वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान जब भाजपा के शीर्ष नेताओं ने दशकों के कांग्रेस राज के दौरान हुए भ्रष्टाचार और कुशासन को निशाना बनाते हुए 'कांग्रेस मुक्त भारत' बनाने का वायदा किया, तो ज्यादातर लोगों ने इसे अतिश्योक्तिपूर्ण चुनावी बयानबाजी समझकर खारिज कर दिया। लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने पूरे देश का दौरा कर दो सौ ज्यादा रैलियों में 'अबकी बार मोदी सरकार' के नारे पर समर्थन मांगा और तीस वर्षो में पहली बार भाजपा के रूप में किसी एक दल को बहुमत मिला तो यह बयानबाजी हकीकत में बदलती दिखने लगी। लुटियन की दिल्ली में स्वयं को बाहरी बताने वाले मोदी ने एक चतुर राजनेता, एक सफल मुख्यमंत्री और एक उत्कृष्ट राजनयिक विश्वास के साथ केंद्र की सत्ता संभाली।
चौबीसों घंटे काम करने वाले प्रधानमंत्री ने लोकोपयोगी योजनाएं चलाईं और प्रशासनिक मशीनरी को सुस्ती से बाहर निकाला। शुरुआती छह महीने में मोदी का विजय रथ आगे बढ़ता ही दिखा, लेकिन वर्ष 2015 में पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में और फिर बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। बिहार में भाजपा की शर्मनाक हार के बाद राजनीतिक पंडित उसके कारण गिनाने लगे और इस बात की संभावना जताने लगे कि अगर बिहार के प्रयोग को दोहराया गया, तो अन्य राज्यों में भी महागठबंधन इसी तरह जीत सकती है। लेकिन कहना जितना आसान होता है, उतना करना नहीं। महागठबंधन ने वैचारिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और रणनीतिक सोच के सम्मिलन को प्रतिबिंबित नहीं किया। यह विशुद्ध रूप से सुविधाओं का गठजोड़ था, जिसका एकमात्र उद्देश्य भाजपा को बिहार में सत्ता में आने से रोकना था। जल्द ही यह अपने अंतर्निहित विरोधाभास, शीर्ष नेताओं के अहं के टकराव और विश्वास की कमी के चलते ताश के घर की तरह ढहने लगा।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को न केवल 320 सीटें मिलीं, बल्कि इसने चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती के नेतृत्व वाली बसपा और अपने पिता व चाचा से बगावत कर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ गठजोड़ करने वाले विद्रोही अखिलेश यादव की पार्टी को लगभग पूरी तरह से खत्म कर दिया। हालांकि उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में कांग्रेस, सपा और बसपा की संभावनाएं पूरी तरह से धूसर नहीं हुई हैं, लेकिन मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा का विजय रथ आगे बढ़ रहा है। लगता है कि यह 2019 में 'कांग्रेस मुक्त भारत' बना सकता है। लेकिन क्या देश को इसकी जरूरत है?
लोकतंत्र के लिए एक सजग, उद्देश्यपूर्ण और रचनात्मक विपक्ष जरूरी है। लेकिन इस तरह के विपक्ष का निर्माण सत्ताधारी पार्टी का कर्तव्य नहीं है। यह विपक्षी दलों और उनके नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे अपने मतभेद भुलाकर अहं के टकराव से बचें और कम से कम राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर साझा जमीन की तलाश कर एक व्यावहारिक और योग्य रणनीति पर सहमत हों, ताकि सरकार पर नियंत्रण रहे और उसे संसद में विस्तृत चर्चा के बिना अपने फैसलों को आगे बढ़ाने का अवसर न मिले। उन्हें सरकार के विरोध में अपनी ओर से एक विकल्प पेश करना होगा, जो लोगों को अपने तर्क से आकर्षित और प्रेरित कर सके। और चुनाव के समय मतदाताओं को एक विकल्प के रूप में विपक्ष की तरफ देखने और उसे शासन का एक और अवसर देने के लिए विवश कर सके।
लेकिन आज सशक्त विपक्ष है कहां? यह एक मिथक बन गया है! विपक्षी एकता एक मायावी मृगतृष्णा बन गई है! मोदी के फिर से सत्ता में लौटने और ज्यादातर राज्यों में भाजपा की सरकारें बनने की संभावना को देखते हुए ज्यादातर विपक्षी नेता अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा के रथ पर सवार हो रहे हैं। नरेंद्र मोदी को पार्टी और सरकार में कोई चुनौती देने वाला नहीं है। वह एकसाथ कई मोर्चों पर उत्साह से काम करते हैं। एक बेहतर वक्ता होने के नाते जहां वह बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ और अंतरराष्ट्रीय नेताओं से अच्छी तरह से संपर्क साधते हैं, वहीं वह सामान्य लोगों से भी जुड़कर उन्हें आश्वस्त करते हैं कि अगर वे उनका समर्थन करेंगे, तो उनकी जिंदगी बेहतर ढंग से बदल जाएगी। लोग उन पर भरोसा करते हैं और उन्हें लगता है कि मोदी उनके साथ खड़े हैं।
अफसोस की बात है कि पूरे विपक्ष में मोदी के कद का नेता नहीं है! यह विपक्ष के लिए मुश्किल वक्त है, उन्हें अपना मोदी बनाना होगा। इसके लिए सबसे पहले सभी पार्टियों को अपने बदनाम नेताओं को रिटायर कर युवा, ऊर्जावान, मुखर, बेदाग और प्रेरक नेताओं को आगे बढ़ाना चाहिए, जो अगले पांच वर्षों पूरे देश में घूम-घूमकर लोगों से जुड़ेंगे और मोदी की गलतियों को ढूंढने के बजाय जनता की सार्थक सेवा कर उनका विश्वास हासिल करेंगे। कई विफलताओं, विफल नेतृत्व और भ्रष्टाचार की छाया के बावजूद कांग्रेस एकमात्र पार्टी है, जो फिर से सशक्त विपक्ष को जन्म दे सकती है, बशर्ते कि वह विफल नेतृत्व का त्याग करे। सभी दलों के अगली पीढ़ी के युवा, ईमानदार, निःस्वार्थ और गतिशील नेताओं, जो भारत से प्यार करते हैं, को बुजुर्ग नेताओं को रिटायर होने के लिए मजबूर करना चाहिए और उन्हें अपनी पार्टियों को नए खून, ताजा विचार, नई सोच एवं लोक हितैषी कार्यसंस्कृति से जिम्मेदार विपक्ष के रूप स्थापित करना चाहिए। विपक्ष को भ्रष्टाचार, जड़ता और भाई-भतीजावाद से मुक्त एक नए कांग्रेस की जरूरत है। विपक्षी दलों को एक गैर-कांग्रेसी नेता को स्वीकार करने के लिए तैयार होना चाहिए, जो अग्रणी मोर्चे पर डटकर भारत के सदियों पुराने बहुजातीय, बहुधार्मिक, बहुभाषी, बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष, समावेशी मूल्यों का बचाव करने और आर्थिक एव सैन्य रूप से भारत को मजबूत बनाने में सक्षम हो। जैसा कि पूर्व भाजपा नेता चंदन मित्रा कहते हैं-एकध्रुवीयता लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।
कांग्रेस, सपा और बसपा के पास एक और विकल्प है कि वे सामूहिक रूप से भाजपा में शामिल हो जाएं और भीतर घुसकर उसे प्रभावित करने की कोशिश करें!