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गांव कैसे बनें सक्षम और स्वावलंबी

अवधेश कुमार
Updated Thu, 25 Jun 2020 02:21 AM IST
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कृषि - फोटो : पीटीआई

गांवों को सक्षम, सशक्त तथा स्वावलंबी बनाने पर गंभीर विमर्श एक बार फिर आरंभ हो गया है। कोविड-19 संकट में जितनी भारी संख्या में दूसरे राज्यों या सुदूर शहरों में काम करने वाले लोग गांवों की ओर लौटे हैं, उसमें यह स्वाभाविक भी है। जो यह मान चुके थे कि शहर में रहना है, उनमें से भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो गांव लौटे हैं या लौटने का मन बना रहे हैं।



गांवों की अनदेखी के कारण ऐसी स्थिति बनी कि अपना और परिवार का पेट पालने के लिए मजबूरी में लोगों को पलायन करना पड़ा। इसके कारण पिछले कई दशकों से देश में अनेक सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्याएं और चुनौतियां पैदा हुई हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए।


महात्मा गांधी के आजाद भारत का सपना ग्राम्य स्वालंबन का ऐसा भारत था, जहां स्वाभाविक आपसी सहकार और साझेदारी के साथ लोग जीवन जिएं तथा गांव इतने सक्षम हों कि किसी को बाहर जाने की जरूरत महसूस न हो। बाद में आचार्य विनोबा भावे के नेतृत्व में यही करने की कोशिश हुई। जयप्रकाश नारायण ने 1955 से अपना पूरा जीवन ग्राम स्वराज्य के काम में लगा दिया।


ऐसे हजारों लोगों ने अपना जीवन गांवों को सक्षम बनाने में लगाया, पर सरकार की विकास नीतियां ऐसी बनीं, जिनमें शहर बढ़ते गए, गांव और कमजोर हुए। हालांकि धीरे-धीरे नीति-निर्माताओं को समझ में आया कि देश गलत रास्ते पर बढ़ गया है, पर पीछे लौटने का विकल्प निःशेष हो चुका था।


सामान्य आंकड़ा यह है कि कोविड-19 संकट के बीच उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के गांवों में तीन करोड़ से ज्यादा लोग लौटे  हैं और यह क्रम जारी है। केंद्र सरकार ने तत्काल मनरेगा में 40 हजार करोड़ रुपये के अतिरिक्त आवंटन, कम मूल्य में राशन उपलब्ध कराने सहित कई कदमों से इनके जीवन यापन का रास्ता निकाला है।


पर यह स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती। अभी तक राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तरों पर समन्वय के साथ मरणासन्न हो चुके गांवों को प्राणवान बनाने की दीर्घ योजना पर विचार नहीं हुआ है। गांधी जी की कल्पना थी कि एक गांव अपनी जरूरत की सारी सामग्री स्वयं पैदा करे तथा शिक्षा से लेकर रोजगार प्रशिक्षण तक के बेहतर संस्थान स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हों।


अच्छे शिक्षालय हो, जहां अक्षर ज्ञान के साथ चरित्रवान और स्वावलंबी बनने की शिक्षा मिले। पूजास्थल, सड़कें, पंचायत, बैठने के स्थान सब इतने साफ हों कि किसी का ध्यान बरबस खींच जाए। जीवन शैली ऐसी हो, जिसमें लोग बीमार न पड़ें और पड़ जाएं, तो स्थानीय चिकित्सा प्रणाली से उनका उपचार हो जाए। भारत के गांवों में इसके आधार रहे हैं।
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परस्पर सहकार और साझेदारी के आधार पर काफी हद तक स्वावलंबी व्यवस्था यहां थी। छुआछूत की भावना बाद में भारतीय समाज का कैंसर बनी। बावजूद इसके खेती के औजार बनाने वाले, मरम्मत करने वाले सब गांव में ही उपलब्ध थे। कपड़े बुनना हो, सिलाई हो, धुलाई हो, पर्व-त्योहारों की सामग्रियों आदि की जिम्मेदारियां बंटीं थीं। पर आज पशुओं पर आधारित खेती लगभग खत्म है।


पलायन के कारण खेती के लिए मजूदर तक नहीं मिलते। हजारों वर्षों की परंपरा से खेती, ग्रामोद्योग सहित जो भी प्रणाली विकसित हुई, वह लगभग नष्ट हो चुकी है। इन सबके बावजूद गांवों को सक्षम बनाया जा सकता है। सबसे पहले खेती को सम्मान का काम बनाया जाए। किसानों की लागत कम हो। पशुपालन को प्रोत्साहित किया जाए। इन सबसे जुड़े छोटे उद्योग गांवों में विकसित हों।


सरकारों द्वारा फसल खरीदना या मूल्य तय करना या सस्ता राशन देना समाधान नहीं है। हां, फसल नष्ट होने या पशुओं की मौत की अवस्था में बीमा या मुआवजा मिलने की व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य की सुविधाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो जाएं, तो खर्च अपने-आप कम हो जाएगा।


परंपरागत देसी चिकित्सा पद्धतियों का ढांचा खड़ा किया जाए, तो इससे स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान कम खर्च में हो सकेगा। किंतु, इन सबके साथ व्यक्ति के रूप में हमें भी अपना स्वभाव बदलना होगा। ईमानदारी, परिश्रम, आपसी सहयोग के साथ कम खर्च में जीने की आदत डालनी होगी और जातिगत भेदभाव खत्म करना होगा।

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