फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कितना कारगर होगा जनता परिवार

Tue, 14 Apr 2015 06:57 PM IST
नीरजा चौधरी
विज्ञापन
विज्ञापन
जनता परिवार के विलय की घोषणा अब किसी भी दिन हो सकती है। यह विलय ही तय करेगा कि देश के इस पूर्वी राज्य (बिहार) में कौन सत्ता में आएगा। भाजपा की जीत से राष्ट्रीय स्तर पर मोदी लहर को बनाए रखने में मदद मिलेगी, लेकिन अगर भाजपा इसमें विफल रहती है, तो इससे विपक्षी दलों को प्रोत्साहन मिलेगा और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी एकता राजग से सीधे लोहा लेने में उनके लिए मददगार होगी।
विज्ञापन


निकट भविष्य में समाजवादी पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (एस) और इनेलो का एक पार्टी, एक नाम, एक चिह्न, एक झंडे के बैनर तले एकजुट होने का सर्वाधिक असर बिहार के चुनाव पर पड़ेगा। पूर्व के विरोधी लालू यादव और नीतीश कुमार के एक साथ आने से चुनावी परिणाम पर सीधा प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। अन्य राज्य उस तरह से प्रभावित नहीं होंगे। मसलन, उत्तर प्रदेश में सपा को अकेले चुनाव का सामना करना होगा, क्योंकि वहां किसी दूसरी पार्टी की वैसी दमदार मौजूदगी नहीं है। यही वजह है कि वहां समाजवादी पार्टी में विलय का विरोध किया गया, क्योंकि पार्टी अपना नाम और चुनाव चिह्न नहीं छोड़ना चाहती। ऐसी ही स्थिति कर्नाटक में है, जहां जनता दल (एस) को अपनी लड़ाई अकेली लड़नी पड़ेगी, तो हरियाणा में इनेलो ने पिछले ही वर्ष चुनाव लड़ा है। हालांकि यह विलय सभी विपक्षी दलों को मनोवैज्ञानिक बढ़त देगा और वे ठोस तरीके से अल्पसंख्यक मतों को अपनी तरफ खींच सकते हैं।

अगर पूर्व जनता परिवार के कुछ घटक फिर से एकजुट हो जाते हैं और इससे बना नया दल बिहार में जीत दर्ज करता है, तो वह कुछ ही समय में विपक्षी गठजोड़ का केंद्र बन सकता है और अंततः 2019 के चुनाव में भाजपा से लोहा ले सकता है। कांग्रेस के मौजूदा हालात और नेतृत्व की अनिश्चितता को देखते हुए लगता नहीं कि वह बड़े विपक्षी मोर्चे का नेतृत्व कर सकती है। जनता परिवार अगर व्यक्तिगत अहं और क्षुद्र राजनीति को रास्ते में न आने दे, तो वह यह भूमिका निभा सकता है।
विज्ञापन


जनता परिवार के कुछ नेता मानते हैं कि अगर वे बिहार में विजयी होते हैं, तो वे ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, बाबूलाल मरांडी जैसे कुछ क्षेत्रीय नेताओं को साथ मिलाकर वाम दलों के साथ गठजोड़ कर सकते हैं। कांग्रेस भी उन्हें बाहरी समर्थन दे सकती है। 1989 के ऐसे गठजोड़ के विपरीत कांग्रेस के बजाय निशाने पर इस बार भाजपा होगी। हालांकि सबकुछ बिहार में उनकी सफलता पर निर्भर करेगा।

