भारतीय राजनीति हमेशा दक्षिण भारत के प्रसिद्ध राजनेताओं से ऊर्जावान रही है। के. चंद्रशेखर राव (जिन्हें प्यार से केसीआर भी कहा जाता है) ऐसे प्रसिद्ध चेहरों में हाल में शामिल हुए हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष ने हाल ही में कहा है कि '2019 में केंद्र सरकार के गठन में मैं अहम भूमिका निभाऊंगा।' केसीआर के पास एक नई राजनीतिक योजना है। 2019 के लिए मोदी बनाम राहुल के शोर के बजाय केसीआर की योजना कुछ अलग है। उनका सवाल है कि उन क्षेत्रीय दलों की अनदेखी क्यों की जाती है, जो कांग्रेस और भाजपा, दोनों का विरोध करते हैं। हम नए संघीय मोर्चे के गठन की कोशिश क्यों नहीं कर सकते?
इस बात से आश्वस्त होकर, कि 2019 के लोकसभा चुनाव में टीआरएस 15 लोकसभा सीटें जीत लेगी, केसीआर ने उत्तर भारत की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से मिलना-जुलना शुरू कर दिया है। बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी से उन्होंने यही बात की। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख बहन मायावती से केसीआर को मोदी और कांग्रेस-विरोधी गठबंधन के बारे में चर्चा करनी है। केसीआर को तेलंगाना में लघु महागठबंधन को हराने का श्रेय जाता है, जहां चंद्रबाबू नायडू की तेदेपा और कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में महागठबंधन बनाया था।
ममता बनर्जी और नवीन पटनायक से बातचीत करने के बाद केसीआर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुधवार को नई दिल्ली में क्या बताया? ममता बनर्जी खासकर राहुल गांधी के चलते व्यक्तिगत रूप से कांग्रेस को महत्व नहीं देना चाहतीं, यह संदेश केसीआर ने स्पष्ट शब्दों में प्रधानमंत्री को बताया। ऐसा ही विचार नवीन पटनायक का भी कांग्रेस के प्रति है। केसीआर चाहते हैं कि नवीन पटनायक को चंद्रबाबू नायडू या यूपीए के करीब नहीं होना चाहिए। केसीआर का यही उद्देश्य है। तो क्या इसका मतलब यह है कि वह मोदी या भाजपा के इशारों पर काम कर रहे हैं? नहीं, केसीआर का लक्ष्य है कि अगर 2019 में गैर कांग्रेसी या गैर भाजपाई सरकार नई दिल्ली में बनती है, तो उन्हें केंद्र में रक्षा या गृह मंत्रालय मिल जाए। वह अपने बेटे केटी रामाराव को तेलंगाना का मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं।
केसीआर को लगता है कि राष्ट्रीय राजनीति बहुत सरल है। एक तो वह कांग्रेस को 2019 में सत्ता में नहीं आने देना चाहते। दूसरा वह चाहते हैं कि चंद्रबाबू नायडू की भागीदारी न्यूनतम रहे। इसके अलावा वह राहुल और चंद्रबाबू नायडू की राजनीतिक नजदीकी को कम करना चाहते हैं। केसीआर के यही तीन मुख्य उद्देश्य हैं।
अखिलेश यादव अनुभवी राजनेता की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वह समाजवादी पार्टी के लिए विकल्प खुला रखना चाहते हैं। जब उत्तर भारत में चुनाव चरम पर होंगे, तब मायावती और अखिलेश केसीआर के फॉर्मूले पर चलेंगे। इसके साथ ही अखिलेश यादव को केसीआर और उनके बेटे जैसे दक्षिण के नेताओं के समर्थन की भी जरूरत है।
बसपा की तुलना में सपा के बेहतर प्रदर्शन करने की स्थिति में संभावना है कि संघीय मोर्चे पर ध्यान केंद्रित होगा। समाजवादी पार्टी तटस्थ रहेगी और यूपीए एवं कांग्रेस से दूरी बनाए रखेगी। यही वह मुख्य कारण है कि सपा और बसपा यूपीए और केसीआर से भी समान दूरी बनाए हुए हैं, ताकि दोनों मुख्य गठबंधन अनुमान लगाते रह जाएं। खुद केसीआर उत्तर प्रदेश में गठबंधन की समस्या से वाकिफ हैं।
व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता के तहत ही केसीआर चंद्रबाबू नायडू को खत्म करने का अभियान चलाए हुए हैं। दोनों तेलुगू देशम पार्टी के नेता एनटी रामाराव के शिष्य हैं। एनटीआर की मृत्यु के बाद एनटीआर के कैडरों में बड़े पैमाने पर क्षरण हुआ। केसीआर ने चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ विद्रोह किया और अपनी अलग राजनीतिक पार्टी टीआरएस बनाई। तब से वे दोनों एक दूसरे के इतने कट्टर दुश्मन बन गए कि कभी एक-दूसरे से आंख भी नहीं मिलाते। इस दुश्मनी का फायदा भाजपा उठा रही है। इसका सीधा कारण है-दुश्मन का दुश्मन यानी मेरा दोस्त। यही कारण है कि नायडू से नफरत करने वाले मोदी केसीआर के करीबी बन गए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि तेलंगाना में मुस्लिमों के बेहद करीबी केसीआर 2019 में केंद्र सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाना चाहते हैं। चूंकि वह तेलंगाना में हिंदू मतदाताओं के भी करीब हैं, इसलिए अपनी धर्मनिरपेक्ष साख की बदौलत उन्होंने चंद्रबाबू शैली की राजनीति को हराने का संकल्प लिया है।
आंध्र प्रदेश में एक बैठक में चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि वरिष्ठ नेता होने के कारण वह भी प्रधानमंत्री पद के लिए योग्य हैं। इस बयान ने केसीआर को भड़का दिया। तभी से तेदेपा को आंध्र प्रदेश से मिटाने के लिए केसीआर ने काफी मशक्कत की। केसीआर इस प्रयास में सफल या विफल हो सकते हैं, पर तेलंगाना विधानसभा के नतीजे ने दिखा दिया है कि वह किंगमेकर हैं।
केसीआर के पुत्र केटी रामाराव तेलंगाना में मंत्री हैं। केसीआर की बेटी कविता सांसद हैं। कविता अक्सर अखिलेश यादव की पत्नी से मिलती रहती हैं। कविता का मायावती व बसपा के साथ भी अच्छा रिश्ता है। इसलिए पारिवारिक रिश्ते के आधार पर केसीआर चाहते हैं कि उनके बेटे और बेटी चंद्रबाबू के खिलाफ प्रचार करें। नई दिल्ली में कविता ने पिता के लिए संपर्क बनाए हैं। वह लोकसभा में अच्छी हिंदी बोलती हैं।
साफ दिखता है कि चाहे वह यूपीए हो या संघीय मोर्चा, एनडीए के खिलाफ एक मजबूत विकल्प उभर रहा है। क्या केसीआर का खेल राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोक पाएगा? कम से कम उत्तर भारतीय राजनीति में केसीआर के प्रवेश का राजनीतिक लाभ दिख रहा है। मतदाताओं को कोई भ्रम नहीं है, वे विभिन्न तरह के राजनीतिक विकल्प देख रहे हैं-चाहे तो वे मोदी के नेतृत्व में एनडीए के साथ जा सकते हैं या 35 क्षेत्रीय दलों के साथ। कुल मिलाकर यह कांग्रेस के लिए परीक्षा की घड़ी है, क्योंकि वह उत्तर भारत की राजनीति में आए दक्षिण भारतीय नेताओं से संपर्क साध रही है।