माहौल और बिगड़ा ही है। दोनों देशों के प्रधानमंत्री या मंत्री स्तर की बातचीत का माहौल नहीं हैं, लेकिन दोनों सुरक्षा सलाहकार एक दूसरे के संपर्क में रहे हैं, उनकी मुलाकातें भी हुई हैं। उड़ी हमले के बाद भी भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार नासिर जनजुआ एक दूसरे के संपर्क में रहे हैं। दोनों देशों के बीच हाट लाइन संपर्क भी है। दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को घटाने के लिए जरूरी है कि कहीं से पहल हो। मगर चूंकि पाकिस्तान ही भड़काने वाली कार्रवाई करता है और मौजूदा तनाव बढ़ने के पीछे भी वही जिम्मेदार है, इसलिए जरूरी है कि या तो वह खुद इसे कम करने की पहल करे या फिर उस पर ऐसा करने के लिए दबाव बनाया जाए।

पठानकोट और उड़ी के हमलों के बाद से न केवल तनाव बढ़ा है, बल्कि पाकिस्तान की ओर से 2003 के संघर्ष विराम का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है और भारतीय सेना भी जवाबी कार्रवाई कर रही है। इस बढ़ते तनाव को कम करने के साथ ही दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य बनाने के लिहाज से दूरगामी समाधान तलाशने के वास्ते तीन पहल की जा सकती है। पहली बात, जैसा कि मैंने ऊपर जिक्र किया, दोनों देशों के सुरक्षा सलाहकारों के बीच बातचीत शुरू हो, यह बातचीत जरूरी नहीं कि भारत या पाकिस्तान में ही हो, बल्कि किसी तीसरे देश में भी हो सकती है। दूसरी पहल के रूप में ट्रेक टू डिप्लोमेसी भी शुरू करनी चाहिए। दोनों देशों के बीच इस तरह की नागरिक कूटनीति होती रही है, इससे यह फायदा होता है कि इसमें सरकारी बाध्यताएं नहीं होतीं। लोग बेलाग एक दूसरे से मिलते हैं, बात करते हैं, एक दूसरे की समस्याएं और सीमाएं समझ सकते हैं, इससे आधिकारिक और औपचारिक बातचीत के लिए माहौल को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। भारत को तीसरी पहल के रूप में चीन, ईरान, सऊदी अरब और अमेरिका जैसे पाकिस्तान के शुभचिंतक देशों को राजनयिक पहल के जरिये समझाना चाहिए कि पाकिस्तान गलत रास्ते पर है और उसके कारण भारत ही नहीं, बल्कि उन्हें भी नुकसान हो सकता है। नरेंद्र मोदी एक मजबूत प्रधानमंत्री हैं। वह एक मजबूत नेता हैं, वह बहुत आगे की सोचते हैं। उनसे वाजपेयी जैसा बड़प्पन दिखाने की उम्मीद की जा सकती है।  
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