अंकगणित के हिसाब से देखें, तो यह विलय बिहार में मजबूत दिख रहा है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर कुछ मुश्किलें भी हैं। यही वजह है कि ज्यादातर लोग बिहार के चुनाव को 'कांटे की टक्कर' के रूप में देख रहे हैं। मई, 2014 के लोकसभा चुनाव में सबसे कम वोट पाने के बावजूद राजद, जद(यू) और कांग्रेस ने कुल 45 फीसदी वोटों पर कब्जा जमाया था, जिसमें राजद को 20 फीसदी, जद(यू) को 15.8 फीसदी और कांग्रेस को आठ फीसदी वोट मिले थे। और फिर वाम दल भी कुछ फीसदी वोट तो हथियाएंगे ही, जिनके जनता परिवार के साथ आने की उम्मीद है। भाजपा एवं उसके सहयोगी दलों को कुल 38 फीसदी वोट मिले थे, जिसमें सिर्फ भाजपा को 30 फीसदी वोट मिले, और यह तब था, जब मोदी लहर थी। यही वजह है कि भाजपा अत्यंत पिछड़ी जातियों व महादलितों को लुभाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है, जिसने पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश-भाजपा गठजोड़ को वोट दिया था। अमित शाह ने 14 अप्रैल को पटना के गांधी मैदान में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक कर चुनाव अभियान की शुरुआत कर दी है, जिसमें बूथ स्तर से ऊपर के कार्यकर्ता शामिल थे। साफ है कि भाजपा विरोधी खेमे में सबसे ज्यादा नीतीश कुमार को निशाने पर लेगी।

तमाम अंकगणितीय बढ़त के बावजूद नीतीश कुमार के सामने तीन तरह की समस्याएं हैं। उनके दस वर्षों के शासन के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान है। हालांकि उन्हें वोट नहीं देने वाले लोग भी कहते हैं कि 'उन्होंने बिहार को सुधारा है'। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी को वोट देने वाले कई लोग कह रहे थे कि विधानसभा चुनाव में वे नीतीश को वोट देंगे, क्योंकि उन्होंने बिहार में काम किया है। पर भाजपा का साथ छूटने के बाद उन्हें कई राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा है।

नीतीश के सामने दूसरी समस्या जीतनराम मांझी को लेकर है, जो अचानक उभरे हैं और उनके बारे में कोई भी ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि जद (यू) के वोट बैंक, खासकर महादलितों के वोट में वह कितना सेंध लगाएंगे। जब वह सरकार से हटे थे, तो उन्होंने अपने प्रति मुसहर समुदाय में सहानुभूति जगाई थी। लेकिन देखने वाली बात होगी कि यह भावना अगले छह महीने तक कितनी रहेगी, और मांझी इस मुद्दे को कितना भुना पाएंगे। भाजपा इस बात से खुश है कि वह जद (यू) को नुकसान पहुंचा रहे हैं और कइयों का कहना है कि भाजपा पीछे से उनकी बैठकों के लिए सुविधाएं उपलब्ध करा रही है। यह सच हो या झूठ, लेकिन चुनाव से पहले भाजपा उनके साथ गठजोड़ करने के लिए इस स्तर पर इच्छुक नहीं लगती। लगता है, वह मांझी के जद(यू) को नुकसान पहुंचाने की भूमिका से ही संतुष्ट है।

तीसरी समस्या यह है कि जद (यू) और राजद का विलय जमीनी स्तर पर कितना कारगर होगा? क्या दोनों पार्टियों के समर्थक और कार्यकर्ता वह दुश्मनी भूल पाएंगे, जो उनकी एक-दूसरे के प्रति रही है? या यादवों का एक वर्ग नई परिस्थितियों से सामंजस्य बनाते हुए क्या भाजपा की तरफ नहीं जाएगा, जैसा उसने 2014 में किया था? और क्या बिहार को जंगल राज में बदलने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति से हाथ मिलाने को नीतीश के समर्थक पचा पाएंगे?

चारा घोटाले में सजा के कारण लालू यादव दौड़ से बाहर हो गए हैं, राबड़ी देवी स्वीकार्य नहीं हैं और लालू के बच्चे राज्य का नेतृत्व संभालने के लिहाज से कमउम्र हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों नेता कितनी गंभीरता से विलय को अंजाम देंगे और क्या नीतीश को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर लालू स्वीकार करेंगे।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें