कुछ तस्वीरें ऐसी हैं, जिनको देखना इतना मुश्किल है कि आंखें बंद करनी पड़ती हैं। जब मैंने उस वीडियो को देखा, जिसमें कश्मीरी युवक सीआरपीएफ के जवानों को पीट रहे थे और उनसे ‘गो बैक इंडिया’ कहने की जबर्दस्ती कर रहे थे, मुझे दुख तो हुआ, पर गुस्सा और भी ज्यादा। कई भारतवासी होंगे, जिनपर इस वीडियो का यही असर हुआ होगा। मेरे कश्मीरी दोस्त मुझसे अक्सर पूछते हैं कि उनके हाल पर बाकी देशवासियों को क्यों दुख नहीं होता है, क्यों पेलेट बंदूकों से जख्मी बच्चों के चेहरे देखकर मानवाधिकार संस्थाएं हल्ला नहीं करती हैं? उन्हें मैं कहना चाहूंगी कि इस वीडियो को एक बार देखें। फिर वे समझ जाएंगे कि उनके साथ बाकी देश की सहानुभूति क्यों नहीं है। वीडियो में सिपाहियों के हाथों में बंदूकें दिख रही हैं, वे चाहते तो इस हिंसक भीड़ को तितर-बितर कर सकते थे, लेकिन शायद उन्हें आदेश था कि उनकी तरफ से कोई जवाबी हिंसा नहीं होगी। सो वे चुपचाप अपमान सह लेते हैं। पर कब तक सहना पड़ेगा, हमारे सिपाहियों को अपमान?
कश्मीर में अब जो मुहिम चल रही है, उसके साथ किसी देशभक्त भारतवासी को सहानुभूति नहीं हो सकती। इस मुहिम को चला रहे हैं कट्टरपंथी जेहादी आतंकवादी, जो कश्मीर में वैसा ही विरोध करना चाहते हैं, जैसा इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने इराक और सीरिया में किया था। सीरिया में अब आईएस के अंतिम दिन आ गए हैं, उनके कब्जे वाले शहरों को खाली कराने के लिए अंतिम लड़ाई लड़ी जा रही है। सो खबर है कि भागे हुए आईएस के जेहादी नए इलाके ढ़ूंढ रहे हैं। कश्मीर से अच्छी जगह उन्हें कहां मिलेगी? वहां इस्लाम के नाम पर पहले ही से आतंक फैला हुआ है। पहले भी दिख चुके हैं आईएस के काले झंडे श्रीनगर में। उधर हमारे पड़ोसी इस्लामी देश पाकिस्तान से जेहादियों को भारत भेजने के लिए रास्ते तैयार किए गए हैं। सो कश्मीर अगर इराक और सीरिया से भागे आईएस के जेहादियों का बाहें खोलकर स्वागत करता है, तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सवाल यह उठता है कि भारत सरकार अगर श्रीनगर की गलियों में अपने सिपाहियों की सुरक्षा नहीं कर सकती है, तो कैसे सुरक्षित रख सकेगी कश्मीर को।
सच तो यह है कि नरेंद्र मोदी की कश्मीर नीति इतनी कमजोर है कि जीती हुई बाजी हारने की नौबत आई हुई है। जब मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ हाथ मिलाकर भाजपा ने श्रीनगर में पहली बार सरकार बनाई, तो उम्मीद बंधी थी कि कश्मीर मसले का समाधान शायद हमेशा के लिए हो जाए। मुफ्ती के देहांत तक उम्मीद जिंदा रही, लेकिन जबसे उनकी बेटी ने मुख्यमंत्री पद संभाला है, तब से यह साबित हुआ है कि वह न अलगाववादियों को रोक सकती है और न ही उन बिगड़े बच्चों को काबू में रख सकती है, जो सुरक्षाकर्मियों पर पथराव करते हैं। हाल ही में एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन ने साबित किया कि इनका नेतृत्व इंटरनेट पर पाकिस्तान से किया जा रहा है। सो राज्य सरकार ने इंटरनेट पर पाबंदियां लगा दीं, लेकिन यह समाधान नहीं है। यह साबित हुआ पिछले दिनों, जब चुनाव के खिलाफ लोगों ने इतना गुस्सा दिखाया कि मतदान केंद्रों को जला दिया। वैसे भी इतना कम मतदान हुआ कि चुनाव का कोई मतलब नहीं रहा।
सो भारत की सबसे पुरानी और पेचीदा राजनीतिक समस्या की स्थिति दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है। न शांति की आशा की जा सकती है और न ही लगता है कि सुरक्षाकर्मियों को सख्ती से कार्रवाई की इजाजत मिल सकती है।